सत्य का अनुसरण कैसे करें (20)
आज हम हमारे पिछले विषय पर संगति करना जारी रखेंगे। पिछली बार, हमने सभी प्रकार के लोगों की उत्पत्ति पर चर्चा की थी और हमने तीन प्रकारों पर चर्चा की थी। क्या तुम लोगों को याद है कि वे तीन प्रकार कौन-से हैं? (एक प्रकार जानवरों से पुनर्जन्म लेने वालों का है, दूसरा शैतानों से पुनर्जन्म लेने वालों का है और तीसरा मनुष्यों से पुनर्जन्म लेने वालों का है।) हमारी चर्चा कहाँ तक पहुँची थी? (हम उस बिंदु तक पहुँचे थे जहाँ हम चर्चा कर रहे थे कि मनुष्यों से पुनर्जन्म लेने वाले लोगों में कैसे सामान्य मानवता होती है और उनकी मानवता के भीतर अंतरात्मा और विवेक कैसे होता है। इसमें उचित-अनुचित का भेद पहचानने और क्या सही है और क्या गलत, यह जानने की दो विशेषताएँ शामिल हैं।) एक है उचित-अनुचित का भेद पहचानना और दूसरी है यह जानना कि क्या सही है और क्या गलत; ये मनुष्यों की विशेषताएँ हैं। मनुष्यों में ये दो विशेषताएँ मुख्य रूप से इसलिए होती हैं क्योंकि उनमें अंतरात्मा और विवेक होता है; इसलिए, जिन लोगों में अंतरात्मा और विवेक होता है, वे उचित-अनुचित का भेद पहचानने और यह जानने में सक्षम होते हैं कि क्या सही है और क्या गलत। हमने इस पहलू पर कुछ विस्तार से संगति भी की थी। हमने मुख्य रूप से उन लोगों की अभिव्यक्तियों के बारे में संगति की थी जो उचित-अनुचित का भेद नहीं पहचान सकते और यह नहीं जान सकते कि क्या सही है और क्या गलत; हमने उनके नकारात्मक पक्ष की कुछ अभिव्यक्तियों को उजागर किया था और उसके बाद हमने बात की थी कि सकारात्मक चीजें क्या हैं, है ना? (हाँ।) आओ, आज मनुष्यों से पुनर्जन्म लेने के विषय पर संगति करना जारी रखें। जो लोग मनुष्यों से पुनर्जन्म लेते हैं, वे न केवल उचित-अनुचित का भेद पहचान सकते हैं, बल्कि वे यह भी जानते हैं कि क्या सही है और क्या गलत। उचित-अनुचित का भेद पहचानने का मुख्य अर्थ यह जानना है कि सकारात्मक चीजें क्या हैं और नकारात्मक चीजें क्या हैं—यानी, जो व्यक्ति सही और गलत का भेद पहचान सकता है, वह सभी प्रकार के लोगों, घटनाओं और चीजों का भेद पहचान सकता है; यहाँ तक कि जिन चीजों का सामना उसने पहले कभी नहीं किया है उनके बारे में भी वह अपनी अंतरात्मा और विवेक का उपयोग करके एक सामान्य आकलन कर लेगा। यदि उसे ऐसी चीजों का सामना करना पड़ता है और वह अपनी अंतरात्मा में बेचैनी महसूस करता है या वह इन चीजों को अपने विवेक के साथ सही नहीं ठहरा पाता, तो वह एक बुनियादी चुनाव करेगा और अवचेतन रूप से ऐसी चीजों की सही या गलत प्रकृति को या सकारात्मक या नकारात्मक प्रकृति को महसूस करेगा। अर्थात् सच्चे इंसान अपनी अंतरात्मा या विवेक की मूल भावनाओं का इस्तेमाल करके उन अनजान चीजों का आकलन करते हैं जिनसे उनका सामना होता है; वे यह भेद पहचानते हैं कि वे सकारात्मक चीजें हैं या नकारात्मक चीजें और वे सही हैं या गलत। लेकिन जिन लोगों में अंतरात्मा और विवेक नहीं है, उनके लिए उचित-अनुचित का भेद पहचानना और यह जानना बहुत मुश्किल होता है कि क्या सही है और क्या गलत, चाहे बात अनजान चीजों की हो या जानी-पहचानी चीजों की। विशेष रूप से, समाज में दिखने वाली कुछ नई चीजों के बारे में यह जान पाने में तो वे और भी कम सक्षम होते हैं कि वे सही हैं या नहीं। वे यह भेद पहचान ही नहीं पाते कि वे सकारात्मक चीजें हैं या नकारात्मक। यहाँ तक कि अगर समाज में कोई सकारात्मक चीज दिखती है, तो उसके साथ कैसा बर्ताव करें इस मामले में और उसकी निंदा करने और ठुकरा देने के मामले में वे सांसारिक प्रवृत्तियों के साथ चलते हैं। यही इंसानों और गैर-इंसानों के बीच का अंतर है। तुम देखो, भले ही वे देखने में इंसानों जैसे ही लगते हों, कुछ लोगों ने कभी सत्य नहीं सुनाया परमेश्वर के वचनों का पोषण नहीं पाया; फिर भी, वे चाहे किसी भी परिवेश में क्यों न हों, उनके क्रियाकलापों की एक न्यूनतम सीमा होती है—कम-से-कम, अंतरात्मा की एक न्यूनतम सीमा तो होती ही है। वे ऐसे काम बिल्कुल नहीं करेंगे जो उनकी अंतरात्मा या नैतिकता के खिलाफ हों। ऐसा इसलिए है क्योंकि उनके दिल की गहराइयों में नकारात्मक चीजों के प्रति घृणा होती है और उनमें इंसानी अंतरात्मा और विवेक होता है; इसलिए, अपने आचरण और व्यवहार में वे नैतिकता की एक बुनियादी न्यूनतम सीमा बनाए रखते हैं। वहीं उन गैर-इंसानों की बात करें, तो उनकी श्रेणी की विशेषताओं को देखते हुए, उनमें अंतरात्मा और विवेक नहीं होता है। एक बात तो यह है कि वे सकारात्मक और नकारात्मक चीजों के बीच भेद नहीं पहचान पाते। दूसरी बात यह है कि उन नकारात्मक चीजों या यहाँ तक कि साफ तौर पर गलत चीजों के प्रति भी वे कोई विकर्षण या घृणा महसूस नहीं करते और न ही उनमें उन चीजों का प्रतिरोध करने की क्षमता होती है; यहाँ तक कि वे नकारात्मक चीजों से प्यार करने और बुरी प्रवृत्तियों का अनुसरण करने में भी सक्षम होते हैं। इससे भी ज्यादा अफसोस की बात यह है कि कुछ लोग जो परमेश्वर में विश्वास करते हैं और परमेश्वर का अनुसरण करने का दावा करते हैं, वे अब भी बुरी प्रवृत्तियों का अनुसरण कर सकते हैं और वही दुष्टतापूर्ण चीजें कर सकते हैं जो अविश्वासी करते हैं; ऐसा करते समय उन्हें न तो जरा भी शर्म महसूस होती है और न ही उनकी अंतरात्मा उन्हें धिक्कारती है।
आजकल बहुत-से लोग अपने फोन से सेल्फी लेते हैं। सामान्य मानवता वाले लोग किस तरह की तस्वीरें लेते हैं? वे ऐसी तस्वीरें लेते हैं जो अर्थपूर्ण और याद रखने लायक हों, जिसका उद्देश्य कुछ शानदार यादें पीछे छोड़ना होता है। अगर वे अपनी तस्वीरें लेते भी हैं, तो ऐसी तस्वीरें लेते हैं जो सभ्य, उपयुक्त, गरिमापूर्ण और शालीन दिखें। इस मामले में उनके सभी क्रियाकलाप सामान्य इंसान की अंतरात्मा और विवेक के दायरे में होते हैं। लेकिन जिन लोगों में अंतरात्मा और विवेक नहीं होता, वे अलग इंसान होते हैं; वे भी सेल्फी लेते हैं, लेकिन उनकी सेल्फी में कुछ समस्याएँ होती हैं। कुछ महिलाएँ किस तरह की तस्वीरें लेती हैं? वे गरिमापूर्ण, शालीन और उपयुक्त तस्वीरें नहीं लेतीं। जब वे उन अविश्वासी महिलाओं को ऑनलाइन कुछ भड़काऊ, कामुक या बहुत ही अजीब तस्वीरें लेते हुए देखती हैं, तो वे उनकी नकल करती हैं; वे भी कुछ ऐसी तस्वीरें लेती हैं जिन्हें देखकर मर्दों के मुँह में पानी आ जाए और उनके मन में कामुक विचार आने लगें—यानी, वे विशेष रूप से अपनी ऐसी तस्वीरें लेती हैं जिनमें वे वेश्याओं, चरित्रहीन औरतों जैसी दिखें या उनकी तस्वीरें कामुक दिखें। कुछ औरतों को बहुत ज्यादा मेकअप करना पसंद होता है, वे अपने चेहरे को बहुत ज्यादा गोरा और होठों को बहुत ज्यादा लाल रंग लेती हैं और आँखों का मेकअप इस तरह करती हैं कि वे अजीबोगरीब दिखती हैं। वे जानबूझकर कैमरे के सामने एक मनमोहक और लुभाने वाला अंदाज अपनाती हैं, उनकी आँखों में एक ऐसा जादू और कामुकता होती है जिसे देखकर मर्दों के मन में कामुक विचार आने लगते हैं। कुछ महिलाएँ ऐसी भी होती हैं जो अपने लंबे बालों को अपने चेहरे पर फैला लेती हैं, चेहरे को थोड़ा ऊपर की ओर उठाती हैं और बालों के बीच से एक मनमोहक और कामुक नजर दिखाती हैं। संक्षेप में कहें तो ऐसी महिलाएँ तस्वीरें लेते समय इस तरह के हाव-भाव और अंदाज अपनाती हैं जो उन्हें मनमोहक और सेक्सी लगते हैं। तस्वीरें लेने के बाद, ऐसी औरतों को खुद से बहुत ज्यादा प्यार हो जाता है, वे समय-समय पर अपनी ही भड़कीली तस्वीर को निहारती रहती हैं। यही नहीं, वे अपनी सबसे कीमती और पसंदीदा सेल्फी को अपने कंप्यूटर या फोन का वॉलपेपर बना लेती हैं; उनमें से कुछ महिलाएँ तो उन्हें ऑनलाइन भी डाल देती हैं। जब भी वे इन तस्वीरों को देखती हैं, तो उन्हें लगता है कि वे कितनी आकर्षक हैं, वे तो स्टार बनने के लिए ही पैदा हुई हैं और अगर उन्होंने परमेश्वर में विश्वास न किया होता, तो वे निश्चित रूप से कोई बहुत बड़ी हस्ती बन गई होतीं। देखो, वे किस तरह के रास्ते पर चल रही हैं? वे न सिर्फ हर समय अपनी तस्वीर को खुद ही निहारती रहती हैं, बल्कि वे इन तस्वीरों को अपने आस-पास के लोगों को भी दिखाती हैं। अगर तस्वीरें देखने के बाद लोग उनकी तारीफ नहीं करते, तो उन्हें अंदर ही अंदर बुरा लगता है। अगर उन्हें अपनी ही तरह का कोई ऐसा व्यक्ति मिल जाए जो उनकी तस्वीरों की खास तौर पर तारीफ करे और कहे, “यह तस्वीर कितनी बढ़िया खींची गई है, यह तो एकदम स्टार वाली तस्वीर है! यह तो बिल्कुल फलाँ-फलाँ जैसी लग रही है,” तो वे खुद से और भी ज्यादा खुश हो जाती हैं और हर दिन इसी भावना में डूबे रहती हैं। कुछ लोगों को अपनी तस्वीरों को सजाना-संवारना भी पसंद होता है, वे अपने सिर पर खरगोश के कान लगा लेते हैं और बिल्ली की मूंछें जोड़ लेते हैं, और सोचते हैं कि वे खरगोशों और बिल्लियों से भी ज्यादा प्यारे लग रहे हैं। वे जिससे भी मिलते हैं, उससे पूछते हैं, “आपको क्या लगता है, मैं खरगोश जैसा ज्यादा लग रहा हूँ या बिल्ली जैसा?” जब लोग कहते हैं, “क्या पता तुम कैसे दिखते हो?” तो वे बहुत गुस्सा हो जाते हैं। मुझे बताओ, क्या यह विकृत मानसिकता नहीं है कि कोई इंसान एक सही इंसान बनकर नहीं रहना चाहता, बल्कि जानवर बनना चाहता है? वे अपनी इन “बेमिसाल तस्वीरों” को ऑनलाइन भी पोस्ट करते हैं, ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों से तारीफ बटोर सकें। कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो सेल्फी लेते समय तलवारबाज या घुड़सवार योद्धाओं की तरह कपड़े पहनते हैं—या फिर पश्चिमी फिल्मों के स्पाइडर-मैन या बैटमैन की तरह दिखते हैं—या फिर वे खुद को एकदम अनूठा, सबसे अलग और रहस्यमयी किरदारों की तरह पेश करते हैं। वे यह सब इस उम्मीद से करते हैं कि दूसरे लोग उन्हें पसंद करेंगे और उन्हें स्वीकृति देंगे; वे हर दिन इसी दीवानगी में डूबे रहते हैं। मुझे बताओ, ये किस तरह के लोग हैं? क्या ये सामान्य लोग हैं? बिल्कुल नहीं; ये इंसान नहीं हैं। भले ही सेल्फी लेना इन बुरी प्रवृत्तियों के बीच एक बहुत ही छोटी और मामूली सी बात लगती है, लेकिन यह किसी इंसान की पसंद और उसके अनुसरणों का खुलासा करती है; यह उसके चरित्र का, उसकी मानवता की जरूरतों का और उसकी आत्मा की गहराइयों में छिपी बातों का खुलासा करती है। गरिमापूर्ण और सच्चे लोग मोबाइल फोन का, इस उपकरण का इस्तेमाल सकारात्मक, सार्थक और मूल्यवान चीजों की तस्वीरें लेने के लिए करते हैं, जबकि जिन लोगों में मानवता के गुण नहीं होते, वे नकारात्मक और दुष्ट चीजों की तस्वीरें लेते हैं—ऐसी चीजें जिनकी जरूरत उनके अपने प्रकृति सार को होती है। यह कहा जा सकता है कि कोई इंसान किस तरह का है, इस बात से यह तय होता है कि उसकी जरूरतें किस तरह की हैं, वह किस तरह की तस्वीरें लेता है, वह किस तरह से कपड़े पहनता है और अपनी छवि को किस तरह से पेश करता है। जिन लोगों में सामान्य मानवता होती है, वे यादगार के तौर पर कुछ गरिमापूर्ण, सच्ची, परिष्कृत, सार्थक और मूल्यवान तस्वीरें लेना पसंद करेंगे, जबकि जिन लोगों में सामान्य मानवता नहीं होती, वे दुनिया की बुरी प्रवृत्तियों का अनुसरण करेंगे और वही चीजें करेंगे जो उन्हें पसंद हैं। हालाँकि सेल्फी लेना एक छोटी सी बात है, फिर भी यह लोगों की अंतरतम की प्राथमिकताओं और अनुसरणों को देखने के लिए पर्याप्त है। मामला चाहे कोई भी हो—भले ही वह ऐसा मामला हो जिसमें सामान्य मानवता वाले लोग बहुत स्पष्ट रूप से यह न बता पाएँ कि कौन-सी चीजें सकारात्मक हैं और कौन-सी नकारात्मक; क्योंकि ऐसे लोग अपनी अंतरात्मा और विवेक से नियंत्रित होते हैं, इसलिए वे स्वाभाविक रूप से सकारात्मक चीजों को ही चुनेंगे। यदि भेद पहचानने की क्षमता की क्षणिक कमी के कारण वे कोई नकारात्मक चीज चुन लेते हैं या अनजाने में कुछ नकारात्मक कर बैठते हैं, तो उनके दिल में तुरंत एक एहसास जाग उठता है—उनकी अंतरात्मा उन्हें धिक्कारेगी या वे इसे अपने विवेक से सही नहीं ठहरा पाएँगे। जब ऐसे लोग जिनमें मानवता नहीं होती, सकारात्मक चीजों का सामना करते हैं, तब उन्हें लगता है कि सकारात्मक चीजें बहुत नीरस और फीकी हैं, जिक्र करने लायक नहीं हैं और लोग उन्हें तुच्छ समझते हैं, जबकि अपने दिल में वे खास तौर पर नकारात्मक चीजों को पसंद करते हैं और उनकी तारीफ करते हैं—खासकर उन चीजों की जो बुरी प्रवृत्तियों में बहुत लोकप्रिय हैं। अगर तुम इस तरह के इंसान की कोई गरिमापूर्ण और सीधी-सादी तस्वीर खींचते हो, तो उसे इससे घिन आएगी और वह नाक-भौं सिकोड़ते हुए कहेगा, “आजकल भला कौन ऐसी तस्वीरें खींचता है? यह तो बहुत पुराना तरीका है!” वे खुद ही कामुक तस्वीरें खींचना पसंद करते हैं। आम लोगों को ऐसी तस्वीरें घिनौनी और भद्दी लगती हैं, लेकिन इस तरह का इंसान कहता है, “यह सेक्सी है। क्या तुम समझते हो कि सेक्सी होना क्या है? यह फैशनेबल है; यह उच्च स्तरीय कला है। तुम्हें कला समझ नहीं आती!” उसे न सिर्फ अपनी कामुक तस्वीरें खींचते समय कोई घिन नहीं आती, बल्कि उसे इन फैशनेबल और कामुक चीजों का अनुसरण करना भी खास तौर पर पसंद होता है।
जो लोग इंसान नहीं हैं, वे नकारात्मक चीजों को लेकर बहुत ज्यादा उत्साहित रहते हैं। जब बुरी प्रवृत्तियों के बीच कुछ नकारात्मक चीजें दिखती हैं, तब वे तुरंत उनके बारे में जान लेते हैं और उन्हें बहुत आसानी से स्वीकार लेते हैं। अगर उन्हें मौका मिलता है और हालात अनुमति देते हैं, तो वे बुरी प्रवृत्तियों से जुड़ी उन चीजों को निश्चित रूप से करते हैं जो उन्हें पसंद आती हैं और जिन्हें वे स्वीकृति देते हैं। वे बिल्कुल भी इनकार नहीं करते और न ही वे तमाशबीन बनकर खड़े रहते हैं, उन चीजों से नफरत करना या उनसे दूर रहना तो दूर की बात है; इसके बजाय, वे पूरी तरह से उनमें डूब जाते हैं। खास तौर पर, कुछ ऐसे लोग भी हैं जो परमेश्वर में विश्वास रखते हैं, फिर भी पश्चिम से आने वाली कुछ प्रचलित कहावतों और तौर-तरीकों के अनुसार चलते हैं। उदाहरण के लिए, पश्चिम में ‘हैलोवीन’ नाम का एक त्योहार मनाया जाता है, जो असल में भूतों का त्योहार है। इस दिन बड़े और बच्चे सभी तरह-तरह के कपड़े पहनते हैं, ठीक वैसे ही जैसे किसी नाटक या थिएटर में कलाकार पहनते हैं। कोई चुड़ैल बनता है, तो कोई राजकुमार या राजकुमारी, और कोई मेंढक, साँप, डायनासोर वगैरह बनता है। फिर वे टोकरियाँ या थैले लेकर अलग-अलग मॉलों, दुकानों और घरों में जाकर मिठाइयाँ माँगते हैं। परमेश्वर में विश्वास रखने वाले कुछ लोग भी इस त्योहार को मनाते हैं और भूतों जैसे कपड़े पहनकर बहुत खुश होते हैं; उन्हें लगता है कि अलग-अलग तरह के किरदार निभाने का यह एक अच्छा मौका है। वे किस तरह के कपड़े पहनना पसंद करते हैं? वे सेना के अधिकारियों, जनरलों या नायकों जैसी अपेक्षाकृत सकारात्मक हस्तियों वाले कपड़े नहीं पहनते; बल्कि वे चुड़ैलों और तांत्रिकों जैसे कपड़े पहनने पर जोर देते हैं। भूतों के इस त्योहार को मनाने के लिए वे तरह-तरह के दानवों का रूप धरते हैं, उन्हें इसमें बहुत खुशी मिलती है और मजा आता है, लेकिन वे यह नहीं समझ पाते कि यह एक ऐसी चीज है जिससे परमेश्वर को घृणा है और मानव संसार में यह एक नकारात्मक चीज है। असल में, इस तरह के लोगों को इन नकारात्मक चीजों की कोई स्पष्ट समझ नहीं होती; उन्हें नहीं पता होता कि उन्हें अपनी पारंपरिक संस्कृति से जुड़ी चीजों और इन सांसारिक प्रवृत्तियों के साथ कैसे बर्ताव करना चाहिए। उन्हें इस बात की भी कोई सच्ची समझ नहीं होती कि वे स्वयं असल में हैं क्या; उन्हें यह भी नहीं पता होता कि वे इंसान हैं या भूत। उन्हें नहीं पता होता कि वे इंसान हैं या भूत, लेकिन उन्हें इंसान बनाना बहुत मुश्किल काम है; वहीं, अगर तुम उनसे कहो कि वे भूत या जानवर बन जाएँ, तो उन्हें इसमें बहुत मजा आता है और वे कभी इनकार नहीं करते। तो मुझे बताओ कि इस तरह के लोग असल में हैं क्या? अगर तुम उनसे कहते हो कि वे ऐसा इंसान बनें जिसमें अंतरात्मा और विवेक हो, तो वे अक्सर कहेंगे, “अंतरात्मा की क्या कीमत है? आजकल अंतरात्मा की परवाह कौन करता है? स्नेह और नैतिक न्याय की परवाह कौन करता है? नैतिकता की परवाह कौन करता है?” लेकिन अगर तुम उनसे कहते हो कि वे सज-धजकर किसी तांत्रिक की भूमिका निभाएँ या डायनासोर का कॉस्ट्यूम पहनकर डायनासोर बनें, तो उन्हें कोई एतराज नहीं होता या वे इनकार नहीं करते। मुझे बताओ, यह किस तरह का इंसान है? अपने प्रकृति सार में, क्या उसके मन में वाकई सकारात्मक चीजों के लिए जरा भी प्रेम है? क्या वह नकारात्मक चीजों से जरा भी घृणा करता है? ऐसे लोग जिन लोगों, घटनाओं और चीजों को चुनते हैं, उन्हें देखकर यह साफ जाहिर है कि उनके मन में सकारात्मक चीजों के लिए बिल्कुल भी प्रेम नहीं है और नकारात्मक चीजों के प्रति उन्हें बिल्कुल भी घृणा महसूस नहीं होती। इसके विपरीत, वे सकारात्मक चीजों से खास तौर पर घृणा करते हैं, उन्हें उपहास और तिरस्कार की नजर से देखते हैं। जहाँ तक नकारात्मक चीजों की बात है—खास तौर पर वे चीजें जो बहुत ज्यादा लोकप्रिय हैं और आजकल की बुरी प्रवृत्तियों में बहुत ज्यादा प्रचलित हैं—वे उनकी बहुत तारीफ करते हैं और उन्हें स्वीकृति देते हैं। खास तौर पर, कुछ लोगों को बुरी प्रवृत्तियों के साथ कदम से कदम मिलाकर चल पाने में गर्व महसूस होता है और वे दानवों, बुरी आत्माओं और जंगली जानवरों की भूमिकाएँ निभा पाते हैं, उन्हें लगता है कि वे बाकी लोगों से अलग हैं। जाहिर है कि इस तरह के इंसान में न तो अंतरात्मा होती है और न ही विवेक; कोई चीज बुरी प्रवृत्तियों से जितनी ज्यादा जुड़ी होती है, वे उसे उतना ही ज्यादा पसंद करते हैं। खास तौर पर कुछ पूर्वी लोग—जब वे लोगों को यह कहते हुए सुनते हैं कि पश्चिम में क्या लोकप्रिय है, पश्चिमी लोगों को क्या पसंद है, पश्चिमी लोग क्या पहनते और क्या इस्तेमाल करते हैं—तो वे भेद पहचानने की क्षमता का इस्तेमाल किए बिना उन सारी बातों को मान लेते हैं और उनकी नकल करने की कोशिश करते हैं। भले ही वह कोई दुष्टतापूर्ण चीज हो, जो अंतरात्मा और विवेक के खिलाफ हो और जो सत्य के भी खिलाफ जाती हो, फिर भी वे उसे स्वीकार कर लेते हैं। कुछ लोग कहते हैं, “क्या यह विदेशी चीजों की पूजा करना और विदेशियों की चापलूसी करना है?” क्या यह ऐसा है? (नहीं, अपने प्रकृति सार में वे बस इन दुष्टतापूर्ण चीजों को पसंद करते हैं।) बिल्कुल सही। उन्हें लगता है कि पूर्वी लोगों के बीच जो चीजें लोकप्रिय हैं, वे उतनी आधुनिक नहीं हैं, इसलिए वे पश्चिम में लोकप्रिय चीजों की नकल करते हैं; वे बाकी लोगों से अलग और अनोखे दिखना चाहते हैं; वे चाहते हैं कि दूसरे लोग उन्हें बहुत सम्मान की नजर से देखें। किसी भी मामले में, इस तरह के इंसान में मानवता वाले गुण बिल्कुल भी नहीं होते। उनकी प्राथमिकताओं और अनुसरणों को देखकर, और साथ ही हर मामले में उनके विचारों, दृष्टिकोणों और प्रकाशनों को देखकर ऐसा लगता है कि उनमें न तो कोई अंतरात्मा है और न ही विवेक। उनके विचार और दृष्टिकोण इंसानों जैसे बिल्कुल नहीं हैं, यहाँ तक कि वे दानवों और शैतान जैसे हैं। मामलों को देखने का उनका रुख और परिप्रेक्ष्य परमेश्वर की अपेक्षा के अनुसार एक सामान्य इंसान के रुख और परिप्रेक्ष्य के बिल्कुल विपरीत और विरोधी होता है। लेकिन, क्योंकि सच्चे इंसानों में जन्मजात रूप से मानवीय अंतरात्मा और विवेक होता है, इसलिए वे किसी भी व्यक्ति, घटना या चीज के बारे में अपनी अंतरात्मा और विवेक की भावनाओं के आधार पर राय बनाते हैं, वे उनमें से सकारात्मक चीजों को चुनते हैं और यह भेद पहचानते हैं कि क्या सही है और क्या गलत।
पूर्वी समाज के परिवेश में रहने वाले कुछ लोग पारंपरिक पूर्वी संस्कृति की सीमाओं में बंधे होते हैं और कुछ पूर्वी परंपराओं का पालन करते हैं। भले ही वे कुछ ऐसी चीजें नहीं करते जो उनकी अंतरात्मा और नैतिकता के खिलाफ हों, लेकिन मन ही मन वे उन चीजों को पसंद करते हैं। इसलिए, जैसे ही परिवेश बदलता है, जैसे ही उन्हें मौका मिलता है, वे अपनी मानवता का असली चेहरा दिखा देते हैं; उनका बाहरी रूप पूरी तरह बदल जाता है और उनमें एक अमानवीय गुण प्रकट होता है। इस अमानवीय गुण को कैसे समझाया जाए? इसकी पहचान इस बात से होती है कि वे उचित-अनुचित का भेद नहीं पहचान पाते और यह नहीं जानते कि क्या सही है और क्या गलत, उनमें सामान्य इंसानों वाली अंतरात्मा और विवेक की कमी होती है। कुछ लोग, जब वे पूरब में होते हैं, तब बहुत ही नेक, गरिमापूर्ण, सदाचारी और सभ्य प्रतीत होते हैं, वे अपने परिवारों का खास ख्याल रखते हैं और बदनामी से मुक्त होते हैं। लेकिन जब वे पश्चिम में जाते हैं, तब वे बिल्कुल अलग इंसान बन जाते हैं। वे कुछ लोगों को यह कहते हुए सुनते हैं, “पश्चिमी लोग विशेष रूप से खुले विचारों वाले होते हैं; उन्हें पुरुष और महिला के बीच संबंधों के मामले में विशेष रूप से आजादी होती है।” वास्तव में यह बात तथ्यों के अनुरूप नहीं है, लेकिन अपनी सोच और धारणाओं के आधार पर वे यह मान लेते हैं कि पश्चिम में पहुँचते ही वे पूरी तरह आजाद हो गए हैं और अब उन्हें अपनी प्रतिष्ठा या नैतिक मूल्यों या पारंपरिक पूर्वी संस्कृति की बातों की चिंता करने की जरूरत नहीं है। उन्हें लगता है कि अब महिलाओं को ‘स्त्री-धर्म’ का पालन करने की जरूरत नहीं है और पुरुषों को भी ‘एक-पत्नी-व्रत’ का पालन करने की जरूरत नहीं है; उन्हें लगता है कि पश्चिम में आने के बाद वे विपरीत लिंग के लोगों के साथ खुला बर्ताव कर सकते हैं और कोई भी उन पर हँसेगा नहीं या उनकी आलोचना नहीं करेगा। उन्हें लगता है कि पश्चिमी संस्कृति ऐसी ही है, यही वहाँ की सामाजिक प्रवृत्ति है और कोई भी इसका विरोध नहीं करता। जब वे इस तरह सोचने लगते हैं, तब क्या वे अब ‘अच्छे रास्ते’ पर चलना बंद नहीं कर देते हैं? उनकी मानवता में वे चीजें जिन्हें वे वास्तव में पसंद करते हैं, अब उजागर होने लगती हैं; साथ ही, उनकी मानवता का असली चेहरा भी उजागर हो जाता है। जब पूर्वी देशों के लोग—खासकर चीनी लोग—पश्चिम में आते हैं, तब उनकी जिंदगी काफी मुश्किल हो जाती है, क्योंकि उनके जीवनसाथी तो उनके अपने देश में ही रह जाते हैं, जबकि वे खुद एक दूसरे देश में, अनजान लोगों के साथ और अनजान जगहों पर अकेले होते हैं। उन्हें न सिर्फ काम करना और जीना होता है, बल्कि कई अन्य जटिल मामलों से भी निपटना पड़ता है; ऐसे में वे खुद को बहुत ज्यादा अकेला महसूस करते हैं। इसलिए, संयुक्त राज्य अमेरिका में चीनी समुदाय के बीच एक तरह का “युद्धकालीन जोड़ा” लोकप्रिय हो गया है—इसमें एक अस्थायी घर बसाने और साथ रहने के लिए एक अस्थायी जीवनसाथी ढूँढ़ना शामिल है; वे जीवन की कठिनाइयों का मिलकर सामना करने के लिए एक-दूसरे की मदद और सहयोग करते हैं और साथ ही देह की शारीरिक जरूरतों को भी पूरा करते हैं। दूसरे देश में अकेले जीवन बिताना मुश्किल होता है, इसलिए बहुत-से लोग अपनी विभिन्न जरूरतों को पूरा करने के लिए विपरीत लिंग के किसी व्यक्ति को ढूँढ़कर एक युद्ध-कालीन जोड़ा बना लेते हैं। कहा जाता है कि कुछ युद्ध-कालीन जोड़े कई वर्षों तक साथ रहने के बाद, जब दोनों पक्षों के असली जीवनसाथी वापस आ जाते हैं, तब दोनों परिवार आपस में दोस्त भी बन जाते हैं और एक-दूसरे से मेलजोल भी रखते हैं। यह एक ऐसी प्रथा है जो जीवन की कठिनाइयों का सामना करने के लिए अविश्वासियों के बीच एक फैशन बन गई है। मुझे बताओ, क्या परमेश्वर में विश्वास रखने वालों में भी ऐसे लोग हैं जो ऐसी चीजें करते हैं? (कुछ अविश्वासी ऐसा भी कर सकते हैं।) परमेश्वर में विश्वास रखने वालों में भी ऐसे बहुत-से लोग हैं जो सत्य का अनुसरण नहीं करते; कुछ ऐसे भी लोग हैं जो जाहिर तौर पर छद्म-विश्वासी हैं और सत्य में उनकी बिल्कुल भी दिलचस्पी नहीं है। कुछ लोगों में तो अंतरात्मा और विवेक भी नहीं होता। जब ये लोग इन नकारात्मक बातों के बारे में सुनते हैं, तब अपने मन की गहराई में उन्हें असल में इनसे कोई घृणा नहीं होती; उन्हें लगता है कि ये बातें स्वीकार्य हैं और कुछ लोग तो इनमें मजा भी लेते हैं। उन्हें इन बातों से कोई घिन नहीं आती और वे यह भी सोचते हैं, “यह तो बहुत सामान्य बात है। सभी अविश्वासी ऐसा करते हैं; यह एक प्रवृत्ति है, कोई अपराध नहीं। पहली बात तो यह कि यह गैर-कानूनी नहीं है। दूसरी बात, इससे सार्वजनिक नैतिकता भ्रष्ट नहीं होती। तीसरी बात, यह इंसान की एक शारीरिक जरूरत है। ऐसा करना उचित, तर्कसंगत और कानूनी है—इसमें भला क्या गलत है?” उन्हें लगता है कि यह सामान्य है। चलो, अविश्वासियों की बात छोड़ देते हैं—अगर परमेश्वर में विश्वास रखने वाले लोग भी ऐसी चीजें कर सकते हैं, तो वे किस तरह के लोग हैं? क्या उनकी मानवता में कुछ गलत नहीं है? (हाँ, इस तरह के लोगों में मानवता बिल्कुल भी नहीं होती।) जिन लोगों में मानवता नहीं होती, वे ही ऐसी घिनौनी चीजें कर सकते हैं। जिन लोगों में मानवता होती है, वे ऐसी चीजें करना तो दूर की बात है, इस बुरी प्रवृत्ति से जुड़े विचारों और दृष्टिकोणों को स्वीकार भी नहीं कर सकते; वे अपने दिल की गहराई से इन चीजों से घृणा करते हैं और इन्हें बिल्कुल भी पसंद नहीं करते। भले ही ऐसा इसलिए किया जाता हो ताकि दोनों पक्ष एक-दूसरे की देखभाल कर सकें या इसका कोई और उद्देश्य हो, इंसान की अंतरात्मा और विवेक के परिप्रेक्ष्य से, “युद्धकालीन जोड़ा” बनाना कोई सकारात्मक चीज नहीं है। अगर कोई इंसान जो परमेश्वर में विश्वास रखता है, उसे यह भी नहीं पता कि इस तरह की चीज सकारात्मक चीज है या नहीं, यह तर्कसंगत है या नहीं, तो क्या उसके पास अंतरात्मा और मानवता है? कुछ लोग कहते हैं, “भले ही मुझे यह नहीं पता कि यह सकारात्मक चीज है या नहीं, मगर मैं परमेश्वर में विश्वास रखता हूँ, इसलिए मैं ऐसा नहीं कर सकता। अविश्वासी परमेश्वर में विश्वास नहीं रखते या परमेश्वर का भय नहीं मानते हैं, इसलिए उन्हें ऐसा करते समय कोई एहसास नहीं होता, लेकिन मैं परमेश्वर में विश्वास रखता हूँ, इसलिए मैं ऐसा नहीं कर सकता।” अगर वे ऐसा सोचते हैं, तो इससे साबित होता है कि उनके पास इंसानी अंतरात्मा और विवेक है। भले ही उन्हें यह न पता हो कि यह बात सही है या नहीं और न ही उन्हें यह पता हो कि यह कोई सकारात्मक चीज है या नहीं या परमेश्वर इसके बारे में क्या कहता है, फिर भी वे इंसान की मूलभूत अंतरात्मा और विवेक का इस्तेमाल करके इसका आकलन कर सकते हैं। भले ही वे स्पष्ट रूप से न जान पाएँ कि यह सकारात्मक है या नकारात्मक, फिर भी वे देख सकते हैं कि यह बात नैतिकता और मानवता के खिलाफ है और ऐसा नहीं किया जाना चाहिए। ऐसी चीजों के बारे में उनमें एक खास स्तर की भेद पहचानने की क्षमता होती है, इसलिए जब ऐसी चीजें उनके साथ होती हैं, तो वे उन्हें नकार देते हैं। यह कहा जा सकता है कि जो लोगइनकार नहीं करते और ऐसी चीजों को पूरी तरह से स्वीकार कर लेते हैं, वे इंसान नहीं हैं; उनमें सामान्य मानवता नहीं है और उनमें अंतरात्मा और विवेक नहीं है। यह तथ्य कि वे इन नकारात्मक चीजों को स्वीकार कर सकते हैं, यह दिखाता है कि उनकी अंतरात्मा और विवेक बिल्कुल भी काम नहीं करता है; उन्होंने ऐसी चीजों का भेद पहचानने, उनका प्रतिरोध करने या उन्हें इनकार करने के लिए उस न्यूनतम मानक यानी अंतरात्मा और विवेक का इस्तेमाल नहीं किया है; इसलिए, जाहिर है कि इस तरह के व्यक्ति की मानवता में कोई न कोई समस्या है। कुछ लोग कहते हैं, “इस तरह के व्यक्ति की मानवता में समस्या है, तो क्या वे जानवरों में से हैं या दानवों में से?” चाहे वे जानवर हों या दानव, उन्हें सामूहिक रूप से ‘अमानव’ कहा जाता है। जब वे पश्चिम में आते हैं और देखते हैं कि पश्चिमी देश विकसित, समृद्ध और आजाद हैं, और उनकी सामाजिक व्यवस्थाएँ पूर्वी देशों की व्यवस्थाओं की तुलना में ज्यादा उन्नत हैं, तब उन्हें लगता है कि पश्चिम में सब कुछ सही है और पूरब से बेहतर है। उन्हें लगता है कि पूर्वी लोग संकुचित सोच वाले, रूढ़िवादी और सांसारिक बातों से अनजान होते हैं, जबकि पश्चिमी लोग खुले विचारों वाले, आजाद और सांसारिक तौर पर बुद्धिमान होते हैं और वे शादी या विपरीत लिंगों के बीच संबंधों के मामले में विशेष रूप से खुले होते हैं। उन्हें लगता है कि जब कोई पुरुष और महिला सड़क पर मिलते हैं, तब उनका एक-दूसरे को गले लगाना और चूमना बहुत ही सामान्य बात है। लेकिन असल में, पश्चिमी लोगों के गले मिलने के भी कुछ सिद्धांत होते हैं; वे किसी को भी यूँ ही गले नहीं लगा लेते। खासकर, वयस्क लोग इस तरह की चीजें ज्यादा नहीं करते; ज्यादातर युवा लोग ही ऐसा करना पसंद करते हैं। इसके विपरीत, जिन जगहों पर एशियाई लोग इकट्ठा होते हैं, वहाँ अक्सर एक पुरुष और महिला को सार्वजनिक जगहों पर, खासकर सड़क के भीड़भाड़ वाले इलाकों में, कई तरह की अंतरंग हरकतें करते हुए देखा जा सकता है। वहाँ तो बड़े-बुजुर्गों को भी ऐसा करते हुए देखा जा सकता है, जो देखने में बहुत घिनौना लगता है। शायद कुछ एशियाई लोग पश्चिम की यात्रा पर गए और उन्होंने पश्चिम के लोगों की सांस्कृतिक जीवन-शैली और तौर-तरीके देखे, फिर यह दावा किया कि पश्चिमी लोग आजाद, खुले-विचारों वाले होते हैं और मुक्त यौन संबंध रखते हैं। इन्हीं दावों के आधार पर, कई एशियाई लोग मनमाने ढंग से अपने मन में सभी तरह की दुष्टतापूर्ण चीजों की कल्पना कर लेते हैं। असल में, अगर तुम पश्चिमी समाज को सचमुच करीब से देखो या पश्चिमी लोगों के साथ गहराई से जुड़ो और मेलजोल करो, तो तुम पाओगे कि बहुत-सी बातें वैसी बिल्कुल नहीं हैं जैसा कि एशियाई लोग सोचते हैं और कहते हैं। खासकर धार्मिक पृष्ठभूमि वाले कुछ समुदायों में या ज्यादा दूर-दराज के इलाकों में रहने वाले समुदायों में, लोग विशेष रूप से रूढ़िवादी और पारंपरिक होते हैं, वे एशियाई लोगों द्वारा फैलाई गई मनगढ़ंत कहानियों के किरदारों जैसे बिल्कुल भी नहीं होते। ऐसे दावे कि पश्चिमी लोग विपरीत लिंग के लोगों के साथ संबंधों को लेकर बहुत खुले-विचारों वाले होते हैं, केवल लोगों की कल्पनाएँ हैं, इनमें कोई सच्चाई नहीं है। अगर कोई सचमुच ऐसा सोचता है और इस तथाकथित ‘खुलेपन’ को, जिसे वह सच मानता है, खुद पर भी लागू करता है और मनमाने ढंग से अपनी दैहिक वासनाओं में लिप्त हो जाता है, तो यह उसकी अपनी समस्या है; इसका किसी भी समाज की प्रवृत्तियों, संस्कृति या परंपराओं से कोई लेना-देना नहीं है। उन्हें पश्चिमी संस्कृति या परंपराएँ गुमराह नहीं करती हैं, बल्कि समस्या उनके अपने भीतर है। क्या ऐसा नहीं है? (हाँ।) जब पूर्वी लोग पश्चिमी लोगों का जिक्र करते हैं, तब सबसे पहली बात वे यही कहते हैं, “पश्चिमी लोग आजाद, खुले-विचारों वाले होते हैं और मुक्त यौन संबंध रखते हैं,” जिसका मतलब वे यह निकालते हैं कि पश्चिम के लोग अपनी वासनाओं में लिप्त हो सकते हैं या यहाँ तक कि अपने ही परिवार के लोगों के साथ यौन संबंध बना सकते हैं। ऐसी ही सोच और विचारों से प्रभावित होकर, पूर्वी लोग पश्चिम में पहुँचने के बाद खुद भी इन्हीं चीजों में लिप्त होने लगते हैं। उनका इन चीजों में लिप्त होना इसलिए नहीं होता है कि उन्होंने सचमुच वहाँ ऐसा होते देखा और उसकी नकल की, बल्कि ऐसा सिर्फ इसलिए होता है क्योंकि दुष्टता से प्रेम करना उनकी प्रकृति में बसा होता है; वे तथाकथित ‘पश्चिमी संस्कृति’ या ‘पश्चिमी परंपराओं’ को अपनी दैहिक वासनाओं को तृप्त करने के लिए बस एक बहाने के तौर पर इस्तेमाल करते हैं। असल में, क्योंकि इस तरह के लोग कोई सकारात्मक व्यक्तित्व नहीं होते और उनमें मानवता के गुण भी नहीं होते, और क्योंकि नकारात्मक चीजों और सभी गलत चीजों से प्रेम करना उनकी सहज प्रकृति होती है, इसलिए वे ऐसी चीजें करने के लिए तरह-तरह के बहाने और आड़ ढूँढ़ लेते हैं जो सकारात्मक चीजों के विपरीत होती हैं या यहाँ तक कि उनकी विरोधी होती हैं। इसके अलावा, उन्हें अपना यह रवैया पूरी तरह से न्यायोचित लगता है, क्योंकि वे सोचते हैं कि आजकल सभी पश्चिमी लोग ऐसे ही होते हैं। क्या यह तथ्यात्मक है? वे बस बेतुकी बातें करते हैं और निराधार आरोप लगाते हैं! जाहिर है कि जब ऐसे लोग कहते हैं, “पश्चिमी लोग आजाद, खुले-विचारों वाले होते हैं और मुक्त यौन संबंध रखते हैं,” तो असल में उनके मन में कोई और ही इरादा छिपा होता है—और वह इरादा होता है अपनी वासनाओं को तृप्त करने का अपना लक्ष्य हासिल करना। इस तरह के लोग इतने आत्मविश्वास के साथ इन नकारात्मक चीजों का अनुसरण क्यों कर पाते हैं? एक बात तो यह है कि उन्हें सकारात्मक और नकारात्मक चीजों की सही समझ नहीं होती; जब उनका सामना किसी अनजान चीज से होता है, तब वे उसका आकलन करने के लिए न्यूनतम मापदंड यानी अंतरात्मा और विवेक का इस्तेमाल नहीं कर पाते। जाहिर है कि इस तरह के लोगों में मानवता के गुण नहीं होते। अगर वे किसी स्पष्ट रूप से सकारात्मक चीज को सकारात्मक चीज के तौर पर समझ नहीं पाते और न ही उसे सकारात्मक चीज के तौर पर स्वीकार पाते हैं, तो इस तरह के व्यक्ति में निश्चित रूप से एक सामान्य इंसान की अंतरात्मा और विवेक नहीं है। दूसरी बात, अगर किसी को यह नहीं पता है कि सकारात्मक चीजें क्या होती हैं और नकारात्मक चीजें क्या होती हैं, तो जाहिर है कि वे सही और गलत, उचित और अनुचित के बीच भेद नहीं पहचान सकते। क्योंकि उनके विचार और दृष्टिकोण गलत होते हैं, इसलिए अगर वे कुछ गलत चीजें भी करते हैं या ऐसी चीजें करते हैं जो अंतरात्मा और विवेक के खिलाफ होती हैं, तो भी उन्हें इस बात का जरा भी एहसास नहीं होता। यह बिल्कुल स्पष्ट है कि इस तरह का व्यक्ति सही और गलत, उचित और अनुचित के बीच का भेद नहीं पहचान सकता। उसमें सामान्य इंसानों वाली अंतरात्मा और विवेक नहीं होता; उन्हें यह पता ही नहीं होता कि जीवन में या जीवित रहने की प्रक्रिया में होने वाली कुछ चीजें सही हैं या गलत; न ही उनके लिए अपनी अंतरात्मा का इस्तेमाल करके उन चीजों के सही या गलत होने का आकलन और मूल्यांकन करना संभव होता है। इसलिए, वे अक्सर ऐसी गलत चीजें कर बैठते हैं जो अंतरात्मा और विवेक के खिलाफ होती हैं; और उन चीजों को करने के बाद उन्हें इस बात का जरा भी एहसास नहीं होता, यहाँ तक कि वे खुद को पूरी तरह से सही ठहराते हैं, यह सोचते हैं कि उन्होंने जो किया वह बिल्कुल सही था और वे सच्चे इंसान हैं। क्या यह चीजों की असलियत को पूरी तरह से उलट देना नहीं है? (हाँ।)
कुछ लोग दूसरों के बच्चों को विशेष रूप से शरारती देखकर कहते हैं, “कितना शरारती बच्चा है; एक नजर में ही पता चल जाता है कि वह अच्छा बच्चा नहीं है। बड़ा होकर वह निश्चित रूप से सही काम करने में लापरवाही करेगा। वह भला कैसे कुछ बन पाएगा?” लेकिन अगर दूसरे लोग उस व्यक्ति से कहें कि उसका बच्चा शरारती है, तो वह जवाब देता है, “अगर वह शरारती है, तो क्या हुआ? मेरे बच्चे का शरारती होना उसके उज्ज्वल भविष्य की अभिव्यक्ति है। जब वह बड़ा होगा, तो वह भीड़ से ऊपर उठकर अपनी पहचान बना पाएगा; शायद वह कोई बड़ा अधिकारी भी बन जाए!” जब दूसरे लोगों के बच्चे शरारती होते हैं, तब वह कहता है कि बड़े होकर वे कुछ नहीं बन पाएँगे, लेकिन जब उसका अपना बच्चा शरारती होता है, तब वह कहता है कि बड़ा होकर वह भीड़ से ऊपर उठ पाएगा। उसकी इन बातों में से कौन-सी बात सही है? (कोई भी नहीं।) तो फिर वह ऐसा क्यों कहता है? क्या वह निष्पक्ष होकर बोल रहा है? (नहीं।) उसका ऐसी बातें कह पाना यह दिखाता है कि उसमें अंतरात्मा की कोई जागरूकता नहीं है। दूसरे लोगों के बच्चे अभी बड़े भी नहीं हुए हैं, तो वह यह कैसे कह सकता है कि वे कुछ नहीं बन पाएँगे? लोग बड़े होकर कुछ बन पाएँगे या नहीं, यह परमेश्वर के विधान और उनके चुने हुए मार्ग पर निर्भर करता है; यह भला उसके एक वाक्य पर कैसे निर्भर कर सकता है! उसका ऐसी बातें कह पाना यह दिखाता है कि उसमें अंतरात्मा की कोई जागरूकता नहीं है। शरारती होने की समस्या एक ही है, फिर भी जब अपने बच्चे की बात आती है, तब वह उसे सकारात्मक रूप दे देता है, वहीं जब दूसरों के बच्चों की बात आती है, तब वह उसे नकारात्मक रूप दे देता है। क्या उसके शब्द निष्पक्ष हैं? (नहीं।) तो फिर किस तरह का व्यक्ति निष्पक्ष होता है? (वह व्यक्ति जिसके पास अंतरात्मा हो।) अंतरात्मा वाले व्यक्ति के गुण क्या होते हैं? अंतरात्मा वाले व्यक्ति में दो गुण होते हैं : नेकी और दयालुता। नेक इंसान होने का मतलब कम से कम यह है कि जब वह बोलता है और काम करता है, तब उसका दिल सच्चा होना चाहिए। उसके बोले गए शब्द निष्पक्ष, वस्तुनिष्ठ और तथ्यात्मक होने चाहिए; वे पक्षपातपूर्ण नहीं होने चाहिए, न वे कमियों को छिपाने वाले होने चाहिए और न ही केवल भावनाओं पर आधारित होने चाहिए। जब दूसरे लोगों के बच्चे शरारती होते हैं, तब वह कहता है कि बड़े होकर वे किसी काम के नहीं होंगे, लेकिन जब उसका अपना बच्चा शरारती होता है, तब वह कहता है कि बड़े होकर उसका भविष्य उज्ज्वल होगा। शरारत की एक ही अभिव्यक्ति का वह दो अलग-अलग तरह से वर्णन करता है। क्या तुम कहोगे कि यह व्यक्ति नेक है? (नहीं।) क्या किसी ऐसे व्यक्ति के पास, जो केवल अपनी भावनाओं के आधार पर बोलता है, अंतरात्मा होती है? (नहीं।) केवल यही बात यह साबित करने के लिए काफी है कि उसके पास कोई अंतरात्मा नहीं है। वह अपने बच्चे के बारे में केवल अच्छी बातें कहता है, उसे आशीष और शुभकामनाएँ देता है, लेकिन जब वह दूसरों के बच्चों के बारे में बात करता है, तब उन्हें कोसता है। यह दयाहीन होना है, नेक होना नहीं। चूँकि उसके पास कोई अंतरात्मा नहीं है, वह ऐसे दुर्भावनापूर्ण शब्द बोल पाता है। ऐसा व्यक्ति निष्पक्षता से नहीं बोलता और उसकी बातों में कुतर्क के सिवाय कुछ नहीं होता। एक तरफ, यह दिखाता है कि वह नेक इंसान नहीं है; वहीं दूसरी तरफ, यह दिखाता है कि वह दयालु नहीं है। जो लोग दयालु नहीं होते, वे दूसरों की स्थितियों को हमेशा बुरा ही बताते हैं, चाहे वे स्थितियाँ कैसी भी क्यों न हों। वे छिपे हुए इरादों के साथ बोलते हैं और बेसब्री से यह आशा करते हैं कि दूसरों के साथ बुरा हो जाए। उनकी बातों में दुर्भावना और दूसरों को कोसने की भावना छिपी होती है। वे हमेशा इसी तरह बोलते हैं और उनकी अंतरात्मा उन्हें कभी भी इसके लिए नहीं कचोटती। वे दूसरों के मामलों के बारे में इसी तरह बात करते हैं और दूसरों के साथ उनका व्यवहार भी ऐसा ही होता है। उदाहरण के लिए, मान लो कि किसी महिला के पति का किसी दूसरी औरत के साथ चक्कर चल रहा है। इस डर से कि इस बारे में लोग क्या कहेंगे, वह दूसरों से कहती है, “मेरा पति इसलिए किसी दूसरी औरत के साथ चक्कर चला रहा है, क्योंकि वह बहुत ही असाधारण व्यक्ति है। वह दिखने में अच्छा और काबिल है। आजकल के इस बुरे समाज में, ऐसी औरतें इतनी बेशर्म हो गई हैं—वे खुद ही उसके पीछे पड़ जाती हैं। यह सब इसलिए हो रहा है, क्योंकि वह बहुत ही असाधारण है। इससे यह भी साबित होता है कि मैंने उसे पहचानने में कोई गलती नहीं की थी; मेरी पसंद कितनी बढ़िया है!” लेकिन अगर किसी और का पति किसी दूसरी औरत के साथ चक्कर चला रहा हो, तो वह कहती है, “साफ पता चलता है कि वह कोई शरीफ आदमी नहीं है। उसके पास न तो पैसा है, न ही वह दिखने में अच्छा है, फिर भी वह दूसरी औरतों के पीछे भाग रहा है। जो कोई भी औरत उसके साथ रहती है, वह अंधी है!” वह उस औरत को यह सलाह भी देती है कि वह जल्दी से अपने पति को छोड़ दे और कोई नया पति ढूँढ़ ले। तब वह औरत उससे पूछती है, “तुम्हारा पति भी तो किसी दूसरी औरत के साथ चक्कर चला रहा है, तो तुम खुद कोई नया पति क्यों नहीं ढूँढ़ लेती?” वह कहती है, “मेरा पति तुम्हारे पति से अलग है। तुम्हारा पति एक बदमाश है। मेरा पति तो बहुत ही असाधारण है और दूसरी औरतें खुद ही उस पर डोरे डालती हैं। मेरा पति खुद को रोक नहीं पाया, जबकि तुम्हारे पति ने तो जानबूझकर एक रखैल रखी।” तुमने देखा, जब बात खुद उस पर आती है, तब हर चीज के बारे में उसकी राय बदल जाती है। उससे जुड़ी कोई भी बात माफ करने लायक और एक खास मामला बन जाती है; वह हर चीज को सकारात्मक नजरिए से देखती है। लेकिन जब बात दूसरों की आती है, तब मामला अलग होता है; वह हर चीज को बुरा बताती है। फिर, अगर ऐसे व्यक्ति के माता-पिता परमेश्वर में विश्वास नहीं रखते, तो वह क्या कहेगा? “भले ही मेरे माता-पिता परमेश्वर में विश्वास नहीं रखते, फिर भी वे दुनिया में अच्छे लोग हैं। वे न तो किसी से झगड़ा करते हैं, न ही किसी को कोसते हैं और जो भी मुश्किल में होता है, उसकी मदद करते हैं। वे दूर-दूर तक बहुत ही अच्छे और दयालु लोगों के तौर पर जाने जाते हैं। अगर वे परमेश्वर में विश्वास रखते, तो निश्चित रूप से हमसे भी बेहतर होते!” फिर भी, जब कुछ भाई-बहनों के माता-पिता परमेश्वर में विश्वास नहीं रखते हैं, तब वे कहते हैं, “तुम्हारे माता-पिता तो पूरे दानव हैं।” जब कुछ भाई-बहनों के माता-पिता परमेश्वर में विश्वास रखते हैं, तब वे कहते हैं, “भले ही वे परमेश्वर में विश्वास करते हों, वे केवल नाम के विश्वासी हैं और वे किसी काम के नहीं हैं। अगर वे परमेश्वर में विश्वास रखते हैं, तो वे तुम्हारे कर्तव्य करने में तुम्हारा साथ क्यों नहीं देते?” जब बात खुद पर आती है, तब उनकी राय बदल जाती है। वे कभी भी निष्पक्ष तथ्यों के आधार पर नहीं बोलते और उनके शब्द कभी भी निष्पक्ष नहीं होते। अपने मामलों के लिए उनका अलग मानक होता है और दूसरों के मामलों के लिए अलग मानक होता है। उनके दिल की गहराई में, सभी तरह के लोगों, घटनाओं और चीजों का आकलन करने का कोई निष्पक्ष मानक नहीं होता। जो कुछ भी उनसे जुड़ा होता है, वह अच्छा और सकारात्मक होता है और उसके पीछे कई न्यायोचित कारण होते हैं; जो कुछ भी दूसरों से जुड़ा होता है, उसकी निंदा और बुराई की जानी चाहिए और उसे ठुकराया जाना चाहिए, वह दानवों और शैतान का काम है। जहाँ तक उनके परिवार, रिश्तेदारों और दोस्तों की बात है, वे सभी अच्छे लोग, सच्चे विश्वासी और भाई-बहन होते हैं। लेकिन जब कलीसिया के भाई-बहनों की बात आती है, तो वे मनमाने ढंग से उनकी आलोचना करते हैं, यह कहते हुए कि यह व्यक्ति छद्म-विश्वासी है, वह व्यक्ति अपना कर्तव्य करने में समर्पित नहीं है और उसे बाहर निकाल देना चाहिए। अगर कोई भाई या बहन कोई छोटी-सी गलती करता है या उसमें कोई छोटी-सी समस्या होती है, तो वे तुरंत उसे पकड़ लेते हैं, उसे सबके सामने ले आते हैं, फिर अपनी आँखों में सख्त भाव लिए उन्हें भाषण देते हैं और नीचा दिखाते हैं। लेकिन जब उनके अपने रिश्तेदार कुछ गलत करते हैं, तब वे बस मामले को रफा-दफा करने की कोशिश करते हैं और कुतर्कों के जरिए उनका बचाव करने का हर संभव प्रयास करते हैं। क्या ऐसे व्यक्ति में कोई निष्पक्षता होती है? (नहीं।) उसमें बिल्कुल भी निष्पक्षता नहीं होती। भाई-बहनों और अन्य लोगों से निपटते समय वे अपनी आँखों में सख्त भाव लिए “सिद्धांतों का पालन” करते हैं, यह महसूस करते हैं कि उनके पास सत्य वास्तविकता है। वे अक्सर दूसरों के सामने डींगें मारते हैं, और कहते हैं, “देखो, मैं सिद्धांतों का कितना अधिक पालन करता हूँ। मेरा रुख कितना दृढ़ है। मैं सत्य का अभ्यास कितने अच्छे से कर सकता हूँ।” लेकिन जब उनके अपने पारिवारिक मामलों की बात आती है—उनके पति या पत्नी, बच्चों, रिश्तेदारों, और यहाँ तक कि उनके कुत्ते की भी बात आती है—तो उनका रवैया बदल जाता है। उदाहरण के लिए, अगर उनका कुत्ता किसी अजनबी को देखते ही भौंकता है और जब कोई परिचित मिलने आता है तो किसी को भी काट लेता है, तो वे कहते हैं, “देखो, यह कुत्ता सचमुच एक अच्छा, विश्वसनीय रखवाला है। यह अपने मालिक, यानी मेरे प्रति पूरी तरह से वफादार है; यह कभी नहीं बदलता!” लेकिन अगर किसी और का कुत्ता किसी भी परिचित को देखकर काट लेता है, तो वे कहते हैं, “यह कुत्ता तो अंधा है। यह तो देखता भी नहीं कि कौन आया है। घर की रखवाली करने में इसका कोई सिद्धांत ही नहीं है। यह आँख मूँदकर क्यों काट रहा है?” वे कुत्तों के साथ भी निष्पक्ष नहीं हैं। ये किस तरह के इंसान हैं? (ये तो इंसान ही नहीं हैं।) उन्हें लगता है कि वे जो कुछ भी करते हैं, वह सब सही और तर्कसंगत है और यह सकारात्मक चीजों के अनुरूप है; उन्हें यह तक लगता है कि वे सत्य सिद्धांतों का पालन कर रहे हैं। लेकिन जब उनके किसी अन्यायपूर्ण काम या उनके द्वारा व्यक्त किसी कुतर्क की बात आती है, तब उन्हें वह कभी गलत नहीं लगता और न ही वे उसे कभी सुधारते हैं। अगर तुम उन्हें धिक्कारते हो या उजागर करते हो, तो वे उसे स्वीकार नहीं करते। इसका अंतिम नतीजा क्या होता है? नतीजा यह होता है कि वे अपने ही दावों और अपने तथाकथित सिद्धांतों पर अड़े रहते हैं; यहाँ तक कि वे ऐसे पेश आते हैं मानो वे ही न्याय के प्रतिरूप हों और हर मामले का मूल्यांकन वे ही करेंगे। वास्तव में, जिस परिप्रेक्ष्य और रुख से वे चीजों के सही-गलत होने का मूल्यांकन करते हैं, वे सत्य सिद्धांतों के पूरी तरह से विपरीत और विरोधी हैं; फिर भी उन्हें खुद इस बात का कभी एहसास नहीं होता। वे ढेरों पाखंड और भ्रांतिपूर्ण तर्क गढ़ते हैं और अड़ियल बनकर इन्हीं बातों से चिपके रहते हैं; यहाँ तक कि वे सत्य का विरोध करते हैं और उन लोगों से बहस करने की कोशिश करते हैं जो सही-गलत का भेद पहचान सकते हैं और सत्य समझते हैं। ये किस तरह के लोग हैं? ये विवेकहीन लोग हैं। भले ही वे जो करते हैं और जिस बात पर जोर देते हैं उसे लोगों की नजर में गलत न माना जाता हो, फिर भी उनकी कई अभिव्यक्तियों और खुलासों को देखकर साफ पता चलता है कि उनमें मानवता के गुण, जैसे कि नेकी, दयालुता और समझ बिल्कुल भी नहीं हैं। दैनिक जीवन में वे विभिन्न लोगों, घटनाओं और चीजों के साथ जिस तरह से पेश आते हैं, उसे केवल देखकर पता चल जाता है कि एक बच्चे या कुत्ते के बारे में भी उनका मूल्यांकन कितना विकृत है—चाहे उनका अपना कुत्ता कितना भी बुरा क्यों न हो, उनकी नजर में वह दुनिया का सबसे अच्छा कुत्ता होता है; और चाहे किसी और का कुत्ता कितना भी अच्छा क्यों न हो, वे उसके बारे में एक भी अच्छा शब्द नहीं बोल पाते। वे किसी भी इंसान या मामले का निष्पक्षता से मूल्यांकन बिल्कुल नहीं करते, किसी भी इंसान से या मामले को लेकर निष्पक्षता से व्यवहार करने की तो बात ही छोड़ दो। उनकी मानवता में सिर्फ भावनाएँ और पक्षपात ही भरे होते हैं। वे सिर्फ अपने हितों की और अपने से जुड़े लोगों, घटनाओं और चीजों की ही परवाह करते हैं। इसके अलावा, उन्हें जीवन में कोई भी काम करने लायक नहीं लगता। लोगों के किसी भी समूह में और किसी भी मामले में, उनकी प्रकृति का जो गुण अभिव्यक्त होता है, वह यह है कि वे सभी वस्तुनिष्ठ लोगों, घटनाओं और चीजों को तोड़-मरोड़कर पेश करते हैं और उन्हें गलत ढंग से दिखाते हैं। वे उनका मूल्यांकन और उनके साथ व्यवहार पूरी तरह से अपने विचारों और दृष्टिकोणों के अनुसार या इस आधार पर करते हैं कि वे उनके लिए कितने फायदेमंद हैं।
इस तरह के लोग, जिनमें मानवता के गुण नहीं होते, उनमें मानवता की नेकी, दयालुता और समझ नहीं होती है। इन अभिव्यक्तियों से देखा जाए, तो क्या ऐसे लोगों के साथ निपटना मुश्किल नहीं होता? (हाँ।) उनसे निपटना मुश्किल होता है और उनके साथ तालमेल बिठाना भी मुश्किल होता है। तुम उन्हें कभी भी सही विचारों और दृष्टिकोणों को स्वीकारने के लिए तैयार नहीं कर सकते, क्योंकि उनमें सकारात्मक चीजों को स्वीकारने की क्षमता ही नहीं होती। इसका मतलब है कि उनमें किसी भी सही विचार और दृष्टिकोण को स्वीकारने की स्थितियाँ ही नहीं होती। इसलिए, कई सही दृष्टिकोणों और सकारात्मक चीजों का वे गलत मतलब निकालते हैं और उन्हें तोड़-मरोड़ देते हैं; और जब उन बातों को तोड़-मरोड़ दिया जाता है, तब वे विशेष रूप से इस तरह के व्यक्ति के विभिन्न विचार, दृष्टिकोण और दावे बन जाते हैं। भले ही वे परमेश्वर में विश्वास करते हों, चाहे उन्होंने परमेश्वर के कितने भी वचन पढ़े हों या कितने भी धर्मोपदेश और संगतियाँ सुनी हों, वे हमेशा अपने दिल में अपने ही भ्रामक विचारों और दृष्टिकोणों को थामे रहते हैं और उन्हें कभी नहीं छोड़ते। भले ही परमेश्वर उन्हें सत्य प्रदान करे, वे परमेश्वर के सही विचारों और दृष्टिकोणों को स्वीकार नहीं कर पाते, न ही वे किसी व्यक्ति से या मामले पर सही विवरणों के साथ और सही ढंग से व्यवहार कर पाते हैं या उसका मूल्यांकन कर पाते हैं। अपनी मानवता के गुणों के आधार पर, वे सभी तरह के लोगों, घटनाओं और चीजों के साथ केवल अपने विशेष भ्रामक विचारों और दृष्टिकोणों के हिसाब से पेश आते हैं और वे ऐसा ही करते रहते हैं। तो तुम ऐसे लोगों को देखकर यह समझ सकते हो कि अहंकारी और धोखेबाज स्वभाव होने के अलावा उनमें एक और स्पष्ट रूप से दिखाई देने वाला स्वभाव होता है, जो है विशेष रूप से अड़ियल होना। इसकी विशेष अभिव्यक्ति यह है कि वे बहुत ज्यादा जिद्दी, मूर्ख, हठी और यहाँ तक कि संकीर्ण विचारों वाले होते हैं। जब तुम ऐसे किसी व्यक्ति से मेलजोल करते हो और कुछ विषयों पर चर्चा करते हो या उसके साथ रहते हुए किसी मामले का सामना करते हो, तब तुम देखते हो कि मामलों का सामना करते समय उसका रवैया और स्वभाव बेहद अड़ियल, जिद्दी, मूर्खतापूर्ण और हठी होता है। कोई सही बात या सही विचार और दृष्टिकोण, जिसे किसी भी सामान्य इंसान के लिए स्वीकार करना बहुत आसान होता है, जब ऐसे लोगों की बात आती है, तो उनके लिए उसे स्वीकार करना बहुत मुश्किल हो जाता है और उसमें कई रुकावटें आ जाती हैं। इसे देखकर तुम्हें समझ नहीं आता कि हँसें या रोएँ और तुम्हें लगता है कि यह व्यक्ति बहुत ज्यादा परेशानी खड़ी करने वाला है : “इतनी सीधी-सी बात इनके लिए इतनी मुश्किल समस्या क्यों बन जाती है? क्या ये सच में इंसान भी हैं?” उनसे कोई सही बात या सही दृष्टिकोण स्वीकार करवाना उतना ही मुश्किल है जितना किसी भेड़िये को मांस छोड़कर साग-सब्जियाँ खाने के लिए राजी करना। यह उनसे अपनी श्रेणी बदलने के लिए कहने जैसा है—यह इतना मुश्किल है। यह भी हो सकता है कि किसी छोटी-सी बात पर तुम उन्हें समझाने में बहुत समय लगाओ और बहुत ज्यादा मेहनत करो ताकि वे किसी तरह उसे स्वीकार लें, लेकिन जब कोई दूसरा मामला सामने आता है, तब उनका अड़ियल स्वभाव फिर से सामने आ जाता है और यह बहुत ही साफ तरीके से अभिव्यक्त होता है—जहाँ वे अपनी विकृत समझ और जिद दिखाते हैं; साथ ही, वे मूर्ख, जिद्दी और संकीर्ण विचारों वाले भी लगते हैं। जैसे-जैसे तुम ऐसे लोगों के ज्यादा संपर्क में आओगे और उनके बारे में अधिक अंतर्दृष्टि पाओगे, तो तुम्हें पता चलेगा कि लोगों के सार अलग-अलग होते हैं। जब ऐसे लोगों के सार की बात आती है, तब हो सकता है कि तुम्हें छोटी-मोटी बातों पर भी उन्हें अपनी बात समझाने और चीजों के बारे में स्पष्ट रूप से बताने के लिए बहुत ज्यादा मेहनत करनी पड़े और आखिर में बड़ी मुश्किल से कुछ नतीजे मिलें। हालाँकि, जब दृष्टिकोण और रुख की बात आती है या कोई बड़ी बात होती है, तब तुम उनसे कभी भी ठीक से बात नहीं कर पाओगे। उस समय, तुम्हें पता चलेगा कि लोगों की अलग-अलग श्रेणियाँ होती हैं और हर किसी की श्रेणी अलग होती है। अगर दो लोग आपस में ठीक से बात नहीं कर पाते हैं या मिलकर सामंजस्यपूर्ण सहयोग नहीं कर पाते हैं और किसी भी बात पर चर्चा करते समय अपने दृष्टिकोणों पर जल्दी से एक राय या सहमति नहीं बना पाते हैं, तो वे अलग-अलग श्रेणियों के लोग हैं। क्योंकि इस प्रकार के लोग, जिन्हें यह नहीं पता होता कि क्या सही है और क्या गलत, उनकी मानवता में यह भेद पहचानने की क्षमता नहीं होती कि क्या सही है और क्या गलत। इसलिए वे कभी यह नहीं समझ पाएँगे कि साफ तौर पर सही विचार और दृष्टिकोण, सही शब्द और सही बातें सही क्यों हैं या उनकी सत्यता कहाँ है। वे कहेंगे, “तुम जो कह रहे हो, वह सही क्यों है? मैं जो कह रहा हूँ, वह सही क्यों नहीं है? आखिर तुम जो कह रहे हो, वह किस तरह से सही है?” कभी-कभी, यह साबित करने के लिए कि तुम जो कह रहे हो, वह सही है, तुम्हें तथ्य और तर्क प्रस्तुत करने पड़ते हैं, कई उदाहरण देने पड़ते हैं और कई तुलनाएँ करनी पड़ती हैं। तुम्हें बहुत सारी दिक्कतें झेलनी पड़ती हैं और बहुत सोचना-समझना पड़ता है, तब जाकर तुम उन्हें कोई एक बात साफ तौर पर समझा पाते हो। आखिर में ऐसा कर लेने के बाद भी तुम्हें अगली बात को साफ तौर पर समझाने के लिए फिर से बहुत सोचना-समझना पड़ता है और बहुत सारी दिक्कतें झेलनी पड़ती हैं। अगर तुम हमेशा ऐसा करते हो, तो समय के साथ तुम्हें पता चलेगा कि ऐसा करने से आखिरकार किसी व्यक्ति की श्रेणी नहीं बदली जा सकती है और यह कि तुम व्यर्थ ही मेहनत कर रहे थे। भले ही तुम बहुत ज्यादा प्रयास करो और उनसे बहुत उम्मीदें रखो, फिर भी तुम्हें मिलने वाले नतीजे बहुत ही कम होंगे, क्योंकि कोई भी किसी व्यक्ति की श्रेणी नहीं बदल सकता। अगर किसी को यह भी नहीं पता कि क्या सही है और क्या गलत, तो उसकी श्रेणी बदलने का केवल एक ही तरीका है कि वह अपने मूल रूप में लौटकर फिर से जन्म ले। अगर वह भाग्यशाली हुआ, तो वह इंसान के रूप में जन्म लेगा; लेकिन अगर वह बदकिस्मत रहा और उसने फिर से इंसान के अलावा किसी और चीज के रूप में जन्म लिया, तो फिर ऐसे लोगों को यह समझाने की कोई उम्मीद नहीं बचती कि क्या सही है और क्या गलत। बात बस ऐसी ही है।
इस प्रकार के लोग, जिनमें मानवता के गुण नहीं होते, दूसरों के साथ अपने व्यवहार में एक और विशेषता रखते हैं : वे दूसरों में तरह-तरह की कमियाँ ढूँढ़ सकते हैं, लेकिन जब उनमें खुद वही कमियाँ होती हैं, तो वे कभी नहीं मानते कि वे कमियाँ हैं। वे दूसरों में कोई भी मजबूत पक्ष या खूबियाँ देख ही नहीं पाते; वे बस उनकी कमियाँ ढूँढ़ते हैं, उनकी खामियों को उजागर करते हैं और इसी बात का बहाना बनाकर कहते हैं कि दूसरे लोग उनके साथ सामंजस्यपूर्ण सहयोग नहीं कर सकते; साथ ही, यह कि सामंजस्यपूर्ण सहयोग करने की असमर्थता पूरी तरह से दूसरों की कमी है, जबकि वे खुद बिल्कुल भी गलत नहीं हैं और दूसरों को ही खुद को समझने की जरूरत है। यहाँ समस्या क्या है? अपने आचरण और चीजों से निपटने के तरीके में, ऐसे लोग न तो दूसरों के साथ कभी तर्कसंगत व्यवहार कर पाते हैं और न ही अपनी समस्याओं को तर्कसंगत, सही और निष्पक्ष तरीके से सुलझा पाते हैं। क्या तुम लोग कहोगे कि मामलों से निपटने और लोगों के साथ पेश आने का उनका रवैया सही है या गलत? (गलत।) लेकिन क्या वे यह बात जानते हैं? (नहीं।) वे हमेशा दूसरों को एक ऊँचे नैतिक आधार से आँकते और देखते हैं। दूसरों को देखने के उनके तरीके में और जिस परिप्रेक्ष्य से वे ऐसा करते हैं उसमें, दूसरों का भेद पहचानने के लिए “सही और गलत” के अपने खुद के तथाकथित मानक का इस्तेमाल करना शामिल होता है। वे दूसरों के हर काम को गलत और खुद से कमतर समझते हैं। अगर कोई विवाद उत्पन्न होता है और वे सामंजस्यपूर्ण सहयोग नहीं कर पाते हैं, तो उन्हें लगता है कि यह पूरी तरह से दूसरों की समस्या है और इसकी वजह भी दूसरे ही हैं; उन्हें लगता है कि दूसरों में ही भ्रष्ट स्वभाव हैं और दूसरों को ही खुद में बदलाव लाने और सुधार करने की जरूरत है। वे दूसरों को कमियों और समस्याओं से भरा हुआ देखते हैं, जिनमें उन्हें एक भी खूबी नजर नहीं आती, जबकि खुद को वे खूबियों से भरा हुआ और हर तरह की कमियों से मुक्त समझते हैं। क्या तुम कहोगे कि ऐसे लोगों में विवेक है? (नहीं।) जिन लोगों में विवेक नहीं होता है, क्या उनकी आँखें किसी काम की होती हैं? (नहीं।) वे सभी तरह के लोगों में मौजूद मजबूत पक्षों और खूबियों को बस देख ही नहीं पाते। इसके विपरीत, वे दूसरों की खामियों को पकड़ लेते हैं—जो असल में शायद खामियाँ ही न हों—और बात का बतंगड़ बना देते हैं। जब तक कोई समस्या नहीं आती, तब तक तो सब ठीक चलता है, लेकिन जैसे ही कोई समस्या उत्पन्न होती है, वे सामने वाले की खामियों को पकड़ लेते हैं और उन्हें आसानी से नहीं छोड़ते; वे कहते हैं, “तुम मुझसे किस तरह बेहतर हो? अगर तुम मुझसे बेहतर हो, तो फिर यह समस्या आखिर आई ही क्यों?” उनकी गहराई तक बैठी विद्रोह की भावना फूट पड़ती है और उनके असली अंदरूनी दृष्टिकोण पूरी तरह से सामने आ जाते हैं। वे लोगों, घटनाओं और चीजों को कभी भी तर्कसंगत ढंग से नहीं देखते। उनकी नजर में, दूसरे लोगों की कोई भी अभिव्यक्ति एक समस्या, एक कमी होती है। उनके विचारों और दृष्टिकोणों के हिसाब से, इनमें से कुछ भी सही नहीं ठहरता; सब कुछ गलत होता है, सभी नकारात्मक चीजें होती हैं और यह सब उनके लिए दूसरों पर फैसला सुनाने का एक जरिया बन जाता है। ऐसे लोगों से निपटना मुश्किल होता है। उनमें आम इंसानों जैसी अंतरात्मा और विवेक नहीं होता; इसलिए, उनके दिल की गहराइयों में, उनके तथाकथित “सही और गलत” का मतलब बस इतना होता है कि जो उन्हें सही लगता है, वही सही है और जो उन्हें सही नहीं लगता, वह गलत है। वे लोगों, घटनाओं और चीजों के सही-गलत होने का आकलन अपने खुद के मूल्याँकन, अपनी प्राथमिकताओं और अपने निजी हितों के आधार पर करते हैं। वे लोगों और चीजों को निष्पक्ष नजर से नहीं देखते। ऐसा कुछ भी जो उन्हें नापसंद हो, जिससे उनका तालमेल न बैठता हो, जिससे उन्हें कोई फायदा न हो या जिसे वे नीचा समझते हों, उसे वे बिना किसी चर्चा की गुंजाइश छोड़े, सीधे-सीधे गलत और बुरा बता देते हैं। ऐसे लोगों से निपटना न केवल मुश्किल होता है, बल्कि डरावना भी होता है। अगर तुम्हारे आस-पास ऐसा कोई व्यक्ति है, तो एक बार उसके सारे विचार और दृष्टिकोण सामने आ जाने पर उसका असली चरित्र पूरी तरह से बेनकाब हो जाता है। तुम साफ-साफ देख सकते हो कि असल में उसकी आत्मा की गहराइयों में क्या छिपा है, वह असल में किस चीज से प्रेम करता है, उसकी जरूरतें क्या हैं और वह असल में किस चीज का अनुसरण करता है। उसमें ये बातें देखकर तुम्हें शायद जिंदगी भर के लिए उससे घिन आए। बेशक, जब उसकी ये सारी कमियाँ और समस्याएँ सामने आ जाती हैं, तो तुम्हें उसकी अभिव्यक्तियों से जुड़े सवालों के जवाब भी मिल जाते हैं; जैसे कि उसकी विकृत समझ और उसके अड़ियल स्वभाव की वजह से उसमें दिखने वाली जिद, मूर्खता, हठ और बातों को तोड़-मरोड़कर पेश करने की प्रवृत्ति। यह जवाब क्या है? यह जवाब है कि ऐसे लोगों में सामान्य मानवता नहीं होती—यानी, उनमें इंसानों वाली अंतरात्मा और विवेक नहीं होता है; वे असल में इंसान ही नहीं हैं। अगर उनमें थोड़ी-सी भी अंतरात्मा और विवेक होता, तो वे गलत और बेतुके तर्कों का सहारा नहीं लेते और न ही उन्हें इस तरह पेश करते, मानो वे सही हों। परमेश्वर पर अपने विश्वास में इतने सारे धर्मोपदेश सुनने के बाद, उन्हें कम से कम थोड़ा-सा सत्य तो समझ आ ही जाना चाहिए और चीजों को देखने का उनका दृष्टिकोण भी कुछ हद तक बदल जाना चाहिए। तो फिर वे अब भी चीजों को अविश्वासियों के दृष्टिकोण से क्यों देखते हैं, गलत दृष्टिकोणों और तोड़-मरोड़कर पेश किए गए तर्कों को सही और सच क्यों मानते हैं और यहाँ तक कि सत्य, सकारात्मक चीजों और सही चीजों की भी नकारात्मक चीजें कहकर क्यों निंदा करते हैं? जब उनके गलत विचार और दृष्टिकोण पूरी तरह से सामने आ जाते हैं, तब तुम्हें इसका जवाब मिल जाता है। इसमें कोई हैरानी की बात नहीं है कि वे जीवन में इतनी सारी ऐसी बातें कह सकते हैं जो काले को सफेद बना देती हैं और तथ्यों को तोड़-मरोड़ देती हैं—ऐसा इसलिए है क्योंकि वे सत्य स्वीकारने से पूरी तरह इनकार कर देते हैं। चूँकि उनमें सत्य से विमुख होने की प्रवृत्ति होती है, इसलिए यह बिल्कुल तर्कसंगत है कि वे ऐसी चीजें प्रकट करें। यह इस वजह से नहीं है कि उनके माता-पिता ने उन्हें कैसे सिखाया, न ही यह उनके परिवेश का प्रभाव है; यह समाज की सिखाई हुई बातें तो बिल्कुल नहीं हैं, बल्कि यह उनकी मानवता का गुण है। वे सत्य से विमुख होते हैं; उनमें यह गुण होता है। कोई व्यक्ति किस चीज से प्रेम करता है, वह किस तरह की मानवता दिखाता है, दैनिक जीवन में वह स्वाभाविक रूप से कैसा व्यवहार करता है और जीवन में उसकी आम मनोदशा क्या होती है—यह सब उसके अपने गुणों पर निर्भर करता है। कोई भी किसी व्यक्ति के गुणों को बदल नहीं सकता। ठीक वैसे ही जैसे कोई साँप : क्योंकि उसका गुण ही टेढ़े-मेढ़े चलना है, इसलिए वह कभी भी सीधी लाइन में नहीं चलता। ठीक वैसे ही जैसे केकड़ा : वह हमेशा तिरछा चलता है, अगर तुम उसे किसी तंग जगह में भी डाल दो, तब भी वह तिरछा ही चलेगा। ये उसके गुण हैं और इन गुणों को बदला नहीं जा सकता। अगर कोई व्यक्ति सही और गलत का भेद नहीं पहचान पाता है या यह नहीं जानता है कि क्या सही है और क्या गलत, तो इस विशेषता को उसका एक गुण माना जा सकता है। क्योंकि उसके अंदर यह गुण मौजूद होता है, इसलिए वह अपने दैनिक जीवन में स्वाभाविक रूप से ऐसी कई चीजें करता है जो इसी गुण से जुड़ी होती हैं—यह बहुत सामान्य बात है।
जब भावनाओं की या चीजों से निपटने की बात आती है, तो कुछ लोग यह नहीं जानते कि क्या सही है और क्या गलत। इसी तरह, जब पुरुषों और महिलाओं के बीच के आचरण की बात आती है, तब भी उन्हें यह नहीं पता होता कि क्या सही है और क्या गलत। उदाहरण के लिए, उन्हें यह नहीं पता होता कि विपरीत लिंग के लोगों से मेलजोल करते या जुड़ते समय कितनी दूरी बनाए रखनी चाहिए; किन विषयों, टिप्पणियों और व्यवहार के तरीकों से बचना चाहिए या अपनी रोजमर्रा की बोली और आचरण में किन बारीकियों पर ध्यान देना चाहिए। यह समझना मुश्किल है—क्या सामान्य लोगों को यह नहीं पता होता कि विपरीत लिंग के लोगों से जुड़ते समय कुछ सीमाएँ होनी चाहिए? (हाँ।) क्या यह ऐसी चीज है जिसे सिखाने की जरूरत है? बचपन में शायद उसके माता-पिता को उसे यह सिखाने की जरूरत पड़ सकती है, लेकिन जैसे-जैसे वह बड़ा होता है और समझदार बनता है, परिवार या समाज द्वारा सिखाए बिना ही वह स्वाभाविक रूप से ये बातें जान जाता है। यह स्वाभाविक है, है ना? यह जानना कि पुरुषों और महिलाओं के बीच कुछ सीमाएँ होती हैं, मानवता का एक गुण है। मानवता के गुणों में अंतरात्मा और विवेक शामिल होते हैं, इसलिए लोगों को निश्चित रूप से पता होता है कि शर्मिंदगी का एहसास होना क्या है। अगर तुम लोगों में शर्मिंदगी का एहसास है, तो तुम्हें पता है कि विपरीत लिंग के लोगों के साथ कैसे पेश आना चाहिए। अगर तुम नहीं जानते और शर्मिंदगी की भावना के बिना व्यवहार करते हो—यह जाने बिना कि व्यवहार का कौन-सा तरीका सही है और कौन-सा गलत, कौन-सा तरीका उचित और तर्कसंगत है और कौन-सा तरीका अतिवादी है और सीमा को पार करता है—तो तुम्हारी मानवता में कोई समस्या है, क्योंकि यह ऐसी बात है जो एक सामान्य इंसान को कम से कम पता होनी ही चाहिए। अगर कोई व्यक्ति ये बातें जानता है और उनका पालन कर सकता है, तो उसके पास मानवता की अंतरात्मा और विवेक है; अगर कोई व्यक्ति इनमें से कोई भी बात नहीं जानता और उसे दूसरों द्वारा याद दिलाए जाने और रोके जाने की जरूरत पड़ती है, तो ऐसे इंसान में बहुत बड़ी समस्या है। खास तौर पर एक तरह के लोग ऐसे होते हैं जो दूसरों के बीच होने पर अपने लिंग के लोगों के साथ नहीं बैठते, बल्कि विशेष रूप से विपरीत लिंग के लोगों के बगल में बैठते हैं और उनके बहुत करीब चले जाते हैं—वे इससे बचने की कोशिश भी नहीं करते। जब दूसरे लोग ऐसे व्यक्ति को टोकते हैं, तो उसे यह अजीब तक लगता है और वह कहता है, “एक-दूसरे के पास बैठने में क्या बुराई है? हम सबके सामने भला क्या कर सकते हैं? मैं एक समझदार वयस्क हूँ—क्या मुझे तुम लोगों की निगरानी की जरूरत है? तुम लोग हमेशा मुझे ही क्यों निशाना बनाते हो?” उसमें तो यह तक कहने की हिम्मत होती है, “हम सबके सामने भला क्या कर सकते हैं?”—क्या उसमें जरा भी शर्मिंदगी की भावना है? (नहीं।) क्या समस्या यह है कि उसे सचमुच कुछ करना ही है? या बात यह है कि जब तक वह कुछ करता नहीं, तब तक उसे पुरुषों और महिलाओं के बीच की सीमाओं का पालन करने की जरूरत नहीं है? क्या पुरुषों और महिलाओं के बीच कोई अंतर नहीं होता? (हाँ, होता है।) अगर ऐसा है, तो उनके बीच सीमाएँ होनी चाहिए और इन सीमाओं को बनाए रखने की प्रेरणा इंसान के अंदर मौजूद शर्मिंदगी की भावना से मिलती है। अगर तुममें शर्मिंदगी की भावना है, तो विपरीत लिंग के लोगों से मेलजोल करते समय तुम स्वाभाविक रूप से सीमाओं का पालन करोगे; तुम्हें दूसरों की निगरानी की जरूरत नहीं पड़ेगी, न ही तुम्हें परिवेश द्वारा रोके जाने की जरूरत होगी—तुम यह खुद ही कर सकते हो। अगर तुममें शर्मिंदगी की इतनी-सी भी भावना नहीं है और तुम्हें दूसरों की निगरानी और टोकने की जरूरत पड़ती है, तो तुम जैसा व्यक्ति बहुत बड़े खतरे में है। कुछ लोग पुरुषों और महिलाओं के बीच के मामलों को लेकर विशेष रूप से लापरवाह होते हैं; वे अक्सर विपरीत लिंग के लोगों को आँख मारते हैं, इशारे करते हैं और उनके साथ छेड़छाड़ करते हैं। खासकर, कुछ लोगों को विपरीत लिंग के लोगों के सामने खुद का दिखावा करना बहुत पसंद होता है। विपरीत लिंग के जितने ज्यादा लोग मौजूद होते हैं, वे उतने ही ज्यादा बेकाबू और उत्साहित हो जाते हैं और उतने ही जोर-शोर से खुद का दिखावा करते हैं। दूसरों को यह सब अनुचित और अशोभनीय लगता है, फिर भी उन्हें इसमें कोई समस्या नजर नहीं आती, न ही उनकी अंतरात्मा उन्हें इसके लिए धिक्कारती है। इसके बजाय, वे सोचते हैं, “यह तो बहुत सामान्य बात है। क्या पुरुषों और महिलाओं के बीच ऐसा ही नहीं होना चाहिए? क्या महिलाओं को इस दुनिया में पुरुषों के लिए नहीं लाया गया है? और पुरुषों को महिलाओं के लिए नहीं लाया गया है? साथ मिलकर थोड़ा-सा मजा लेने में क्या बुराई है? क्या यह कोई खुशी की बात नहीं है? तुम लोगों की तरह इतनी गंभीरता से जीना तो बेहद थकाऊ है! क्या तुमने लोगों को यह कहते हुए नहीं सुना है, ‘पुरुष और महिलाएँ जब साथ मिलकर काम करते हैं, तो काम का बोझ हल्का हो जाता है’?” देखो, उन्हें कोई भी विचार या दृष्टिकोण स्वीकार्य लगता है। विशेष रूप से, वे इन भ्रामक विचारों और दृष्टिकोणों को पूरी तरह से स्वीकार कर लेते हैं, फिर भी सकारात्मक कथनों को जरा भी स्वीकार नहीं करते; इसके बजाय, वे उनका प्रतिरोध करते हैं, उनका खंडन करते हैं और उन्हें अस्वीकार कर देते हैं। यदि तुम उन्हें याद दिलाने की कोशिश करो, तो वे इससे चिढ़ जाते हैं, अपने दिल में वे तुमसे नफरत करते हैं और तुम्हें शत्रुतापूर्ण नजरों से देखते हैं। वे किसी की भी सलाह नहीं मानते और इसी तरह व्यवहार करने पर अड़े रहते हैं। कुछ लोग शायद एक पल के लिए अपना नियंत्रण खो बैठें या लापरवाही का शिकार हो जाएँ और कभी-कभार थोड़ा-बहुत अनैतिक आचरण कर बैठें। दूसरों द्वारा याद दिलाए जाने की जरूरत के बिना ही, वे अपने अंदर बेचैनी महसूस करते हैं और उन्हें लगता है कि भविष्य में उन्हें सावधान रहना चाहिए। यह उस व्यक्ति की अभिव्यक्ति होनी चाहिए जिसके पास अंतरात्मा और विवेक होता है। लेकिन यह दूसरे प्रकार का व्यक्ति पहले ही बहुत आगे निकल चुका होता है और उसने मर्यादा की सीमा को गंभीर रूप से पार कर चुका होता है; वह पहले से ही दैहिक वासनाओं में लिप्त होता है। बहुत-से लोग यह सब देखकर बर्दाश्त नहीं कर पाते। यदि वे इसी तरह चलते रहे, तो वे अपने ऊपर खतरा मोल ले लेंगे और उन्हें परमेश्वर द्वारा ठुकरा दिया जाएगा और हटा दिया जाएगा। फिर भी उन्हें कोई परवाह नहीं होती और वे कहते हैं, “वासना में लिप्त होने में भला क्या खतरा हो सकता है?” असल में उन्हें जरा भी समझ नहीं होती। बीस साल से अधिक उम्र की कुछ महिलाएँ विपरीत लिंग के लोगों से लापरवाही से जुड़ जाती हैं और पुरुषों के घरों में रात बिताती हैं। अगर यह बात बाहर पता चल जाए, तो उनकी प्रतिष्ठा मिट्टी में मिल जाएगी, फिर भी उन्हें इसकी कोई परवाह नहीं होती। क्या ऐसे इंसान में शर्मिंदगी की कोई भावना होती है? (नहीं।) उनमें शर्मिंदगी की भावना बिल्कुल भी नहीं होती। चाहे पुरुष हो या महिला, अगर किसी के दिल में पुरुषों और महिलाओं के बीच के मामलों को लेकर कोई न्यूनतम सीमा न हो और वह “शर्म” शब्द का मतलब ही न जानता हो, तो इस बात की पूरी तरह से पुष्टि हो जाती है कि उसमें मानवता के गुण नहीं हैं। अगर किसी इंसान में मानवता के गुण होते हैं और वह कभी-कभार विपरीत लिंग के किसी व्यक्ति के साथ कोई गलती कर बैठता है या कुछ ऐसा कर जाता है जो हद से बाहर की बात हो, तो उसे जीवन भर उस बात का पछतावा रहता है। जब भी वह उस बारे में सोचता है, उसका चेहरा शर्म से लाल हो जाता है और उसके दिल में एक हल्की-सी टीस उठती है; वह असहज और बेचैन महसूस करता है, वह उस बात को दोबारा छेड़ना नहीं चाहता और उम्मीद करता है कि भविष्य में ऐसी कोई गलती दोबारा कभी न हो। उसने जो किया है, वह उसके लिए एक कभी न मिटने वाला दाग बन जाता है। सामान्य लोगों में शर्मिंदगी की भावना होती है, पुरुषों और महिलाओं के बीच के मामलों को लेकर उनके मन में एक न्यूनतम सीमा तय होती है; वे खुद पर काबू रखते हैं और अपनी लगाम थामे रखते हैं और ऐसी चीजें नहीं करते। अगर कभी किसी पल वे अपना नियंत्रण खो भी बैठें और विपरीत लिंग के किसी व्यक्ति के साथ कोई गलती कर दें, तो उन्हें उसका पछतावा होता है। वे अपनी गलती को और नहीं बढ़ाते, न तो वे खुद को मनमानी करने देते हैं और न ही ऐसे परिवेश में खुद को बिगड़ने देते हैं जहाँ उन्हें रोकने-टोकने वाला कोई न हो; इसके बजाय, वे खुद पर संयम रखते हैं। यह कैसे मुमकिन होता है? यही वह अच्छा नतीजा है जो तुम्हें अपनी अंतरात्मा और विवेक से मिलने वाले संयम की वजह से हासिल होता है। तुम्हारी अंतरात्मा और विवेक तुम्हें रोकते हैं और नियंत्रित करते हैं और तुम्हारे लिए न्यूनतम सीमा तय करते हैं, जो ऐसे मामलों से पेश आने के लिए तुम्हारा न्यूनतम मानक भी है; यानी, वे तुम्हें इस न्यूनतम सीमा को लांघने से बचाते हैं और ऐसी चीजें करने से रोकते हैं। एक बार जब कमजोरी या किसी खास वजह से तुम कुछ समय के लिए अपनी इच्छाओं पर काबू नहीं रख पाते और इस तरह विपरीत लिंग के साथ कोई गलती कर बैठते हो, तो तुम्हें अपने दिल की गहराइयों में नफरत और बेहद घृणा महसूस होगी; यहाँ तक कि तुम्हें जीवन भर पछतावा होगा—इस जीवन में ऐसा दूसरी बार कभी नहीं होगा। हालाँकि, जिन लोगों में मानवता नहीं होती, उन्हें ऐसी चीजें करते समय कोई फर्क नहीं पड़ता। यहाँ तक कि वे इसके बारे में हर जगह बताते हैं और देखते हैं कि वे दूसरों के मुकाबले कहाँ खड़े हैं; वे सोचते हैं कि यह एक हुनर और एक क्षमता है, इसे ही आकर्षण कहते हैं और इसे ही फायदा उठाना कहते हैं—और अगर ऐसा न किया जाए, तो यह एक बर्बादी होगी। अगर ऐसे लोगों को मौका मिले, तो क्या वे फिर से ऐसी चीजें करेंगे? इसका जवाब यकीनन ‘हाँ’ है—वे बिल्कुल ऐसा करेंगे। ऐसी चीजें करने के बाद वे कभी भी परेशान महसूस नहीं करते, बल्कि वे अपने बारे में दिखावा करते हैं। क्या यह घिनौना नहीं है? (यह घिनौना है।) यह बात अपने आप में ही काफी निराशाजनक है कि वे परेशान महसूस नहीं करते, बल्कि वे दिखावा तक करते हैं, जो और भी ज्यादा घिनौना है। उसके इन कृत्यों को बाकी सभी लोग घोर तिरस्कार की दृष्टि से देखते हैं, फिर भी उन्हें खुद जरा भी शर्मिंदगी महसूस नहीं होती; ऐसे लोग इंसान कहलाने के लायक नहीं हैं। वे अक्सर ऐसी शर्मनाक चीजें करते हैं, फिर भी उन्हें न तो शर्मिंदगी महसूस होती है, न पछतावा होता है और न ही बुरा लगता है; अगर भविष्य में उन्हें कोई मौका मिलता है या हालात उपयुक्त होते हैं, तो वे फिर से वही करेंगे—यह इस बात की अभिव्यक्ति है कि उनमें शर्मिंदगी की कोई भावना नहीं है। तो फिर मुझे बताओ, अगर ऐसा कोई व्यक्ति सत्य का अभ्यास नहीं करता है, तो क्या वह परेशान महसूस करेगा या खुद को धिक्कारेगा? (नहीं।) सही कहा, वह न तो परेशान महसूस करेगा और न ही वह खुद को धिक्कारेगा। ऐसा क्यों है? (क्योंकि उसमें अंतरात्मा या विवेक नहीं है।) जब शर्मनाक चीजें करने की बात आती है, तो अंतरात्मा और विवेक से रहित व्यक्ति ऐसा कुछ भी करने में शर्मिंदगी महसूस नहीं करता जो अविश्वासियों को भी शर्मनाक लगता हो और न ही ऐसी चीजें करते समय वह परेशान महसूस करता है। ऐसे में, जब वह सत्य के खिलाफ जाने वाली चीजें करता है, तब उसके परेशान महसूस करने की गुंजाइश तो और भी कम हो जाती है, है ना? (हाँ।) अविश्वासी लोगों की नजर में, सत्य का अभ्यास नहीं करना और सत्य का अनुसरण नहीं करना बहुत ही सामान्य बात है; इसे न तो शर्मनाक माना जाता है और न ही मानवीय नैतिकता के खिलाफ माना जाता है, क्योंकि ज्यादातर लोग ऐसे ही होते हैं। इसलिए, ऐसे इंसान को इन बातों से कोई फर्क नहीं पड़ता। अगर किसी सामान्य व्यक्ति की इसलिए काट-छाँट की जाती है क्योंकि वह सत्य का अभ्यास करने में विफल रहता है और सिद्धांतों के खिलाफ जाता है, तो चूँकि उसके पास अंतरात्मा और विवेक होता है, उसे अपने दिल में फटकार महसूस होगी और उसकी अंतरात्मा बेचैन हो जाएगी। लेकिन जब अंतरात्मा और विवेक से रहित कोई व्यक्ति शर्मनाक चीजें करता है या ऐसी चीजें करता है जिनसे दूसरों के मन में तिरस्कार और घृणा पैदा हो, तो वह जरा भी असहज या बेचैन महसूस नहीं करता। उसकी नजर में, क्या सत्य का अभ्यास नहीं करना उसके लिए पूरी तरह से सामान्य बात नहीं है? उसमें जरा भी जागरूकता नहीं है; इसलिए ऐसे लोगों के लिए कोई आशा नहीं है।
मुझे बताओ, क्या ऐसे लोग बहुत ज्यादा हैं जो सही और गलत, उचित और अनुचित की असलियत देख पाते हैं? अपने आस-पास के लोगों को देखो, जिनमें परिवार, दोस्त और सहकर्मी शामिल हैं, और फिर अपने भाई-बहनों को देखो। इन लोगों में से, ऐसे कितने लोग हैं जो सही और गलत, उचित और अनुचित का भेद पहचान पाते हैं और उनकी असलियत देख सकते हैं? (बहुत कम।) ऐसे बहुत ज्यादा लोग नहीं हैं जो यह जान सकें कि क्या सही है और क्या गलत। यानी इस दुनिया में ऐसे बहुत ज्यादा लोग नहीं हैं जिनकी मानवता नेक और दयालु हो; ऐसे बहुत ज्यादा लोग नहीं हैं जो अपनी कथनी और करनी में निष्पक्ष और तटस्थ हों; ऐसे बहुत ज्यादा लोग नहीं हैं जो बुरे काम करने में बेलगाम न हों; और ऐसे बहुत ज्यादा लोग नहीं हैं जो समझदारी से बात करें और कुतर्क न दें। खासकर अविश्वासियों में ऐसे लोग तो और भी कम हैं। जब तुम किसी अविश्वासी के संपर्क में आते हो, तब तुम्हें बस उसकी बातें सुनकर ही पता चल जाता है कि वह किस तरह का इंसान है। अविश्वासियों की बातों में बहुत ज्यादा अशुद्धि और मिलावट होती है। उनमें से ज्यादातर लोग निष्पक्षता से और तटस्थ होकर बात नहीं करते; वे अपनी भावनाओं के आधार पर और अपने हितों की रक्षा के लिए बात करते हैं। चाहे वे कोई भी गलत बात कहें या कोई भी गलत काम करें, उनके दिल की गहराई में उन्हें इस बात का कोई एहसास नहीं होता। परमेश्वर के विश्वासी के रूप में, अगर कोई व्यक्ति किसी अविश्वासी की तरह ही अपनी कथनी और करनी में सही और गलत का फर्क नहीं कर पाता है—और भले ही उसकी बातें और दृष्टिकोण गलत हों, फिर भी वह आँख मूँदकर उन्हीं पर अड़ा रहता है, गलत दृष्टिकोणों को ही सकारात्मक चीजें और सत्य मान लेता है और यहाँ तक कि उन दृष्टिकोणों का इस्तेमाल सत्य और परमेश्वर के वचनों की जगह करने लगता है—तो क्या ऐसे व्यक्ति के बचाए जाने की कोई उम्मीद है? (नहीं।) कुछ लोग बीस या तीस साल से या ताउम्र परमेश्वर में विश्वास करते आए हैं, लेकिन उन्हें कभी पता नहीं होता कि सकारात्मक चीजें क्या हैं और नकारात्मक चीजें क्या हैं, न ही उन्हें कभी यह स्पष्ट हो पाता है कि क्या सही है और क्या गलत। जब तक कोई चीज उनके फायदे की होती है, वे उसे पसंद करते हैं और उसका बचाव करते हैं; अगर वह चीज उनके फायदे की नहीं होती, तो वे कहते हैं कि वह बुरी और गलत चीज है, और उसे ठुकरा देते हैं। वे अब तक सांसारिक आचरण के ऐसे फलसफों और रवैये के साथ जीते आए हैं, फिर भी दावा करते हैं कि वे परमेश्वर में विश्वास करते हैं और बचाए जाना चाहते हैं—क्या यह एक मजाक नहीं है? (हाँ।) वे यह भी दावा करते हैं कि वे परमेश्वर के अनुयायी और परमेश्वर के गवाह हैं। वे परमेश्वर की गवाही देने के लिए किस चीज का इस्तेमाल कर सकते हैं? उन्हें तो यह भी नहीं पता कि क्या सही है और क्या गलत, फिर भी वे दावा करते हैं कि वे परमेश्वर की गवाही देना चाहते हैं—क्या यह पूरी तरह से बकवास नहीं है? क्या परमेश्वर ऐसे भ्रमित लोगों का इस्तेमाल अपनी गवाही देने के लिए करेगा? (नहीं।) ऐसे लोगों का परमेश्वर की गवाही देना उसके लिए शर्म की बात होगी। उन्हें कभी ऐसा नहीं लगता कि परमेश्वर जो कुछ भी करता है वह सही है। उनकी सोच और विचारों के आधार पर आकलन करें, तो परमेश्वर द्वारा किए गए कई कार्य उनकी सोच और विचारों के अनुरूप नहीं होते, न ही वे उनकी अपनी धारणाओं के अनुरूप होते हैं, और बेशक वे उनके दैहिक हितों के अनुरूप भी नहीं होते। अक्सर, परमेश्वर के वचन या परमेश्वर का कार्य उनकी इच्छाओं, उनकी निजी चाहतों और महत्वाकांक्षाओं और उनके सभी प्रकार के निजी हितों के खिलाफ जाता है। इसलिए, कुछ ऐसे लोगों के लिए, जिन्होंने दस या बीस साल से परमेश्वर में विश्वास किया है, यह बहुत मुश्किल होता है कि वे एक भी ऐसा शब्द कहें जो उनके दिल से निकला हो, यह कहें कि परमेश्वर जो कुछ भी करता है वह सही है और उसमें कोई गलती नहीं है। यह कहा जा सकता है कि उनके दिलों में कुछ छिपा हुआ है। इतने सालों तक परमेश्वर में विश्वास करने के बाद, उनके पास प्रत्यक्ष अनुभव है : उन्हें लगता है कि उनकी इच्छाएँ पूरी नहीं हुई हैं; वे अधिकारी बनना चाहते थे, लेकिन बन नहीं पाए और वे आशीष पाना चाहते थे, लेकिन उन्हें मिले नहीं। ऐसा प्रतीत होता है कि परमेश्वर का घर उनके साथ अन्याय करता है। उनके दिलों में शिकायतें और अन्याय का एहसास है, जिसके लिए वे आवाज उठाना चाहते हैं, लेकिन उठा नहीं पाते; उन्हें डर है कि अगर वे खुलकर बोलेंगे, तो वे परमेश्वर को नाराज कर देंगे, दूसरों को अपने खिलाफ इस्तेमाल करने का मौका दे देंगे या लोगों के दिलों में अपनी अच्छी छवि बनाए रखने में नाकाम रहेंगे। इस तरह, वे बहुत-सी बातें अपने अंदर ही दबाकर रखते हैं। सिर्फ इसलिए कि वे इसे आवाज नहीं उठाते, इसका मतलब यह नहीं है कि उनके दिलों में कोई सोच या कुछ खास चीजें नहीं हैं। और ये तथाकथित “चीजें” क्या हैं? यह परमेश्वर और उसके कार्य के बारे में इन लोगों की सकारात्मक समझ या ज्ञान नहीं है, बल्कि यह उनके मन में परमेश्वर के प्रति नासमझी, अवज्ञा और नाराजगी है; साथ ही, वे शिकायतें भी हैं, जो उन्हें लगता है कि परमेश्वर पर विश्वास करने के इतने वर्षों के दौरान उन्हें झेलनी पड़ी हैं और संचित हुई हैं। लेकिन क्योंकि वे परमेश्वर में विश्वास करते हैं, इसलिए वे इन बातों को बोल नहीं पाते। उनके दिलों में इतनी सारी बातें क्यों दबी हैं, जिनके लिए वे आवाज नहीं उठा पाते? इसके पीछे भी एक कारण है। केवल यही एक बात यह दर्शाने के लिए काफी है कि परमेश्वर में इतने वर्षों से विश्वास करने के बावजूद, उन्होंने वास्तव में सत्य नहीं समझा है। परमेश्वर में अपने विश्वास के दौरान, वे सत्य के अनुसरण को गंभीरता से नहीं लेते। चाहे उनके साथ कुछ भी घटित हो, वे चीजों को परमेश्वर के वचनों के अनुसार नहीं देखते, न ही वे अभ्यास का मार्ग खोजने के लिए सत्य की तलाश करते हैं। उन्होंने परमेश्वर के वचनों को कभी भी सत्य या जीवन के रूप में स्वीकार नहीं किया है। वे सत्य को न तो सँजोते हैं और न ही उसे कोई महत्व देते हैं, न ही वे इस बात को लेकर गंभीर हैं कि सत्य का अभ्यास कैसे किया जाए। परमेश्वर में विश्वास करने के अपने कई सालों के दौरान, वे हमेशा परमेश्वर के विरोध में खड़े रहे हैं; परमेश्वर के वचनों की पड़ताल करते हुए, उनमें ताक-झाँक करते हुए और उन पर सवाल उठाते हुए; यहाँ तक कि परमेश्वर के वचनों का प्रतिरोध करते हुए या अपने तथाकथित सही दृष्टिकोणों से परमेश्वर के वचनों और कार्य का मूल्यांकन और आलोचना करते हुए। इसलिए, कई वर्षों तक परमेश्वर में विश्वास करने के बाद, वे आखिरकार अपने दिल की बात कहते हैं : “परमेश्वर में विश्वास करके मुझे क्या मिला है?” इसका निहितार्थ यह है कि परमेश्वर में विश्वास करके उन्हें कुछ भी हासिल नहीं हुआ है। अपने दिलों में, वे मानते हैं कि इन वर्षों में परमेश्वर के घर में अपना कर्तव्य करते हुए उन्होंने बहुत कष्ट सहे हैं और बहुत बड़ी कीमत चुकाई है, लेकिन आशीष पाने की उनकी इच्छा और प्रसिद्धि और लाभ पाने की उनकी चाहत पूरी नहीं हुई है। कुछ लोग तो यह भी मानते हैं कि परमेश्वर ने उनके साथ हुए अन्याय का समाधान नहीं किया है, इसलिए वे अंदर से विद्रोही, नाराज और शिकायतों से भरे हुए महसूस करते हैं। आशीष पाने की खातिर और अपनी मंजिल की खातिर, उनके पास परमेश्वर के घर में थोड़ा-बहुत अपना कर्तव्य निभाने और थोड़ा-बहुत काम करने के अलावा कोई चारा नहीं होता, भले ही वे ऐसा मन में शिकायत रखते हुए ही क्यों न करें; लेकिन अंत में, उनकी सारी उम्मीदें बेकार चली जाती हैं और उन्हें कुछ भी प्राप्त नहीं होता। क्या ऐसे लोग सचमुच मौजूद हैं? ऐसे लोगों का कम-से-कम एक हिस्सा तो मौजूद है। परमेश्वर में कई वर्षों से विश्वास करने के बाद भी उन्हें कुछ प्राप्त नहीं होना उनकी अपनी ही समस्याओं के कारण है। उनमें सत्य समझने या बूझने की क्षमता नहीं है; वे आशीष पाने के इरादे से परमेश्वर का अनुसरण करते हैं और अपना कर्तव्य करते हैं। हालाँकि उन्होंने सच्चे मन से खुद को थोड़ा-बहुत खपाया है, बड़ी कीमत चुकाई है और बहुत कष्ट सहे हैं, फिर भी उनकी परमेश्वर द्वारा बोले गए वचनों में या परमेश्वर द्वारा व्यक्त किए गए सत्यों में कभी कोई दिलचस्पी नहीं रही है। उन्होंने उन वचनों या सत्यों को कभी अपने दिलों में स्वीकार नहीं किया है और न ही उन्होंने सत्य का अभ्यास करने को कभी गंभीरता से लिया है। इसलिए, उन्हें कभी पता नहीं होता कि उनमें सत्य की वास्तविकता है या नहीं। वे सोचते हैं, “हम सत्य पर संगति कर सकते हैं और हम कुछ सत्य समझते हैं, तो फिर यह कैसे कहा जा सकता है कि हममें सत्य वास्तविकता नहीं है?” लेकिन वे एक भी सच्ची अनुभवजन्य गवाही नहीं लिख सकते, तो फिर उनकी यह सत्य वास्तविकता आखिर है कहाँ? उनके क्रियाकलाप और कर्म अभी भी अविश्वासियों जैसे ही हैं; बस इतना है कि अविश्वासियों की तुलना में उनका व्यवहार थोड़ा-बहुत बदल गया है। अपने आचरण के तौर-तरीकों से और सभी घटनाओं और चीजों के बारे में—विशेष रूप से सकारात्मक चीजों और नकारात्मक चीजों के बारे में और इस बारे में कि क्या सही है और क्या गलत—अपने विचारों और दृष्टिकोणों से, उन्होंने कभी भी चीजों को परमेश्वर के वचनों या सत्य के आधार पर नहीं देखा है। इसके बजाय, वे हर चीज को अपने ही विचारों और दृष्टिकोणों के अनुसार देखते हैं। उनका मानना है कि जो कुछ भी उन्हें पसंद है, वह सकारात्मक चीज है और जिस चीज से वे नफरत करते हैं, वह नकारात्मक चीज है। वे लोगों और चीजों को देखने के लिए कभी भी परमेश्वर के वचनों को आधार नहीं बनाते और जिन लोगों, घटनाओं और चीजों का वे सामना करते हैं, उनमें वे कभी भी सत्य की खोज नहीं करते या सत्य को स्वीकार नहीं करते—वे बस अपनी इच्छाओं, इरादों और प्राथमिकताओं के अनुसार कार्य करने, जीने और अपना कर्तव्य करने के लिए अपनी ही मनमानी सोच का अनुसरण करते हैं। उनका मानना है कि चीजों को त्यागने, खुद को खपाने, कष्ट सहने और कीमत चुकाने की उनकी क्षमता का मतलब है कि उन्होंने परमेश्वर के लिए पहले ही बहुत बड़ा योगदान दे दिया है; वे सोचते हैं कि परमेश्वर में विश्वास करने का यही अर्थ है और यही सत्य का अनुसरण करना है। वे अपने दिलों में अपनी ही कल्पना से गढ़े हुए परमेश्वर में अपने तरीके से विश्वास करते हैं और सत्य का अनुसरण भी अपने तरीके से करते हैं। जब अपना कर्तव्य करते समय हमेशा मनमाने और लापरवाही भरे ढंग से कार्य करने के कारण उनकी काट-छाँट की जाती है या जब परमेश्वर के घर में महत्वपूर्ण कार्यों के लिए उनका उपयोग नहीं किया जाता है, तब वे हतोत्साहित और निराश महसूस करते हैं। अंततः, वे हर चीज को एक ही वाक्य में समेट देते हैं : “इतने वर्षों से परमेश्वर में विश्वास करने से मुझे क्या मिला?” वास्तव में उन्हें कुछ भी प्राप्त नहीं हुआ है। उन्हें सत्य इसलिए प्राप्त नहीं हुआ है, क्योंकि वे सत्य का अनुसरण नहीं करते; इसके लिए परमेश्वर को दोष नहीं दिया जा सकता। ऐसा इसलिए है, क्योंकि परमेश्वर लोगों के प्रति पक्षपात नहीं करता और न ही सत्य ऐसा करता है। तुम सत्य प्राप्त करने में विफल इसलिए नहीं रहे, क्योंकि परमेश्वर ने तुम्हें अवसर नहीं दिया या क्योंकि उसने तुम्हें अपने वचन सुनने नहीं दिए, बल्कि ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि तुमने परमेश्वर के वचन सुनकर भी उन पर मनन नहीं किया, उनके बारे में सोचा नहीं, उनका अभ्यास नहीं किया और न ही उनका अनुभव किया। ऐसा इसलिए है, क्योंकि तुम सत्य से प्रेम नहीं करते और इसीलिए तुम उसे स्वीकार नहीं करते। परमेश्वर ने तुम्हारी आँखें बंद करके सील नहीं कर दी हैं और न ही तुम्हारे दिल को बंद करके सील कर दिया है; बल्कि यह तुम्हारी प्राथमिकताएँ और तुम्हारी बेतुकी सोच है जिसने तुम्हारे दिल को बंद कर दिया है, ताकि तुम सत्य को स्वीकार न कर सको। तुम सत्य को प्राप्त करने में इसलिए नाकाम नहीं रहे, क्योंकि परमेश्वर ने तुम्हें वह दिया नहीं है, बल्कि इसलिए रहे क्योंकि तुमने परमेश्वर के वचन पढ़ना कभी पसंद ही नहीं किया और तुम अपने दिल में परमेश्वर के वचनों को या सत्य को स्वीकार नहीं करते। तुम अपने ही विश्वासों और दृष्टिकोणों को सत्य मानकर उनका अनुसरण करते हो और उनके प्रति समर्पण करते हो—क्या तुम चाहते हो कि लोग परमेश्वर की तरह तुम्हारी आराधना करें? परमेश्वर के वचन और परमेश्वर का कार्य तुम्हारे लिए बस एक औपचारिकता, एक सूत्र बनकर रह गए हैं; तुमने सत्य और जीवन का अनुसरण बिल्कुल भी नहीं किया है। इसलिए, परमेश्वर में तुम्हारे विश्वास का अंत बस एक ही तरह से हो सकता है—तुम्हें वास्तव में कुछ भी प्राप्त न हो। तुमने सत्य क्यों नहीं प्राप्त किया? ऐसा इसलिए नहीं है क्योंकि परमेश्वर ने तुम पर अनुग्रह नहीं किया है, बल्कि ऐसा उस मार्ग के कारण है जिसे तुमने खुद चुना है। परमेश्वर ने तुम्हें कई अवसर दिए, वह गंभीरता और धैर्य के साथ तुम्हें प्रोत्साहित करता है और तुम्हारी सहायता करता है, लेकिन तुम कोई ध्यान नहीं देते। न ही तुम अपनी काट-छाँट को स्वीकार करते हो। तुम हमेशा आशीष पाने या प्रतिष्ठा और रुतबा हासिल करने के पीछे भागते रहते हो और कभी रुकते नहीं। सत्य प्राप्त करने में तुम्हारी अंतिम असफलता का कारण वह मार्ग है जिस पर तुम खुद चले हो। तुम सत्य का अनुसरण करने वाले मार्ग पर नहीं चले हो। इसका परमेश्वर से कोई लेना-देना नहीं है। परमेश्वर लोगों के प्रति कोई भेदभाव नहीं करता और न ही सत्य ऐसा करता है। तुम्हारी श्रेणी चाहे जो भी हो, जब तक तुम एक इंसान हो, भले ही सत्य समझने की तुम्हारी क्षमता किसी सामान्य व्यक्ति की क्षमता से थोड़ी कम हो, अगर तुम फिर भी परमेश्वर के वचनों को पूरे दिल से सुन सकते हो, उन्हें स्वीकार कर सकते हो और उनका अभ्यास कर सकते हो—इस तथ्य के बावजूद कि तुम केवल कुछ धर्म-सिद्धांत ही समझते हो और कुछ विनियमों का ही पालन करते हो—तब भी तुम कुछ न कुछ प्राप्त कर सकते हो। ज्यादातर लोग ऐसा कर सकते हैं, तो तुम क्यों नहीं कर सकते? दूसरे लोग धर्मोपदेश सुनते हैं और अपना कर्तव्य उसी तरह करते हैं, तो फिर वे सत्य क्यों प्राप्त कर सकते हैं, अपने कर्तव्य को मानक स्तर तक क्यों कर सकते हैं, अपने भ्रष्ट स्वभावों को त्यागकर परमेश्वर के प्रति समर्पण क्यों कर सकते हैं, जबकि तुम ऐसा नहीं कर सकते? परमेश्वर ने तुम्हारे कर्तव्य करने के लिए एक परिवेश की व्यवस्था की है, इस उम्मीद के साथ कि तुम सत्य समझोगे और उसका अभ्यास कर पाओगे। परमेश्वर ने तुम्हें कभी नहीं रोका, बल्कि तुम खुद ही हमेशा सांसारिक चीजों और दैहिक सुखों का लालच करते हो; तुम परमेश्वर के वचनों को खाते और पीते नहीं हो, अपने दिल में तुम सत्य से विमुख रहते हो और उसे अस्वीकार करते हो। तुम शैतान के फलसफों, उसकी शिक्षाओं और ज्ञान को ही सकारात्मक चीजें और सत्य मानकर थामे रहते हो, जबकि परमेश्वर के वचनों और सत्य की उपेक्षा करते हो, उन्हें अपना शत्रु या अपना विरोधी मानते हो। चूँकि तुम अपने दिल में सत्य से प्रेम नहीं करते, तो फिर तुम परमेश्वर में विश्वास क्यों करते हो? तुम परमेश्वर में विश्वास तो करते हो, लेकिन उसके वचनों को सुनते नहीं या उन्हें स्वीकार नहीं करते—तो क्या तुम फिर भी बचाए जाने की उम्मीद कर सकते हो? तुम सत्य स्वीकार नहीं करते, या अपने भ्रष्ट स्वभावों को नहीं त्यागते, तो फिर तुम कैसे बचाए जा सकते हो? तुम परमेश्वर के वचनों को नहीं स्वीकारते और सत्य का अनुसरण नहीं करते, फिर भी चाहते हो कि परमेश्वर तुम्हें स्वीकार करे और तुम्हें मान्यता दे; यह तो बस एक कोरी कल्पना है; ऐसा कभी नहीं होगा। तुम परमेश्वर के वचनों को स्वीकार नहीं करते और सत्य को स्वीकार नहीं करते, इसका मतलब है कि तुम्हारे दिल में परमेश्वर के लिए कोई जगह नहीं है। तुम परमेश्वर से और भी ज्यादा दूर होते चले जाओगे। तुम बिल्कुल एक अविश्वासी की तरह बन जाओगे; तुम्हारे लिए उद्धार पाना असंभव हो जाएगा।
कुछ लोगों ने वास्तव में अपने दिल की गहराइयों में परमेश्वर के वचनों को कभी स्वीकार नहीं किया है; वे परमेश्वर के एक भी वचन को स्वीकार नहीं करते। जब परमेश्वर का घर उन्हें बढ़ावा नहीं देता या उनका उपयोग नहीं करता, तो वे शिकायत करते हैं : “परमेश्वर मुझे पसंद क्यों नहीं करता? परमेश्वर का घर मुझे कभी बढ़ावा क्यों नहीं देता या मुझे किसी महत्वपूर्ण पद पर क्यों नहीं रखता? मैं कुछ सत्य समझता हूँ, मुझमें आकांक्षाएँ और दृढ़ संकल्प है और मैं परमेश्वर के लिए खुद को खपाने को तैयार हूँ! मैं शिक्षित हूँ, मुझमें ताकत है, मैं कष्ट सह सकता हूँ और कीमत चुका सकता हूँ—तो फिर परमेश्वर का घर मुझे मौका क्यों नहीं देता? मेरे साथ इस तरह का व्यवहार करना अन्यायपूर्ण है! दूसरों को अवसर मिलते हैं, तो मुझे क्यों नहीं? परमेश्वर धार्मिक नहीं है!” तो फिर तुम यह क्यों नहीं देखते कि क्या तुम, लोगों को बढ़ावा देने और उनका उपयोग करने के संबंध में परमेश्वर के घर के सिद्धांतों के अनुरूप हो? तुम्हारा दिल परमेश्वर के लिए बंद है और तुम परमेश्वर द्वारा बोले गए वचनों का प्रतिरोध करते हो—क्या तुमने परमेश्वर की बातों को अपने अंदर उतारा है? जब तुम कोई काम करते हो, तब क्या तुमने कभी परमेश्वर के वचनों को खोजने की कोशिश की है? तुम परमेश्वर के वचनों को नहीं सुनते और तुम कभी भी परमेश्वर के इरादों या सत्य सिद्धांतों को नहीं खोजते, तो फिर परमेश्वर का घर तुम्हारा उपयोग कैसे कर सकता है? भले ही परमेश्वर तुम्हारे लिए किसी परिवेश का इंतजाम कर दे, परमेश्वर का घर तुम्हें बढ़ावा देने और तुम्हारा उपयोग किए जाने का मौका दे दे, तो भी तुम किस काम को करने में सक्षम होगे? तुम किस काम की जिम्मेदारी उठा पाओगे? यदि ऐसे किसी व्यक्ति का उपयोग कलीसिया के काम के लिए किया जाए, तो वह लापरवाही से गलत काम करने के लिए निश्चित रूप से अपनी मनमर्जी करेगा, और विघ्न-बाधाएँ पैदा करेगा, जिसका नतीजा केवल एक ही होगा : उसे हटा दिया जाएगा। लोगों के हटाए जाने के दो कारण होते हैं : एक तो यह कि वे झूठे अगुआ होते हैं जो वास्तविक काम नहीं कर सकते और दूसरा यह कि वे मसीह-विरोधी होते हैं जो लापरवाही से गलत काम करते हैं, अपनी मनमर्जी से चीजें करते हैं और कलीसिया के काम को या परमेश्वर के घर के हितों को कायम नहीं रखते। अंततः इन दोनों को ही हटा दिया जाना चाहिए। तुम कभी भी सत्य स्वीकार नहीं करते, तुम परमेश्वर के वचनों को पढ़ने से विमुख होते हो, तुम्हारा दिल परमेश्वर के लिए बंद है और काम करते समय तुम सत्य सिद्धांतों को नहीं खोजते। भले ही परमेश्वर तुम्हारे साथ अनुग्रहपूर्ण व्यवहार करे और तुम्हें एक मौका दे, भले ही परमेश्वर का घर तुम्हें बढ़ावा दे और तुम्हारा उपयोग करे, फिर भी तुम काम करने में सक्षम नहीं होगे और न ही तुम कोई काम स्वतंत्र रूप से कर पाओगे। आखिरकार, तुम्हें फिर भी हटा दिया जाएगा। तुम उम्मीद करते हो कि परमेश्वर का घर तुम्हें बढ़ावा दे और तुम्हारा उपयोग करे, लेकिन क्या तुम्हारी मानसिकता सकारात्मक है? यदि तुम्हारा लक्ष्य अपना कर्तव्य पूरा करना, सत्य प्राप्त करना और परमेश्वर के प्रेम का प्रतिदान देना नहीं है, तो तुम्हारी मानसिकता में महत्वाकांक्षाओं और इच्छाओं के अलावा कुछ भी नहीं है; यह तुम्हारे अहंकारी स्वभाव के कारण है जो काम कर रहा है, और परमेश्वर इसे स्वीकार नहीं करता। मुझे बताओ, तुम्हारी ऐसी अभिव्यक्तियों को देखते हुए, क्या परमेश्वर का घर तुम्हारा उपयोग करने की हिम्मत करेगा? यदि तुम्हारा उपयोग किया गया, तो इससे कलीसिया के काम में केवल दिक्कत आएगी और नुकसान ही होगा। तुम कोई भी काम ठीक से नहीं कर पाते और तुम्हारे कुछ करने के बाद, कई लोगों को स्थिति को सुधारना पड़ता है और उस गड़बड़ी को ठीक करना पड़ता है। इसलिए, परमेश्वर का घर तुम्हारा उपयोग करने की हिम्मत नहीं करता। कलीसिया के काम का हर पहलू बहुत महत्वपूर्ण है—क्या तुम उनकी जिम्मेदारी उठा सकते हो? यदि कुछ गलत हो जाता है, तो क्या तुम उसकी जिम्मेदारी ले सकते हो? तुम काम करने में सक्षम नहीं हो और उसकी जिम्मेदारी उठा नहीं सकते, फिर भी तुम चाहते हो कि परमेश्वर का घर तुम्हें किसी महत्वपूर्ण पद पर बिठाए—यह तो बहुत बड़ी महत्वाकांक्षा है! यदि तुम वाकई कलीसिया के काम का प्रभारी बनने के लिए पदोन्नत होना चाहते हो, तो तुम स्वयं को अधिक सत्य से लैस करने और सत्य को और अधिक समझने के बारे में क्यों नहीं सोचते? परमेश्वर के वचनों के शत्रु मत बनो। अपने तथाकथित सही विचारों और दृष्टिकोणों को त्याग दो और परमेश्वर के वचनों को गंभीरता से पढ़ो। यहाँ तक कि परमेश्वर के वचनों के प्रति बस समर्पण का रवैया रखना भी अच्छा होगा। तुममें तो परमेश्वर के वचनों के प्रति समर्पण का रवैया भी नहीं है, उन्हें स्वीकार करने की तो बात ही दूर है। अगर तुम परमेश्वर के वचनों को स्वीकार नहीं करते, लेकिन फिर भी परमेश्वर के घर में पदोन्नत होना चाहते हो और कलीसिया का काम करना चाहते हो, तो तुम कुछ ही दिनों में हटा दिए जाओगे। इस तरह के सभी लोगों के दिलों की गहराई में हमेशा अपनी कुछ आकांक्षाएँ दबी होती हैं, लेकिन ये आकांक्षाएँ कभी पूरी नहीं हो पातीं और उनके दिलों को कभी संतोष नहीं मिल सकता। भले ही उन्होंने कई सालों से परमेश्वर में विश्वास किया है और वे परमेश्वर के घर में अपने कर्तव्य कर रहे हैं, भले ही वे चीजों का त्याग कर सकते हैं और खुद को खपा सकते हैं, लेकिन क्योंकि उनके दिल हमेशा परमेश्वर के लिए बंद रहते हैं और वे सत्य के प्रति हमेशा प्रतिरोध का रवैया रखते हैं, इसलिए उन्हें लगता है कि इतने वर्षों से परमेश्वर में विश्वास रखने के बाद भी उन्हें कुछ हासिल नहीं हुआ है। मैं कहता हूँ, “तुम जो कह रहे हो, वह बिल्कुल सच है; तुम्हें वाकई कुछ भी प्राप्त नहीं हुआ है।” अगर इतने वर्षों से परमेश्वर में विश्वास रखने के बाद तुम्हें सच में कुछ सत्य प्राप्त हुआ होता, तो वह वाकई बहुत कीमती होता। अगर तुम्हारे अंदर वाकई कोई अनमोल खजाना होता, तो परमेश्वर का घर ऐसे इंसान को सच में पसंद करता और उसे संजोता। बदकिस्मती से तुम उस तरह के इंसान नहीं हो। तुम्हें जो प्राप्त हुआ है, वह न तो सत्य है और न ही कोई अनमोल खजाना; बल्कि तुम्हें जो मिला है, वह है चिंता, विरोध, असंतोष और शिकायतों से भरा हुआ दिमाग। तुम कहते हो कि तुम्हें कुछ भी प्राप्त नहीं हुआ है और यह बात सही है; असल में यही मामला है। अगर तुम वाकई कुछ सत्य समझ पाते और तुम्हें कुछ सत्य प्राप्त हुआ होता, तो तुम्हारे दिल में कोई चिंता, विरोध, शिकायत या ऐसी अन्य कोई भी नकारात्मक चीज नहीं होती। इसके बजाय, तुम परमेश्वर में आस्था रखते, परमेश्वर की समझ रखते, परमेश्वर के प्रति विचारशील होते, परमेश्वर के प्रति समर्पण करते और परमेश्वर का भय मानते—ये सभी सकारात्मक चीजें हैं। अफसोस की बात है कि तुम्हारे भीतर सकारात्मक चीजें नहीं, बल्कि पूरी तरह से नकारात्मक चीजें हैं। फिर भी तुम उन्हें कसकर थामे रहते हो, यह सोचते हुए कि ये चीजें सबसे कीमती हैं; उन्हें थामे रहते हुए तुम सोचते हो कि तुम सही हो और तुम्हारे पास कोई बहाना है। यह एक मूर्खतापूर्ण विचार है। तुम्हारा वह क्रोध, घृणा, आलोचना, विरोध और रोष सत्य नहीं है। वे सभी चीजें शैतान से आती हैं; वे शैतान के भ्रष्ट स्वभावों से उत्पन्न घातक ट्यूमर हैं। तुम्हें उनका समाधान करने का कोई तरीका सोचना चाहिए। ये चीजें तुम्हें उद्धार प्राप्त करने में समर्थ नहीं बना सकतीं, न ही वे तुम्हें सत्य को स्वीकार करने और परमेश्वर के सामने खुलने और सब कुछ साफ-साफ बोलने में समर्थ बना सकती हैं, जिससे तुम एक सच्चा सृजित प्राणी बन सको और सृष्टिकर्ता की संप्रभुता और व्यवस्थाओं को स्वीकार कर सको। इसके विपरीत, यदि तुम हमेशा इन चीजों को संजोकर रखते हो और उन्हें जाने नहीं देते, तो यह केवल तुम्हें परमेश्वर से और भी दूर ले जाएगा, तुम भीतर से और भी अधिक अंधकारमय होते जाओगे और नीचे ही गिरते चले जाओगे। अंततः यह तुम्हें परमेश्वर पर उत्तरोत्तर कम आस्था रखने की ओर ले जाएगा और तुम परमेश्वर के वचनों, परमेश्वर के कार्य, परमेश्वर की अपेक्षाओं और परमेश्वर के स्वभाव सार से अधिकाधिक घृणा करने लगोगे। तुम परमेश्वर में विश्वास करते हो, फिर भी धीरे-धीरे उससे और भी दूर होते जा रहे हो; यह कोई अच्छा संकेत नहीं है। तुम्हारे लिए, यह एक ऐसी विपत्ति है जो पूरी बरबादी लाएगी। तुम्हें इस स्थिति को सकारात्मक दिशा देनी चाहिए और इन चीजों से चिपके नहीं रहना चाहिए। यदि तुम इन नकारात्मक चीजों से चिपके रहते हो, तो यह केवल तुम्हें विनाश की ओर ले जाएगा। तुम्हारे लिए बेहतर यही होगा कि तुम इन बातों को खुलकर सामने लाओ और उनका गहन-विश्लेषण करो, उन्हें जाने दो और सत्य को स्वीकार करो। कुछ लोग कहते हैं, “क्या तुमने यह नहीं कहा था कि हम जैसे लोगों में सत्य को स्वीकार करने की क्षमता नहीं होती?” तुममें सत्य को स्वीकार करने की क्षमता नहीं है, लेकिन मैं अब तुम लोगों से कह रहा हूँ : तुम्हारे अंदर जो भी चिंताएँ, असंतोष, विरोध, नाराजगी, नफरत और आलोचनाएँ हैं, ये सभी ऐसी चीजें हैं जो परमेश्वर का प्रतिरोध करती हैं। अगर तुम इसे समझते हो और अपने अंदर की समस्याओं का भेद पहचान सकते हो, तो तुम्हें इन चीजों को छोड़ देना चाहिए। कुछ लोग कहते हैं, “मैं सत्य नहीं समझता, इसलिए मुझे नहीं पता कि कैसे छोड़ूँ।” तो क्या तुम लोग विनियमों का पालन करना जानते हो? बस वही करो जो परमेश्वर के वचन तुम्हें करने के लिए कहते हैं। उदाहरण के लिए, क्या तुम बुराई करने से खुद को रोक सकते हो? क्या तुम परमेश्वर की आलोचना करने से खुद को रोक सकते हो? क्या तुम ज्यादा अच्छी चीजें कर सकते हो? क्या तुम बुरे कर्म करने वालों का साथ देने से खुद को रोक सकते हो? क्या तुम परमेश्वर के सामने अपना दिल खोल सकते हो? जब तुम्हें कोई समस्या दिखे, तो क्या तुम परमेश्वर के घर को उसके बारे में रिपोर्ट कर सकते हो? परमेश्वर से प्रार्थना करते समय क्या तुम अपने दिल की बात कह सकते हो? क्या तुम अपना कर्तव्य करते समय लापरवाही करने से खुद को रोक सकते हो? अगर तुम ये चीजें कर सकते हो, तो तुम्हारे लिए अभी भी उम्मीद बाकी है। अगर तुम ये चीजें भी नहीं कर सकते, तो मैं तुम्हें सच्चाई बताता हूँ : तुम पूरी तरह से बेकार हो चुके हो। तुम्हारे आगे रोशनी नहीं, बल्कि अँधेरा है। तुम अभी भी शैतान के ही हो, और तुम्हें बचाया नहीं जा सकता।
भले ही कोई व्यक्ति सत्य न समझे, अगर उसके पास अंतरात्मा और विवेक है, तो वह कुछ हद तक यह भेद पहचान सकता है कि क्या सही है और क्या गलत, चाहे उसे किसी भी स्थिति का सामना करना पड़े। लेकिन जिन लोगों में अंतरात्मा और विवेक की कमी होती है, वे कई मामलों में यह नहीं जान पाते कि क्या सही है और क्या गलत; इसी वजह से दूसरे लोग उन्हें बहुत ही अजीब समझते हैं। जब लोग उनके साथ मेलजोल करते हैं या मामलों से निपटते हैं, तब उनके साथ कई चीजें काम नहीं करतीं और कई बातें उनकी समझ में ही नहीं आतीं। इसके अलावा, उनके विचार और दृष्टिकोण बहुत ही गैर-पारंपरिक और अतिवादी होते हैं; लोगों को वे बातें समझ से परे लगती हैं, मानो वे कभी मानव संसार में रहे ही न हों। वे उन कई बातों को नहीं समझते जिन्हें आम तौर पर सही माना जाता है; न केवल वे उन बातों का अनुमोदन नहीं कर सकते या उन्हें स्वीकार नहीं कर सकते, बल्कि वे उनके बारे में टेढ़े-मेढ़े तर्क और पाखंड भी बोल सकते हैं। विशेष रूप से, कुछ लोग अक्सर समूह के भीतर ही तरह-तरह की चालें चलते हैं, लोगों के बीच फूट डालते हैं, तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश करते हैं और झूठ बोलते हैं। ऐसा लगता है मानो उनके पास हर दिन करने के लिए कोई उचित काम ही नहीं है; वे या तो किसी व्यक्ति की आलोचना कर रहे होते हैं या किसी मामले पर अपनी राय बना रहे होते हैं और उन्हें ऐसा करने में मजा आता है। भले ही कोई उनकी बातों पर ध्यान न दे और न ही किसी को उन बातों में कोई दिलचस्पी हो, फिर भी वे ऐसी बातें कहने और ऐसे काम करने से कभी नहीं थकते। वे हमेशा लोगों के रिश्तों में फूट डालते रहते हैं, दूसरों की आलोचना करते हैं, परदे के पीछे तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश करते हैं और झूठ बोलते हैं। जब चीजें उनके हिसाब से नहीं होती हैं, तो वे बड़बड़ाते हैं, शिकायत करते हैं और यहाँ तक कि लोगों के पीठ पीछे उनके बारे में अपनी राय देते हैं। उनका जीवन पूरी तरह से इन्हीं बातों से भरा रहता है। तुम उन्हें कभी भी अपनी समझ के आधार पर संगति करते हुए नहीं देखोगे—वे न तो परमेश्वर के वचनों से मिले प्रबोधन और प्रकाश पर संगति करते हैं, न ही वे किसी मामले में अपने अनुभवों पर संगति करते हैं या उन्हें दूसरों के साथ साझा करते हैं। जितनी ज्यादा ऐसे किसी उचित मामले पर चर्चा हो रही होती है, वे उतने ही ज्यादा चुप हो जाते हैं; उनमें कोई सक्रिय रवैया नहीं दिखाई देता, वे बिल्कुल सुस्त नजर आते हैं और कोई ऊर्जा नहीं जुटा पाते हैं। जिस चीज में उन्हें सबसे ज्यादा दिलचस्पी होती है, वह है लोगों के बीच फूट डालना, तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश करना और झूठ बोलना। यहाँ तक कि जब वे किसी मामले पर चर्चा करते हैं, तब भी वे बिल्कुल अविश्वासियों की तरह व्यवहार करते हैं; वे हर बात को केवल सही और गलत, उचित और अनुचित के परिप्रेक्ष्य से देखते हैं; कभी भी किसी मामले पर सामान्य मानवता की अंतरात्मा और विवेक के संदर्भ में चर्चा नहीं करते। लोगों के समूहों के बीच वे हमेशा मच्छरों, मक्खियों, चूहों वगैरह की भूमिकाएँ निभाते हैं, लोगों के सामान्य जीवन में बाधा डालते हैं और उन्हें परेशान करते हैं। जैसे ही वे बोलते हैं और अपने विचार व्यक्त करते हैं या किसी चीज का मूल्यांकन करते हैं और उसके बारे में फैसला सुनाते हैं, लोग अपने दिलों में उनसे विमुख और परेशान महसूस करते हैं; कुछ छोटे आध्यात्मिक कद वाले लोग, जो सत्य नहीं समझते, वे उनके द्वारा गुमराह और बाधित भी हो जाते हैं। ये लोग किसी भी समूह में कभी कोई सकारात्मक भूमिका नहीं निभाते; वे हमेशा गपशप करते हैं, तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश करते हैं और झूठ बोलते हैं; वे कभी किसी की बुराई करते हैं, तो कभी दूसरे के कामों पर टीका-टिप्पणी करते हैं। फिर भी, उन्हें ऐसा करने में कुछ भी गलत नहीं लगता; इसके बजाय, उनका मानना है कि लोगों को इसी तरह जीना चाहिए और केवल इसी तरह जीने से व्यक्ति खुश और स्वतंत्र रह सकता है। वे इस गलत जीवनशैली को और चीजों से निपटने के इस तरीके को ही सही मानते हैं, उसे ऐसी जीवनशैली मानते हैं जो एक सामान्य मानवता वाले इंसान की होनी चाहिए और जब दूसरे उनकी काट-छाँट करते हैं और उन्हें उजागर करते हैं, तो वे इसे स्वीकार नहीं करते। अगर किसी समूह में उनका यह तरीका काम नहीं करता, तो वे किसी दूसरे समूह में जाकर अपने जैसे लोगों को ढूँढ़ते हैं—ऐसे लोग जिनकी मानसिकता उन्हीं की तरह गंदी होती है—ताकि वे उनके साथ मिलकर सही-गलत का फैसला कर सकें। जब उन्हें अपने जैसा ही कोई व्यक्ति मिल जाता है, तो उन्हें लगता है कि उनके जीवन का हर एक दिन बहुत ही खुशहाल और आनंदमय है। किसी भी माहौल में, ये लोग हमेशा तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश करने, झूठ बोलने, लोगों के बीच फूट डालने, दूसरों को अपनी तरफ खींचने की कोशिश करने, लोगों को परेशान करने और उन पर हमले करने वाले व्यक्ति की ही भूमिका निभाते हैं। अगर तुम उनसे पूछो कि ऐसा करने के पीछे उनके क्या छिपे हुए इरादे हैं और वे क्या हासिल करना चाहते हैं, तो वे खुद भी स्पष्ट रूप से यह नहीं बता पाते कि वे ऐसा क्यों करते हैं। ऐसा हो सकता है कि उनका कोई स्पष्ट लक्ष्य न हो, फिर भी वे जिस स्थिति में आमतौर पर जीते हैं, वह इन्हीं अभिव्यक्तियों और अभ्यासों से भरी होती है। मुझे बताओ, ऐसे लोग किस श्रेणी में आते हैं? अगर तुम उनसे कहो कि ऐसा करने के पीछे उनके कुछ छिपे हुए इरादे हैं, तो वे बहाने बनाने लगते हैं : “मेरा इरादा किसी के कर्तव्य निर्वहन को प्रभावित करने का नहीं था, न मैं किसी को परेशान करना चाहता था और न ही मैं परमेश्वर के घर के काम में कोई बाधा डालना चाहता था। क्या मैं बस अपने मन की बात भी नहीं कह सकता?” जब तुम उन्हें उजागर करते हो, तब वे विरोधी हो जाते हैं; वे इसी तरह काम करने पर अड़ जाते हैं, वे अपनी मनमानी करने पर अड़े जाते हैं और वे दूसरों के बीच इसी तरह से जीने की जिद करते हैं। चाहे वे किसी की भी आलोचना करें या किसी भी तथ्य और झूठ को तोड़-मरोड़कर पेश करें, क्या उनके जीने और व्यवहार करने का तरीका सही है? (नहीं।) फिर भी उन्हें इसमें मजा आता है। क्या तुम कहोगे कि ऐसे लोगों के साथ समस्या बहुत गंभीर है? (हाँ।) वे वयस्क हैं, फिर भी उन्हें यह नहीं पता कि कौन-से शब्द और कौन-से काम सही, मूल्यवान और सार्थक हैं और कौन-से काम का मतलब उचित काम पर ध्यान देना है; उन्हें तो यह भी नहीं पता कि कौन-से काम उचित काम की उपेक्षा करने वाले हैं—इस तरह के लोग हर लिहाज से गुंडे होते हैं, सामान्य लोग नहीं। चाहे वे दूसरों के लिए परेशानी पैदा करें या न करें, यह देखते हुए कि वे हर दिन बिना यह जाने कि वे जो कर रहे हैं वह सही है या गलत, लापरवाही से गलत काम करने की स्थिति में जीते हैं और तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश करने, झूठ बोलने और फूट डालने को उचित काम मानते हैं और यह सब करते हुए उनकी अंतरात्मा में कोई जागरूकता नहीं होती, तो क्या तुम कहोगे कि उनमें मानवता है? अगर उनमें सचमुच सामान्य मानवता होती, तो उन्हें पता होना चाहिए कि बोलने और काम करने को नियंत्रित करने वाले सिद्धांत कौन-से हैं; इससे भी बढ़कर, उन्हें यह पता होना चाहिए कि अपने आचरण में व्यक्ति को सत्य समझना चाहिए और यही लोगों की सबसे बड़ी जरूरत है। हालाँकि, उन्हें यह नहीं पता कि लोगों को किस चीज की जरूरत है या लोगों को क्या करना चाहिए। उनमें सामान्य मानवता नहीं है; वे जानवर हैं। कुछ तो जानवरों से भी बदतर हैं। बिल्लियों को ही देखो : वे दिन में सोती हैं और कभी-कभी खेलती हैं और जब अंधेरा हो जाता है, तो चूहे पकड़ने निकल पड़ती हैं। चूहे इंसानों के लिए नुकसानदायक होते हैं, इसलिए उन्हें पकड़कर बिल्लियाँ इंसानों के लिए कुछ फायदेमंद काम ही कर रही होती हैं। या फिर देखो कि कुत्ते कैसे रहते हैं। अपने मालिकों के साथ खेलने के अलावा, कुत्ते घर की रखवाली करते हैं। जैसे ही कोई अजनबी आता है, वे अपने मालिक को सचेत करने और घर की रखवाली करने के लिए भौंकना शुरू कर देते हैं। जब उनके मालिक उन्हें बाहर ले जाते हैं, तब वे अपने मालिक के साथ-साथ रहते हैं और अगर कोई अजनबी पास आता है, तो वे अपने मालिक की रक्षा करते हैं। वे रखवाली करने और घर पर नजर रखने की अपनी भूमिका पूरी करते हैं। चाहे बिल्लियाँ हों या कुत्ते, वे सभी उचित काम कर सकते हैं। बेशक, जानवर यह सब अपनी अंतरात्मा की प्रेरणा से नहीं, बल्कि अपनी सहज प्रवृत्ति के कारण करते हैं। जब परमेश्वर ने उन्हें बनाया, तब उसने उनमें यह सहज प्रवृत्ति डाली, उन्हें ऐसा मिशन दिया और वे अपने मिशन पर कायम रहते हैं, कोई भी इसे बदल नहीं सकता। जानवर भी अपनी जिम्मेदारियाँ निभा सकते हैं और उचित काम कर सकते हैं। अगर कोई इंसान है, तो कम से कम उसे अपनी अंतरात्मा और विवेक से चलना चाहिए। उसके दिल में कुछ मानक और एक न्यूनतम सीमा होनी चाहिए कि उसे हर दिन क्या करना चाहिए और क्या नहीं, कौन-से काम सत्य से जुड़े हैं और कौन-से काम उचित काम की उपेक्षा करने वाले माने जाएँगे। इन मानकों और इस न्यूनतम सीमा को मानवता की अंतरात्मा और विवेक का उपयोग करके तुरंत परखा जा सकता है। उदाहरण के लिए, स्वच्छंद और बेलगाम होना, तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश करना और झूठ बोलना पसंद करना—ऐसे काम किस तरह के लोग करते हैं? सामान्य लोग इसका एहसास कर सकते हैं : “ये वे चीजें हैं जो स्वच्छंद और गुंडे-बदमाश लोग करते हैं, जो उचित कामों की उपेक्षा करते हैं। सामान्य लोग उचित मामलों में बहुत ज्यादा व्यस्त रहते हैं; भला ऐसी चीजें कौन करेगा? इनका कोई मतलब ही नहीं है! इसके अलावा, तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश करना, झूठ बोलना और दूसरों के बीच फूट डालना, ये सभी नकारात्मक और गलत चीजें हैं। अगर लोगों में अंतरात्मा और विवेक है, तो उन्हें ये काम बिल्कुल नहीं करने चाहिए। कभी-कभार, किसी तरह की कोई विशेष परिस्थिति आ सकती है—जैसे किसी ने तुम्हें नाराज कर दिया हो—और तुम गुस्से में आकर कुछ कड़वी बातें कह सकते हो, लेकिन तुम इसे अपने दैनिक जीवन के लिए मापदंड नहीं बना सकते; तुम इसे उचित काम नहीं मान सकते!” यह ऐसी बात है जिसे एक सामान्य व्यक्ति अपनी अंतरात्मा और विवेक से परख सकता है, ताकि वे इन चीजों से दूर रह सकें। लेकिन जिन लोगों में अंतरात्मा और विवेक नहीं होता, वे इन कामों को ही उचित काम मानते हैं। उन्हें अपने कर्तव्य में देरी होने पर कोई व्याकुलता या चिंता नहीं होती। जब उनका काम पूरा नहीं होता और दूसरे उन्हें काम जल्दी करने के लिए कहते हैं, तब भी वे इसे गंभीरता से नहीं लेते। दूसरे लोग अपने कर्तव्य करने में व्यस्त रहते हैं, लेकिन ये लोग ऐसा दिखावा करते हैं जैसे उन्हें कुछ दिखाई ही न दे रहा हो। जब भी मन करता है, वे बेकार की गपशप करने लगते हैं, कभी तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश करते हैं, तो कभी झूठ बोलते हैं और कभी दूसरों के बीच फूट डालते हैं। ये अभिव्यकियाँ सामान्य मानवता की अभिव्यक्तियाँ नहीं, बल्कि एक गैर-मानव की अभिव्यक्तियाँ हैं। मानवजाति का सदस्य होने के नाते, वयस्क होने के बाद हर किसी को कुछ उचित बातों पर चिंतन करना चाहिए; जैसे कि जीवन के प्रति हमारा दृष्टिकोण कैसा होना चाहिए, हमारी क्या आकांक्षाएँ और अनुसरण होने चाहिए, हमें किस चीज में विश्वास रखना चाहिए, हमें कौन-सा रास्ता चुनना चाहिए, हमें इस तरह से कैसे जीना चाहिए कि हमारे जीवन का कोई मूल्य और अर्थ हो, वगैरह—ऐसी बहुत-सी बातें हैं जिन पर हमें चिंतन करना और जिन्हें समझना चाहिए। यह बात विशेष रूप से तब और भी ज्यादा मायने रखती है, जब लोग परमेश्वर में विश्वास करने लगते हैं और परमेश्वर के घर में कोई कर्तव्य करते हैं, क्योंकि वहाँ हर काम का पैमाना बहुत बड़ा होता है और उसे पूरा करने के लिए लगातार प्रगति और कार्य-कुशलता की जरूरत होती है। हर कोई अपने काम में बहुत व्यस्त रहता है—ऐसे में भला किसके पास इतना फालतू समय होगा कि वह तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश करे, झूठ बोले और दूसरों के बीच फूट डाले? ज्यादातर लोग इन चीजों में अपना समय बरबाद नहीं करते। इसके अलावा, ज्यादातर लोगों को ऐसा शौक भी नहीं होता है; और अगर किसी को ऐसा शौक हो, तो भी वह बहुत ही अजीब और विचित्र लगता है। जो लोग तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश करने, झूठ बोलने और फूट डालने को अपना शौक बना लेते हैं, वे गैर-मानव हैं, क्योंकि उनका व्यवहार सामान्य लोगों के व्यवहार से पूरी तरह अलग होता है और ऐसी चीजें करने के सिद्धांतों के खिलाफ होता है जिनका पालन सामान्य लोगों को करना चाहिए। इसलिए, ऐसे लोग निकम्मे होते हैं जो अपने उचित काम की उपेक्षा करते हैं। वे जो काम करते हैं, वे ऐसे नहीं हैं जो सामान्य लोगों को करने चाहिए; वे जो भूमिका निभाते हैं, वह एक गैर-मानव की भूमिका होती है। फिर भी, वे खुद इसे बहुत अच्छा और सही मानते हैं। क्या यह सही और गलत के बीच का अंतर न जानना नहीं है? (हाँ, है।)
कुछ लोग हमेशा दूसरों के पीठ पीछे ताक-झाँक करने वाला और दखल देने वाला व्यवहार करते रहते हैं। उदाहरण के लिए, कुछ लोगों को दूसरों की निजी जानकारी, जैसे कि उनकी निजी डायरी और आध्यात्मिक भक्ति के नोट देखना पसंद होता है। कुछ लोग छिपकर दूसरों की प्रार्थनाएँ सुनना पसंद करते हैं या दूसरों की बातचीत पर कान लगाते हैं ताकि यह देख सकें कि कहीं उनका उल्लेख तो नहीं हो रहा है और दूसरे उनके बारे में क्या सोचते हैं। कुछ लोग दूसरों के कंप्यूटर में झाँकते हैं ताकि देख सकें कि उनके पास क्या संदेश आए हैं, वे किनसे संपर्क कर रहे हैं, कौन-से गाने सुन रहे हैं और कौन-से वीडियो देख रहे हैं; वे हमेशा दूसरों के निजी जीवन में ताक-झाँक करते रहते हैं। कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जिनकी आदत चोरी करने की होती है; वे बिना अनुमति के दूसरों के निजी सामान, पैकेट और यहाँ तक कि उनके बिस्तर की भी तलाशी लेते रहते हैं। वे देखते हैं कि दूसरे क्या खाते हैं, क्या पहनते हैं या क्या उपयोग करते हैं। अगर उन्हें कुछ अच्छा मिल जाता है, तो वे उसे ले लेते हैं और उसका उपयोग करते हैं; अगर उसका उपयोग करना उन्हें अच्छा लगता है, तो वे उसे अपना ही समझने लगते हैं। जब दूसरे लोग कुछ स्नैक्स या पेस्ट्री खरीदते हैं, तब वे चोरी-छिपे उन्हें देखते हैं और अगर उन्हें कुछ स्वादिष्ट लगता है, तो वे उसमें से एक टुकड़ा या हिस्सा ले लेते हैं। उनका मकसद सिर्फ देखना ही नहीं होता, बल्कि खाना भी होता है, क्योंकि वे लालची होते हैं। अगर उन्हें कुछ खाना ही है, तो वे माँगकर खा सकते हैं, कोई भी उनका मजाक नहीं उड़ाएगा। लेकिन वे दूसरों के पीठ पीछे उनका खाना क्यों चुराते हैं? क्या ऐसा करना सही है? (नहीं।) उन्हें पता होता है कि यह गलत है, फिर भी वे ऐसा करते हैं और अक्सर यही करते हैं; दूसरों की चीजों को ऐसे खंगालते हैं जैसे वे उनकी अपनी हो। अगर वे पकड़े जाते हैं, तो यह कहकर अपना बचाव करते हैं कि वे तो बस देख रहे थे; उन्हें इस बात पर जरा भी शर्मिंदगी महसूस नहीं होती। जब आस-पास कोई नहीं होता, तो वे चीजें खंगालना और चोरी करना जारी रखते हैं। उनमें शर्मिंदगी का कोई भाव नहीं होता; उन्हें तो यह भी नहीं पता होता कि वे जो कर रहे हैं, वह सही है या गलत। ऐसी चीजें किस तरह के लोग करते हैं? आम तौर पर छह या सात साल के समझदार बच्चे भी इस तरह की चीजें नहीं करते। फिर भी अगर कोई वयस्क व्यक्ति ऐसा करता है, तो इसकी वजह यह है कि उसे बचपन से ही ऐसा करने की आदत पड़ चुकी है। यह ठीक वैसे ही है जैसे कोई चोर, जिसे चोरी करने की लत लग चुकी हो, वह जहाँ भी जाता है, वहाँ चोरी ही करता रहता है। भले ही उसके पास किसी चीज की कमी न हो, फिर भी वह चोरी करना चाहता है; यह उसकी दूसरी प्रकृति बन चुकी होती है और वह इसे रोक नहीं पाता। भले ही वह चोरी करना छोड़ना चाहे, फिर भी वह ऐसा नहीं कर पाता। ऐसे लोग जन्मजात चोर होते हैं। क्या वे गैर-मानव नहीं हैं? (हाँ, हैं।) तुम जिज्ञासु हो और दूसरों की निजी चीजों को देखने की जिद करते हो, लेकिन देखने से क्या फायदा होगा? भले ही तुम देख लो, वे चीजें तुम्हारी नहीं हैं और तुम उन्हें प्राप्त नहीं कर सकते। अगर तुम सच में कभी कोई चीज उधार लेना चाहते हो, तो उस व्यक्ति से बस पूछ लो और उसका उपयोग तभी करो जब वह सहमत हो। कोई भी चीज खुले तौर पर और ईमानदारी से करो; चोरी-छिपे मत करो। अगर तुम किसी और के कपड़े पहनना चाहते हो, तो उससे खुले तौर पर कहो कि वह तुम्हें वे कपड़े उधार दे दे। तुम उन्हें तभी पहन सकते हो जब वह तुम्हें वे कपड़े उधार देने के लिए सहमत हो। अगर वह अपनी कोई कीमती चीज तुम्हें उधार देने के लिए अनिच्छा से भी तैयार हो जाता है, तो इसे भाई-बहनों के बीच का स्नेह माना जाता है। अगर वह तुम्हें वह चीज उधार नहीं देता है, तो उसे चोरी-छिपे मत पहनो। परमेश्वर में विश्वास करने वाले सभी लोग वयस्क हैं, फिर भी उनमें से कुछ लोगों का व्यवहार अभी भी अशोभनीय है और कुछ लोगों की तो चोरी करने की आदत भी होती है। वे दूसरों की चीजों को चोरी-छिपे खंगालते हैं, यह जाने बिना कि ऐसा करना गलत है। जब वे पकड़े जाते हैं और दूसरे उनके बारे में बात करते हैं, तब उन्हें जरा भी शर्मिंदगी महसूस नहीं होती और वे तो यह भी सोचते हैं, “अगर मैंने तुम्हारी चीजें खंगालीं, तो क्या हुआ? तुम्हारा कुछ भी खोया नहीं है और तुम्हारी चीजों को पवित्र चीजों के तौर पर अलग करके तो नहीं रखा गया है, फिर मैं उन्हें देख क्यों नहीं सकता?” देखो, वे किस तरह के टेढ़े-मेढ़े तर्क देते हैं। यह एक गंभीर समस्या है; यह केवल उनके व्यवहार की समस्या नहीं है, बल्कि उनके मानवता सार की समस्या है। और उनके सार में क्या समस्या है? ऐसे लोगों को गलत काम करते समय जरा भी एहसास नहीं होता कि वे गलत कर रहे हैं। जब कोई उनके गलत काम को पकड़ लेता है और उन्हें ठीक करने की कोशिश करता है, तब वे न केवल इसे स्वीकार नहीं करते हैं, बल्कि खुद को सही ठहराने लगते हैं, टेढ़े-मेढ़े तर्क देते हैं और उसे उसी तरह से करने पर अड़े रहते हैं। इससे यह साबित होता है कि वे गैर-मानव हैं। गैर-मानव होने की एक विशेषता यह है कि जब वे कोई गलत काम करते हैं, तब वे कभी अपनी गलती नहीं मानते, उन्हें अपने किए पर कोई पछतावा नहीं होता, वे यही मानते हैं कि वे सही हैं और उनके पास खुद को सही ठहराने के लिए ढेरों बहाने होते हैं। यानी, वे गलत चीजों को, विकृत चीजों को और टेढ़ी-मेढ़ी और दुष्ट चीजों को ही सही चीजें बताते हैं। यह भ्रामक तर्क को सही मान लेने जैसा है। जिन लोगों में यह विशेषता होती है, उनमें अंतरात्मा और विवेक की कमी होती है। जिन लोगों में अंतरात्मा और विवेक की कमी होती है, वे गैर-मानव होते हैं। ये ठीक उसी तरह की अभिव्यक्तियाँ हैं जो गैर-मानवों में होती हैं। जब वे चोरी-छिपे दूसरों की चीजों को खंगालते हैं, तब चाहे तुम उन्हें कितना भी उजागर करो या उनके साथ सत्य पर कितनी भी संगति करो, वे इसे स्वीकार नहीं करते। उन्हें न केवल कोई पछतावा नहीं होता, बल्कि वे टेढ़े-मेढ़े तर्क का सहारा लेते हुए कहते हैं, “मैंने बस किसी की चीजों को खंगाला ही तो है—इसमें गलत क्या है? जो व्यभिचार, हत्या या आगजनी जैसे जघन्य अपराध करते हैं और जिन्होंने हर वह बुरा काम किया है जिसकी कल्पना की जा सकती है, उन लोगों की तुलना में तो मैं सबसे अच्छा इंसान हूँ! तुम्हें मेरे जैसा अच्छा इंसान और कहाँ मिलेगा?” क्या यह पूरी तरह से अतार्किक नहीं है? (हाँ, है।) यदि कोई व्यक्ति कुछ गलत करता है और हठपूर्वक उसे स्वीकार करने से इनकार करता है, तो उसके लिए कोई आशा नहीं बचती। कुछ लोग इतनी गंभीर गलतियाँ करते हैं कि मानवीय नैतिकता के पैमाने पर भी वे अस्वीकार्य होती हैं, सत्य के पैमाने की तो बात ही छोड़ दो; उनकी काबिलियत उन्हें इसका एहसास करने के अयोग्य बनाती है। मानवता के संदर्भ में, जब किसी व्यक्ति में अंतरात्मा और विवेक की कमी होती है, तो वह गैर-मानव बन जाता है। तुम खुद को चाहे कितना भी अच्छा, दयालु, महान या नेक क्यों न समझते हो, अगर तुममें अंतरात्मा और विवेक की अभिव्यक्तियाँ नहीं हैं, बल्कि तुम इसके बजाय कई गैर-मानवीय अभिव्यक्तियाँ दिखाते हो, यहाँ तक कि तुम्हारे कई खास तौर-तरीके, गलत सोच और दृष्टिकोण भी हैं, तो तुम गैर-मानव ही हो। गैर-मानवों की मुख्य विशेषता यह है कि वे सत्य या सकारात्मक चीजों को स्वीकार नहीं करते, बल्कि गलत चीजों को ही सही दृष्टिकोण मानकर स्वीकार कर लेते हैं; यहाँ तक कि वे सही और गलत में उलझ सकते हैं और लोगों को गुमराह करने के लिए काले को सफेद साबित कर सकते हैं।
एक प्रकार का व्यक्ति वह होता है जो यह देखकर कि उसकी बेटी सुंदर है, उसका इस्तेमाल करके बहुत सारा पैसा कमाना चाहता है। इसलिए, वह उसकी सगाई किसी अमीर आदमी से कर देता है और सगाई में ढेर सारे उपहारों की माँग करता है। जब उसे वे उपहार मिल जाते हैं, तब वह खाने-पीने और मौज-मस्ती करने लगता है। कुछ समय बाद, जब वह लगभग सारा पैसा खर्च कर चुका होता है, तब वह और पैसे माँगने के लिए उस अमीर आदमी के परिवार के पास वापस जाता है। जब वह परिवार कहता है कि वे सगाई का सारा पैसा पहले ही दे चुके हैं, और अब और पैसे नहीं दे सकते, तब लड़की के माता-पिता उसकी सगाई किसी दूसरे परिवार में कर देते हैं और एक बार फिर सगाई में ढेर सारे उपहारों की माँग करते हैं। पहला परिवार यह देखकर समझ जाता है कि यह आदमी अपनी बेटी की शादी उनके परिवार में नहीं होने देगा, इसलिए वे अपने दिए हुए उपहार वापस माँगते हैं। और तब वह आदमी क्या कहता है? “मेरी बेटी तुम्हारे बेटे से शादी नहीं कर सकती, क्योंकि तुमने सगाई में पर्याप्त पैसे नहीं दिए। मुझे तुम्हें पैसे वापस करने की कोई जरूरत नहीं है। तुमसे किसने कहा था कि तुम पर्याप्त पैसे मत दो? तुमने पर्याप्त पैसे नहीं दिए, फिर भी मेरी बेटी से शादी करना चाहते हो? ऐसा कभी नहीं होगा!” पैसे ऐंठने के बाद, वे टेढ़े-मेढ़े तर्क देने लगते हैं। पहला परिवार समझ जाता है कि उनका पाला एक ठग, एक बदमाश इंसान से पड़ा है, इसलिए वे बस उसे नजरअंदाज कर देते हैं। दूसरे परिवार के साथ भी वैसा ही होता है। लड़की की सगाई कई परिवारों से होती है, जिसमें बहुत सारी आगे-पीछे की बातें होती हैं और इतनी सारी उठा-पटक के बाद, आखिरकार उसकी शादी नहीं हो पाती, लेकिन उसका परिवार ढेर सारा पैसा कमा लेता है। क्या यह परिवार अच्छा है? (नहीं।) क्यों नहीं? (उन्होंने अपनी बेटी की शादी का इस्तेमाल करके लोगों से उनके पैसे धोखे से ऐंठे। जब उनसे पैसे वापस माँगे गए, तब उन्होंने मना कर दिया और टेढ़े-मेढ़े तर्क देने लगे। उनके पास कोई समझ नहीं है। ऐसे लोग यह नहीं जानते कि क्या सही है और क्या गलत; उनमें शर्मिंदगी की कोई भावना नहीं होती, इसलिए वे बुरे लोग हैं।) वे ये सभी व्यवहार प्रदर्शित करते हैं। वे नहीं जानते कि क्या सही है और क्या गलत और उनमें शर्मिंदगी की कोई भावना नहीं होती। वे धोखे से ऐंठे हुए पैसों को बिना किसी आत्म-ग्लानि के खर्च करते हैं; वे बढ़िया खाते और पीते हैं और हर दिन स्पष्ट अंतरात्मा के साथ जीते हैं। मुझे बताओ, क्या परमेश्वर में विश्वास रखने वालों में भी ऐसे लोग होते हैं? (शायद होते हैं।) हाँ, होते हैं। इन लोगों के पास ठगी की सभी तरह की तरकीबें होती हैं, जिनके कारण इनके खिलाफ बचाव करना नामुमकिन हो जाता है। अविश्वासियों की बुराइयों से भरी अराजक दुनिया ऐसी ही होती है, लेकिन अगर कोई परमेश्वर में विश्वास रखने वाला व्यक्ति इस तरह लोगों को ठगता है, तो वह निश्चित रूप से अच्छा इंसान नहीं है। उसकी प्रकृति बहुत बुरी है; परमेश्वर में विश्वास रखने के बावजूद, वह असल में एक छद्म-विश्वासी है। क्या यह उसकी प्रकृति से तय नहीं होता? (हाँ।) वह प्रतिफल में भी विश्वास नहीं रखता, फिर भी परमेश्वर में विश्वास रखने का दावा करता है—आखिर वह किस तरह का कमीना इंसान है? वह लोगों से सगाई के उपहार ठग लेता है और अपनी बेटी की शादी भी नहीं होने देता। यह धोखा है। यही नहीं, वह सिर्फ एक परिवार को नहीं, बल्कि कई परिवारों को ठगता है फिर भी स्पष्ट अंतरात्मा के साथ जीता है। और वह परमेश्वर में विश्वास रखने का दावा तक करता है। क्या परमेश्वर ऐसे व्यक्ति को स्वीकार करता है? (नहीं।) परमेश्वर उसके विश्वास को स्वीकार नहीं करता। अगर परमेश्वर के घर में ऐसे लोग हैं, तो उन्हें वहाँ से दूर करना ही होगा। परमेश्वर का घर ऐसे लोगों को बिल्कुल नहीं चाहता। ठगों को बदला नहीं जा सकता; परमेश्वर बुरे लोगों को नहीं बचाता। एक ठग जहाँ कहीं भी जाएगा, लोगों को ठगेगा ही। जब वह परमेश्वर के घर में आता है, तब क्या वह वहाँ भाई-बहनों को धोखा देगा? क्या वह परमेश्वर के घर को धोखा देगा? वह निश्चित रूप से ऐसा करेगा। क्या परमेश्वर ऐसे व्यक्ति को बचाएगा? परमेश्वर उसे बिल्कुल नहीं बचाएगा। ठग किस तरह के लोग होते हैं? सटीक शब्दों में कहा जाए तो, वे गैर-मानव हैं। गैर-मानव वे लोग होते हैं जिनमें अंतरात्मा और विवेक नहीं होते। तो क्या ऐसा व्यक्ति परमेश्वर में विश्वास रखते हुए भी लोगों को ठगता रहेगा? वह निश्चित रूप से ऐसा करेगा। अगर वह परमेश्वर में विश्वास रखने का दावा करता है, तो कुछ भाई-बहन उसके साथ प्यार से पेश आएँगे, उसकी मुश्किलों में उसकी मदद करेंगे और जरूरत के समय उसे सहारा देंगे। लेकिन आखिरकार, जैसे-जैसे समय बीतता है, उन्हें पता चलता है कि यह व्यक्ति बिल्कुल भी सत्य का अनुसरण नहीं करता और असल में एक ठग है। क्या वे लोग ठगे नहीं गए हैं? इसलिए, ठगों द्वारा ठगे जाने से बचने के लिए यह जानना बहुत जरूरी है कि ठगों का भेद कैसे पहचाना जाए। यह भाई-बहनों को ठगे जाने से बचाने के लिए जरूरी है। यदि ऐसे किसी व्यक्ति का पता चलता है, तो उसे बाहर निकाल देना चाहिए, क्योंकि वह बदनाम है और कोई भी बुरा काम करने में सक्षम है—वह समाज में एक बदमाश व्यक्ति है। एक बदमाश व्यक्ति मुक्ति कैसे पा सकता है? बदमाश लोगों को कलीसिया के भीतर रहने की अनुमति नहीं है। वे परमेश्वर के चुने हुए लोगों के बीच रहने के योग्य नहीं हैं। उन्हें बाहर निकाल देना चाहिए; वे परमेश्वर के घर में रहने के लायक नहीं हैं।
कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जिन्हें दूसरों से चीजें उधार लेना खास तौर पर पसंद होता है। चाहे वह खाना हो, कपड़े हों, औजार हों, कंप्यूटर हों या फर्नीचर—वे सब कुछ उधार ले लेते हैं—यहाँ तक कि पैसे, गहने और कार भी। कुछ लोगों के पास अपना पैसा होता है, लेकिन वे खुद चीजें नहीं खरीदते; उन्हें बस दूसरों से उधार लेना पसंद होता है और वे जानबूझकर दूसरों का फायदा उठाते हैं। उदाहरण के लिए, कुछ लोग बाहर जाने के लिए कार उधार लेते हैं और जब उसका सारा गैस खत्म हो जाता है, तब वे उसे दोबारा नहीं भरवाते। कुछ लोग कार उधार लेकर उसे तब तक वापस नहीं करते, जब तक कि कार का मालिक खुद आकर उसे वापस न माँगे। कुछ लोग औजार उधार लेते हैं और जब वे उन्हें तोड़ देते हैं, तब मालिक के लिए उनकी मरम्मत भी नहीं करवाते; यहाँ तक कि माफी का एक शब्द भी नहीं कहते। कुछ लोग पैसे उधार लेकर पूरी तरह खर्च कर डालते हैं और उन्हें वापस चुकाने का उनका कोई इरादा नहीं होता, मानो वे पैसे उन्हीं के हों। वे बस यही उम्मीद करते हैं कि उधार देने वाला व्यक्ति इस बारे में भूल जाए, वे ठीक यही चाहते भी हैं, और वे जानबूझकर इसी बात का फायदा उठाते हैं। वे दूसरों के पैसों का इस्तेमाल अपने कारोबार, खाने-पीने और मनोरंजन के लिए करते हैं, जबकि खुद के पैसों को वे ब्याज कमाने या शेयरों में निवेश करने के लिए बचाकर रखते हैं। जब उनसे पूछा जाता है कि वे पैसे कब वापस करेंगे, तब वे कहते हैं, “जब मेरे पास पैसे होंगे, तब मैं वापस चुका दूँगा। अभी जब मेरे पास पैसे नहीं हैं, तो मैं कैसे चुका सकता हूँ!” देखा तुमने? उनका असली चेहरा उजागर हो गया, है ना? शुरू से ही उनका इरादा कभी पैसे वापस न चुकाने का था। यह किस तरह का इंसान है? यह एक बदमाश है। दूसरे लोग जब किसी के पास कोई अच्छी घड़ी देखते हैं, तब उसे कुछ दिनों के लिए उधार माँग लेते हैं और आखिर में उस घड़ी को पूरी तरह गंदा कर देते हैं। जब घड़ी का मालिक उसे वापस लेने आता है, तब वे परेशान हो जाते हैं और कहते हैं, “तुम कितने कंजूस हो! मैंने तो इसे बस कुछ ही दिन रखा है और तुम अभी से इसे वापस माँगने आ गए!” यह किस तरह की मानसिकता है? हमेशा दूसरों की अच्छी चीजों पर अपना हक जताने की चाहत रखना। क्या यह लालची होना नहीं है? उन्हें लगता है कि चीजें उधार लेना पूरी तरह से जायज है, इसलिए वे हमेशा दूसरों से उधार लेने के मौके तलाशते रहते हैं। वे चाहे कोई भी चीज उधार लें, वे उसे कभी वापस नहीं करना चाहते; वे बस यही उम्मीद करते हैं कि उन चीजों को हमेशा के लिए अपने पास रख लें। यह किस तरह का इंसान है? (यह एक गुंडा और बदमाश है; यह गैर-मानव है।) अविश्वासियों में ऐसे बहुत-से बदमाश और गैर-मानव होते हैं—हम उनके बारे में और चर्चा नहीं करेंगे। लेकिन क्या परमेश्वर में विश्वास करने वालों में भी ऐसे लोग होते हैं? यदि ऐसा कोई व्यक्ति किसी तरह कलीसिया में घुस जाता है, तो क्या वह गुंडा और बदमाश नहीं है? (हाँ।) ऐसे बदमाश लोग केवल आशीष पाने के लिए परमेश्वर में विश्वास रखते हैं। जब वे भाई-बहनों के साथ मेलजोल रखते हैं, तब उनमें हमेशा उनका फायदा उठाने की मानसिकता रहती है। वे हमेशा इस ताक में रहते हैं कि भाई-बहनों में से किसके पास पैसा है, किसका प्रभाव है या किसके परिवार के पास अच्छी चीजें हैं, और वे विशिष्ट रूप से ऐसे ही लोगों को निशाना बनाते हैं। वे जिसका भी फायदा उठा सकते हैं उठाते हैं और ऐसे लोगों से ही मेलजोल रखते हैं जिनका फायदा उठाना आसान हो। वे हमेशा भाई-बहनों से चीजें उधार लेते रहते हैं और “भाई-बहन एक ही परिवार हैं” की आड़ में उन्हें बताते हैं कि उन्हें क्या करना चाहिए; यहाँ तक कि वे यह भी माँग करते हैं कि भाई-बहन उनकी मेजबानी करें। कुछ भाई-बहन, जिन्होंने अभी-अभी परमेश्वर में विश्वास रखना शुरू किया है, वे सत्य नहीं समझते और उनमें भेद पहचानने की क्षमता नहीं होती; इसलिए वे ऐसे व्यक्ति को भी भाई या बहन ही मानते हैं और उसे मना करना उन्हें अटपटा लगता है। लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता है, उन्हें पता चलता है कि यह व्यक्ति उनके घर में मुफ्त की रोटियाँ तोड़ रहा है और वहाँ से जाने का नाम नहीं लेता; जब भी उसे अच्छा खाना दिखता है, वह लगातार खाता रहता है और अपनी मर्जी से अच्छी-अच्छी चीजें उठा लेता है। इसके अलावा, यह व्यक्ति न तो सत्य का अनुसरण करता है और न ही जरा भी अपना कर्तव्य करता है, वह दिन भर बस फायदा उठाने के बारे में ही सोचता रहता है। इसलिए, भाई-बहनों के मन में उसके प्रति घृणा पैदा हो जाती है। परमेश्वर के घर में ऐसे लोगों को देखकर कुछ लोगों के मन में परमेश्वर के प्रति धारणाएँ विकसित होने लगती हैं; वे मन ही मन सोचते हैं, “परमेश्वर ऐसे व्यक्ति को कैसे चुन सकता है?” असल में, ऐसे व्यक्ति को परमेश्वर ने नहीं चुना है; बल्कि वह किसी तरह कलीसिया में घुस आया है। जिन लोगों ने उसे सुसमाचार का उपदेश दिया था, वे उसकी असली पृष्ठभूमि के बारे में नहीं जानते थे और कलीसिया ने उसे स्वीकार कर लिया। ऐसी स्थितियाँ सामने आती रहती हैं। परमेश्वर ऐसे बदमाशों और गैर-मानवों को बिल्कुल भी नहीं चुनता। यदि ऐसे बुरे लोग और बदमाश पकड़े जाते हैं, तो उनसे तुरंत दूरी बना लेनी चाहिए और उन्हें अस्वीकार कर देना चाहिए। उनके साथ भाई-बहनों जैसा व्यवहार मत करो; वे बस मुफ्तखोर हैं। अगर तुम ऐसे बदमाश को भाई या बहन मानते हो और सोचते हो कि उसे परमेश्वर ने चुना है, तो तुम्हारी समझ विकृत है। परमेश्वर जिन लोगों को चुनता है, वे कम से कम ऐसे लोग होते हैं जिनमें अच्छी मानवता होती है और जो सत्य स्वीकार कर सकते हैं। परमेश्वर ऐसे बदमाशों और बुरे लोगों को कभी नहीं चुनेगा, क्योंकि परमेश्वर बदमाशों और बुरे लोगों को नहीं बचाता; परमेश्वर ऐसे लोगों को नहीं चाहता। भले ही ऐसे लोग परमेश्वर में विश्वास करने लगें, फिर भी वह उन्हें बेनकाब कर देगा और हटा देगा। अब तुम समझे? (हाँ।) ऐसे लोगों से निपटने के बाद लोग पूरी तरह से उनसे विमुख हो जाते हैं, वे उनसे नफरत करते हैं और उन्हें उनसे घिन आती है। अगर वे परमेश्वर से जुड़ जाएँ, तो क्या परमेश्वर ऐसे लोगों को पसंद कर सकता है? जवाब स्पष्ट है : परमेश्वर ऐसे लोगों को बिल्कुल पसंद नहीं करता, न ही वह उन्हें कभी चुनेगा। परमेश्वर के घर को ऐसे लोगों द्वारा कर्तव्य करने की जरूरत नहीं है और वे किसी भी काम में सक्षम नहीं हैं। वे बस उपद्रवी हैं, ऐसे लोग हैं जो बस बिना किसी उद्देश्य के इधर-उधर घूमते रहते हैं। वे परमेश्वर के घर में बस मुफ्त के निवाले खाने आते हैं। उन्हें लगता है कि परमेश्वर में विश्वास रखने वाले सभी लोग निष्कपट होते हैं, विशेष रूप से सच्चे और प्यार करने वाले होते हैं और दूसरों की मदद करने के इच्छुक रहते हैं। उन्हें लगता है कि अगर विश्वासी उन्हें पैसे उधार दें, तो भी वापस माँगने में उन्हें बहुत अजीब लगेगा और अगर वे पैसे वापस नहीं करते हैं, तो भी विश्वासी उनकी रिपोर्ट नहीं करेंगे। उन्हें लगता है कि इन लोगों का फायदा उठाना सबसे आसान है। क्योंकि वे कोई नौकरी नहीं करना चाहते, इसलिए वे बस भाई-बहनों से पैसे उधार ले लेते हैं। वे बिना नौकरी किए गुजारा कर सकते हैं और अगर उन्हें मुश्किलें आती हैं, तो कलीसिया उनकी मदद कर सकती है। इससे न केवल उनके किराए की समस्या हल हो जाती है, बल्कि उनके खर्च के पैसे भी निकल आते है और वे बेफिक्र होकर अपने दिन गुजारते हैं। कुछ भाई-बहनों में भेद पहचानने की क्षमता नहीं होती और वे असल में ऐसे लोगों की आजीविका के साधन बन जाते हैं; सचमुच उन्हें फायदा उठाने और कमियों का लाभ उठाने देते हैं। क्या ऐसा इसलिए नहीं है क्योंकि उनमें भेद पहचानने की क्षमता नहीं है? (हाँ।) लोग बहुत बेवकूफ होते हैं और उनमें दूसरों का भेद पहचानने की क्षमता नहीं होती है, इसलिए वे कभी-कभी कुछ मूर्खतापूर्ण चीजें करते हैं। क्या अब तुम जानते हो कि ऐसे लोगों का भेद कैसे पहचाना जाए? (हाँ।) चूँकि तुम उनका भेद पहचान सकते हो, इसलिए तुम्हें ऐसे लोगों को बाहर निकाल देना चाहिए। वे परमेश्वर के चुने हुए लोग नहीं हैं, इसलिए उनके प्रति कोई प्यार दिखाने की कतई जरूरत नहीं है। वे हमेशा कुछ मुफ्त में पाना चाहते हैं और जिस खेत को उन्होंने बोया नहीं है उसकी फसल काटना चाहते हैं—वे उपद्रवी हैं! किस हक से उन्हें तुम्हारी कड़ी मेहनत की कमाई खर्च करनी चाहिए और तुम्हारी चीजों का अपनी मर्जी से इस्तेमाल करना चाहिए? ऐसे इंसान को बर्दाश्त करना और उसे खुश करना, यहाँ तक कि उसकी आजीविका का इंतजाम करना—यह परमेश्वर का तुम्हें दिया हुआ कर्तव्य नहीं है, न ही यह वह आदेश और मिशन है जो परमेश्वर ने तुम्हें सौंपा है। उसके प्रति प्यार दिखाने की तुम्हारी कोई जिम्मेदारी या दायित्व नहीं है। सच्चे भाई-बहनों के प्रति परमेश्वर के सिद्धांतों और अपेक्षाओं के अनुसार प्यार दिखाना, यही तुम्हारी जिम्मेदारी और दायित्व है। सच्चे भाई-बहनों का पोषण करना, उनकी मदद करना और उन्हें सहारा देना, यहाँ तक कि आर्थिक और भौतिक मदद भी करना, यह सब परमेश्वर के इरादों के अनुरूप है। ये अच्छे कर्म हैं और परमेश्वर उन्हें याद रखता है। लेकिन इन गैर-मानवों के लिए, न तो उनके साथ विनम्रता से पेश आने की जरूरत है, न ही उनके प्रति प्यार भरा व्यवहार करने की जरूरत है। प्यार, सहनशीलता और धैर्य सच्चे भाई-बहनों के लिए होते हैं। गैर-मानवों, गुंड़ों, बदमाशों और उपद्रवियों के लिए प्यार, सहनशीलता या धैर्य दिखाने की कोई जरूरत नहीं है। यही सिद्धांत है। एक उपद्रवी, मुफ्तखोर के लिए, जिसमें शर्मिंदगी की कोई भावना नहीं है और जो यह नहीं जानता कि क्या सही है और क्या गलत, अगर तुम आँख बंद करके उसके प्रति धैर्य और प्यार दिखाते हो, तो यह बेवकूफी है और सिद्धांतहीन होना है और परमेश्वर इसे जरा भी याद नहीं रखता। तुम्हारा इन चीजों को करने का सत्य से कोई लेना-देना नहीं है; यह परमेश्वर द्वारा स्वीकार नहीं किया जाता है और यह बेकार में किया गया काम है।
कुछ लोग अक्सर भाई-बहनों, अगुआओं और कार्यकर्ताओं, परमेश्वर के घर और उसकी कार्य व्यवस्थाओं पर हमला करते हैं; यहाँ तक कि वे परमेश्वर पर भी हमला करते हैं और उसकी आलोचना करते हैं। और ऐसा करने के लिए उनके पास क्या बहाना होता है? “मैं जो करता हूँ, वह निष्पक्ष भाव से करता हूँ। मेरा कोई और इरादा नहीं है। मैं ये चीजें सत्य की खोज करने के रवैये से और पूरी लगन से कह रहा हूँ और कर रहा हूँ!” वे काफी विवेकशील लगते हैं और धार्मिकता के अंदाज में बात करते हैं। दरअसल, वे जो भी कहते हैं और जो कुछ भी करते हैं, वह सत्य के अनुरूप नहीं होता और उनके गलत विचारों और दृष्टिकोणों का नतीजा होता है; इसके अलावा, यह सब कलीसिया के काम में बाधा डालता है और गड़बड़ी पैदा करता है, फिर भी वे सोचते हैं, “मैं जो कर रहा हूँ वह सही है। मैं सही हूँ। तुम मुझे दोषी नहीं ठहरा सकते!” वे परमेश्वर में विश्वास करते हैं, फिर भी उस पर हमला करते हैं। उनके दिल परमेश्वर के प्रति अवज्ञा और गुस्से से भरे हैं, वे उसे नीचा भी दिखाते हैं और उसका अनादर भी करते हैं, फिर भी उन्हें एहसास नहीं होता कि यह गलत है; इसके बजाय, वे इसे ऐसे करते हैं जैसे कि यह सही काम हो, जैसे कि यह उनका कर्तव्य और दायित्व हो। भ्रष्ट मानवजाति में, यह कहा जा सकता है कि ऐसे लोगों में सबसे गंभीर समस्याएँ होती हैं। उनकी अभिव्यक्तियाँ और खुलासे सामान्य लोगों में आम तौर पर देखे जाने वाले सामान्य गलत विचार और दृष्टिकोण या चीजों से निपटने के तरीके नहीं हैं, न ही वे मानवता के दोष हैं। इसके बजाय उनमें क्या शामिल होता है? (उनमें परमेश्वर और परमेश्वर के घर का काम शामिल होता है।) उनमें सकारात्मक चीजों के प्रति और परमेश्वर के प्रति व्यक्ति का रवैया शामिल होता है। उनकी इन अभिव्यक्तियों में सिर्फ लोगों के बीच के रिश्ते या चीजों से निपटने के लोगों के तरीके और साधन शामिल नहीं हैं; उनमें लोगों और परमेश्वर के बीच के रिश्ते, लोग परमेश्वर के साथ कैसा व्यवहार करते हैं और लोगों का परमेश्वर के प्रति रवैया शामिल है। इन लोगों के परमेश्वर के प्रति रवैये में न केवल जरा भी समर्पण नहीं होता, बल्कि अपने दिलों में, वे अक्सर परमेश्वर के उन सभी कामों और वचनों पर हमला करते हैं जो मानवीय धारणाओं के अनुरूप नहीं होते, उनकी आलोचना करते हैं और उनकी निंदा करते हैं। वे इस बात से भी इनकार करते हैं कि परमेश्वर के सभी वचन सत्य हैं और वे परमेश्वर के घर की सभी कार्य व्यवस्थाओं को दूर धकेल सकते हैं। बाहर से, वे कोई तर्क या बयान नहीं देते या लोगों को खुलेआम और बेशर्मी से भड़काते नहीं हैं, लेकिन अपने दिल की गहराइयों में, वे अक्सर परमेश्वर के बारे में फैसला सुनाने और उस पर हमला करने के विचार रखते हैं। समय-समय पर, वे कुछ ऐसे गलत विचार और दृष्टिकोण फैलाते हैं जो परमेश्वर के बारे में फैसला सुनाते हैं; वे लोगों के दिलों को अशांत करने और उन्हें परमेश्वर से दूर ले जाने के लिए नकारात्मकता और मौत फैलाते हैं। इन लोगों का सार मसीह-विरोधियों वाला है। मसीह-विरोधियों के दिलों में बहुत सारे भ्रामक विचार और दृष्टिकोण होते हैं। भले ही वे उन्हें खुले तौर पर बेशर्मी से व्यक्त करने की हिम्मत नहीं करते, लेकिन जब वे पर्दे के पीछे लोगों से मिलते-जुलते हैं, तब ये चीजें स्वाभाविक रूप से प्रकट हो जाती हैं। मुझे बताओ, क्या ऐसे लोगों में समस्याएँ हैं? (हाँ।) किस तरह की समस्या है? (ऐसे लोगों में दानवों का सार होता है, क्योंकि परमेश्वर और उनके बीच कोई मनमुटाव नहीं है और परमेश्वर लोगों को बचाने के लिए बहुत सारे सत्य व्यक्त करता है, फिर भी वे लगातार उस पर हमला करते हैं और उसके बारे में फैसला सुनाते हैं। वे अपने दिल में सत्य और परमेश्वर से नफरत करते हैं—उनमें दानवों का सार होता है।) तुम देखो, मैं यहाँ उपदेश दे रहा हूँ और जब सब सुन रहे होते हैं, तब कुछ लोग अपने अंतरतम में सोचते हैं कि वे इसे ठीक से कैसे समझ सकते हैं और स्वीकार कर सकते हैं : “आज के धर्मोपदेश का विषय क्या है? मुझे भ्रष्टता की इन उजागर की गई अभिव्यक्तियों के विरुद्ध खुद को कैसे परखना चाहिए और खुद को कैसे जानना चाहिए?” उनका रवैया स्वीकृति का होता है। स्वीकृति के रवैये वाले ये लोग, जो सामान्य मानवता की अंतरात्मा और विवेक के भीतर जीते हैं, अक्सर कुछ प्रबोधन और प्रकाश पाते हैं। अपने दिल की गहराई में, वे परमेश्वर के कार्य या सकारात्मक चीजों को दूर नहीं धकेलते। बात बस इतनी है कि अपनी खराब काबिलियत के कारण, वे सत्य समझने में थोड़े धीमे होते हैं और कभी-कभी उनकी दशा गलत होती है, क्योंकि वे अपने भ्रष्ट स्वभावों से नियंत्रित होते हैं। हालाँकि, उनके दिल सत्य की ओर प्रयास कर रहे होते हैं और परमेश्वर के साथ उनका रिश्ता ज्यादातर समय सामान्य ही रहता है। बस कभी-कभी, जब उनके भ्रष्ट स्वभाव बाधा डालते हैं, तब उनमें एक नकारात्मक दशा विकसित हो जाती है और वे परमेश्वर के इतने करीब नहीं होते। लेकिन अपने दिलों में, वे परमेश्वर की पड़ताल नहीं करते या उस पर सवाल नहीं उठाते, न ही वे उसका प्रतिरोध करते हैं या उसे बाहर करते हैं; उनमें परमेश्वर को नीचा दिखाने, उसका मजाक उड़ाने या उसकी कीमत पर खुश होने का रवैया तो और भी कम होता है। लेकिन लोगों का एक और समूह है जो इनसे अलग है। चाहे किसी भी विषय पर चर्चा हो रही हो, वे सत्य के प्यासे होने, उसके प्रति समर्पण करने और उसे स्वीकार करने की मानसिकता के साथ धर्मोपदेश नहीं सुनते। इसके बजाय, वे पड़ताल करने और सवाल करने की मानसिकता के साथ सुनते हैं : “तुम ऐसा क्यों कह रहे हो? ये बातें कहने के पीछे तुम्हारा उद्देश्य क्या है? तुम किसे उजागर करने और बेनकाब करने की कोशिश कर रहे हो? या तुम किस पर हमला करने और किसकी निंदा करने की कोशिश कर रहे हो? इसका मुझसे क्या लेना-देना है?” अगर दूसरे लोग इसे स्वीकार कर सकते हैं और खुद पर लागू कर पाते हैं, तो वे चिढ़ जाते हैं। अगर उन्हें पता चलता है कि किसी व्यक्ति को ये सत्य समझ नहीं आ रहे हैं और वह इन्हें खुद पर लागू नहीं कर पा रहा है, तो उन्हें बहुत खुशी होती है और उन्हें उपलब्धि का एक गहरा एहसास होता है : “आखिरकार, मुझे परमेश्वर की निंदा करने का मौका मिल गया! आखिरकार, मुझे उसके बारे में कुछ पता चल गया!” वे अक्सर इस तरह की मानसिकता के साथ धर्मोपदेश सुनते हैं। खासकर कोई सामग्री जिसके बारे में बात की जा रही है अगर वह उनकी दशाओं और अभिव्यक्तियों को लक्ष्य बनाती है, तो उनका रवैया न तो स्वीकार करने वाला होता है, न ही विनम्रता और नरमी वाला। इसके बजाय, वे अपने दिलों में प्रतिरोध, अरुचि और बेहद घृणा महसूस करते हैं। उन्हें लगता है कि मैं जो कह रहा हूँ वह सिर्फ भाषण झाड़ना और बड़ी-बड़ी बातें बोलना है। वे सुनना नहीं चाहते और इसे आत्मसात नहीं कर पाते। खासकर जब उनकी दुखती रगों और कमजोरियों के बारे में बात की जाती है, तब उन्हें और भी ज्यादा अरुचि और बेहद घृणा महसूस होती है, वे अंदर से बहुत असहज महसूस करते हैं। उनकी असहजता इस बात के पछतावे या दुख से नहीं आती कि उनमें भ्रष्ट स्वभाव हैं, बल्कि उन्हें उजागर करने के लिए इस्तेमाल किए गए तरीके और भाषा के साथ-साथ उजागर करने की सामग्री और उनके अपने उजागर किए गए सार के प्रति उनके प्रतिरोध और अस्वीकृति से आती है। सामान्य परिस्थितियों में, जब कोई आम इंसान कलीसिया का कोई काम करता है, तब अगर वह ऊपरवाले की कार्य व्यवस्थाओं या उसके पोषण और मार्गदर्शन को विनम्रता और समर्पण के रवैये के साथ स्वीकार करता है, तो कुछ समय बाद वह थोड़ी प्रगति कर लेगा। उसे इसकी आदत हो जाएगी, वह कुछ तरीके समझ जाएगा और अभ्यास के कुछ सिद्धांत और मार्ग ढूँढ़ लेगा। दूसरे शब्दों में, वह लगातार प्रगति करेगा, बदलेगा और कुछ हासिल करेगा। लेकिन जो लोग अपने दिलों में प्रतिरोध रखते हैं, वे अलग होते हैं। क्योंकि उनके दिल परमेश्वर के प्रति जाँच-पड़ताल, प्रतिरोध, उपहास और सतर्कता से भरे होते हैं, इसलिए उनके लिए परमेश्वर और सत्य उनकी जाँच-पड़ताल का विषय होते हैं। उन्हें सत्य की प्यास नहीं होती। जब वे अपने कर्तव्य करते हैं, तब वे काम करने के लिए अपनी खूबियों या छोटी-मोटी चालाकी पर भरोसा करते हैं। जैसे ही उन्हें कोई समस्या या मुश्किल आती है, वे उनका समाधान करने के लिए सत्य की खोज नहीं करते। जब सत्य सिद्धांतों से जुड़े मामलों की बात आती है, तब उन्हें बस कुछ भी पता नहीं होता। चाहे वे किसी भी मुश्किल का सामना कर रहे हों, जब तक उनमें सत्य सिद्धांत शामिल होते हैं, उन्हें लगता है कि वे बहुत मुश्किल, थकाऊ और उनकी पहुँच से बाहर हैं—जैसे किसी मछली को जमीन पर रहने के लिए मजबूर करना या किसी सूअर को उड़ने के लिए मजबूर करना। ऐसे लोग कितनी भी कोशिश कर लें, वे सत्य तक नहीं पहुँच सकते। वे जो कुछ भी कहते हैं, उससे वे आम लोगों जैसे लगते हैं, जिससे तुम्हें शक होता है कि क्या उन्होंने इतने सालों के अपने विश्वास में कभी परमेश्वर के वचन पढ़े हैं या सच पर संगति की है और क्या उन्होंने कभी सच में कलीसियाई जीवन जिया है। यह हैरान करने वाला है। क्या ऐसे लोग बहुत समस्या पैदा करने वाले नहीं होते? मेरे पास उनके बारे में बताने के लिए एक शब्द है : उनमें कोई आध्यात्मिक आभा नहीं होती। इसका मतलब है कि सबसे आसान काम करते समय भी वे यह नहीं समझ पाते कि उसे कैसे करना है और प्रयास करने पर भी उन्हें वह समझ नहीं आता। आध्यात्मिक आभा न होने का मतलब यह नहीं है कि कोई व्यक्ति सुस्त और ढीला दिखता है। बल्कि इसका मतलब है कि जब काम करने की बात आती है, तब वे नासमझ होते हैं। वे चाहे कुछ भी करें, उन्हें सिद्धांत या दिशा नहीं मिल पाती; चाहे वे इसे कितने भी समय तक करें, वे इसमें शामिल नियमों को नहीं समझ पाते। यह बात खासकर परमेश्वर के घर के कार्यों की अलग-अलग मदों के लिए सच है। हालाँकि ऐसे लोग पढ़े-लिखे, अपेक्षाकृत युवा और दिखने में बुद्धिमान हो सकते हैं, लेकिन परमेश्वर के घर में कर्तव्य निभाते और काम करते समय वे खास तौर पर अनाड़ी लगते हैं। उन्हें देखकर ही लोगों को गुस्सा आता है; यह बात हैरान करने वाली लगती है। यहाँ एक जीता-जागता, सांस लेता हुआ, पढ़ा-लिखा और काबिल इंसान है—वह हर काम में इतना नाकाबिल कैसे हो सकता है? वह इतना अनाड़ी कैसे हो सकता है? बात यह है कि संसार में वह जो काम करता था वह बुरा नहीं था, तो फिर परमेश्वर के घर का काम करते समय वह इतना अजीब और नाकाबिल क्यों है? यहाँ एक समस्या है। जब ऐसे लोग तीन से पाँच साल परमेश्वर में विश्वास कर लेते हैं, तब वे बस कुछ शब्द और धर्म-सिद्धांत ही समझते हैं। बोलते समय वे बस नारे लगाते हैं और उनके क्रियाकालापों में बिल्कुल भी सिद्धांत नहीं होते। सात या आठ साल विश्वास करने के बाद भी वे जो कहते हैं वे बस वही पुरानी बातें होती हैं, उनमें जरा-सी भी प्रगति नहीं हुई होती है। प्लास्टिक के फूलों की तरह, वे बिल्कुल नहीं बदले हैं। उन्हें कोई आत्मज्ञान नहीं है, परमेश्वर के वचनों में उनका कोई प्रवेश नहीं है और उन्होंने कुछ भी हासिल नहीं किया है। जब वे सत्य पर संगति करते हैं, तब ऐसा लगता है जैसे वे कहानियाँ सुना रहे हों या घरेलू मामलों पर बात कर रहे हों—यह इतना अजीब क्यों लगता है? दूसरे कहते हैं, “हमें अपना काम लगन से करना चाहिए, अपनी सच्चाई दिखानी चाहिए, अपना कर्तव्य अच्छी तरह से करना चाहिए और खुद को परमेश्वर के लिए खपाना चाहिए।” लेकिन वे क्या कहते हैं? “चलो बस कड़ी मेहनत करते हैं, अपना सब कुछ लगा देते हैं और अच्छा काम करते हैं!” दस साल से ज्यादा समय से परमेश्वर में विश्वास करने के बाद भी वे, “अपना काम लगन से करो” ये शब्द भी नहीं कह सकते। वे बस इतना ही कहना जानते हैं, “अधिक प्रयास करो, अधिक काम करो, परमेश्वर के घर के लिए काम करो, अपना जीवन परमेश्वर के घर के लिए काम करने में लगा दो। हमारे पास ज्यादा कुछ नहीं है, लेकिन हमारे पास ताकत है!” ये सब बातें आम लोग कहते हैं; वे आध्यात्मिक शब्दों का भी पूरी तरह इस्तेमाल नहीं कर सकते। ऐसे लोग काफी सालों से परमेश्वर में विश्वास रखते आए हैं, कम से कम सात या आठ सालों से, या फिर दस से भी ज्यादा सालों से। वे हमेशा से परमेश्वर के घर में अपना काम करते रहे हैं और उन्होंने धर्मोपदेश सुनने में भी काफी समय बिताया है। तो फिर वे बोलते समय आध्यात्मिक शब्दों का सही तरीके से इस्तेमाल क्यों नहीं कर पाते? ऐसे लोग हर दिन अपने दिलों में किस बारे में सोचते हैं, किन बातों से भरे रहते हैं, किन बातों पर चिंतन करते हैं और किन बातों पर विचार करते रहते हैं? यह पूरी तरह से एक रहस्य है! अगर तुम उन्हें कुछ समय तक ध्यान से देखो, तो तुम पाओगे कि वे हर दिन जिन चीजों के बारे में सोचते हैं, जिन चीजों के बारे में चिंतन करते हैं और जिन चीजों से भरे रहते हैं, असल में वे सब केवल दैहिक मामले ही होते हैं। वे संकीर्ण सोच वाले, तुच्छ और हिसाब-किताब लगाने वाले होते हैं, जो दिन भर इस बात में उलझे रहते हैं कि कौन अच्छा है और कौन बुरा; वे निजी दुश्मनी और ऐसी ही दूसरी छोटी-मोटी, निरर्थक बातों में उलझे रहते हैं, जिनका सत्य से कोई लेना-देना नहीं होता। उनकी सोच, उनके विचार और दृष्टिकोण सभी गलत, हास्यास्पद और बेतुके होते हैं। बाहर से, ऐसे लोग पढ़े-लिखे और काबिल दिखते हैं; कुछ ने तो समाज में कारोबार भी चलाए हैं। ऐसा क्यों है कि परमेश्वर में विश्वास रखने के बाद उनमें जरा भी आध्यात्मिक आभा नहीं दिखती? तुम उन्हें किसी भी तरह से देखो, वे बस एक लकड़ी के पुतले या रोबोट जैसे लगते हैं। वे चाहे कोई भी कर्तव्य करें, इतने अनाड़ी क्यों होते हैं? उनके मुँह से निकलने वाले आध्यात्मिक शब्द इतने अजीब क्यों लगते हैं? वे तोते जितने भी अच्छे नहीं हैं जो बोलने की नकल कर सकता है। अगर तुम तोते के सामने “आमीन, परमेश्वर का धन्यवाद!” कहते रहो, तो वह इसे बहुत अच्छे से बोलना सीख सकता है। लेकिन ये लोग “परमेश्वर का धन्यवाद” भी नहीं कह सकते; वे “धन्यवाद, परमेश्वर” कहते हैं। और अगर तुम चीजों से निपटने के उनके सिद्धांतों को देखो, तो वे हर दिन अपने दिल में क्या सोचते हैं, क्या हिसाब लगाते हैं, क्या योजना बनाते हैं, वे अंदर से क्या पसंद करते हैं और किस चीज का अनुसरण करने के लिए उत्साही हैं, इन सब का सकारात्मक चीजों से कोई लेना-देना नहीं है; वे सब बुरी प्रवृत्तियों की चीजें हैं, नकारात्मक चीजें हैं। इसलिए, ये लोग अपने दिलों में जो कुछ भी सोचते हैं वह सब बुरा होता है—यह बात जरा भी गलत नहीं है। यहाँ तक कि जब वे सभाओं में संगति करते हैं, तब भी उनकी संगति की विषय-वस्तु और जो विचार और दृष्टिकोण वे प्रकट करते हैं, वे सब विकृत होते हैं। वे जरा भी सत्य की खोज नहीं करते और कोई प्रबोधन या रोशनी पाने में असमर्थ रहते हैं। जब दूसरे लोग परमेश्वर के वचनों के बारे में अपनी निजी प्रबुद्धता, रोशनी और समझ साझा करते हैं, तब वे बहुत अजीब, संदर्भ से बाहर प्रतीत होते हैं और बिल्कुल समझ नहीं पाते कि क्या करें। जब मेहनत और काम करने की बात आती है, तब उनमें कुछ ताकत होती है और वे कड़ी मेहनत करने के इच्छुक रहते हैं, लेकिन अगर तुम उनसे सत्य पर संगति करने के लिए कहो, तो वे कुछ नहीं कह पाते। ऐसे लोग चाहे कितने भी साल परमेश्वर में विश्वास करें, उन्हें कभी एहसास नहीं होता कि लोगों को जीवन में कौन-सा मार्ग अपनाना चाहिए या किस चीज का अनुसरण करना सबसे मूल्यवान है। थोड़ी-सी भी अंतरात्मा और विवेक वाला व्यक्ति, भले ही वह परमेश्वर में विश्वास न करता हो, पचास या साठ साल की उम्र का होने तक लोगों में जो सामान्य समझ और अंतर्दृष्टि होनी चाहिए, उसे पहचान सकता है; और गहरे स्तर पर, वह जीवन के कुछ फलसफों को भी पहचान सकता है। और यह कहने की ज़रूरत नहीं है कि परमेश्वर में विश्वास करने वालों पर यह बात और भी ज्यादा लागू होती है—दस या बीस साल विश्वास करने के बाद, वे कुछ सत्य समझ सकते हैं; सच्ची आस्था और परमेश्वर का भय मानने वाला दिल विकसित कर सकते हैं। लेकिन जो लोग सत्य से प्यार नहीं करते, चाहे वे कितने भी साल परमेश्वर में विश्वास करें, उन्हें अपनी जीवन से जुड़ी बातों का, इस बात का कि कौन-सा रास्ता अपनाना है या जीवन की आध्यात्मिक बातों का कोई एहसास या अनुभूति नहीं होती। अगर वे सौ साल भी जी लें, तो भी वे केवल कुछ धर्म-सिद्धांत ही कह पाएँगे और अड़ियल बनकर उन कुछ दृष्टिकोणों से चिपके रहेंगे। क्या ऐसे लोग बहुत समस्या पैदा करने वाले नहीं हैं? वे किस तरह के लोग हैं? अगर ऐसे लोगों में बुरी मानवता है, तो वे दानव और शैतान हैं। अगर वे बुरे लोग नहीं हैं, बल्कि सिर्फ भ्रमित, सुन्न और मंदबुद्धि लोग हैं, तो वे क्या हैं? (जानवर।) इसका मतलब है कि वे जानवरों से पैदा हुए हैं; यह बिल्कुल सच है। दानवों से पैदा हुए और जानवरों से पैदा हुए, दोनों तरह के लोगों में एक सामान्य गुण होता है : वे सत्य स्वीकार नहीं करते और सत्य से विमुख होते हैं। जब तक तुम सत्य पर संगति करते हो, दानवों से पैदा हुए लोग स्पष्ट तौर पर विमुखता और प्रतिरोध दिखाते हैं; उनके पास हर सत्य को निशाना बनाने वाले स्पष्ट विचार, सोच और दृष्टिकोण होते हैं। लेकिन जानवरों से पैदा होने वालों में स्पष्ट विचार और दृष्टिकोण नहीं होते; वे भ्रमित होते हैं। उन्हें बस अपने दिलों में अरुचि महसूस होती है और वे सत्य स्वीकार नहीं करते। उनके कुछ विकृत विचार और दृष्टिकोण भी होते हैं जो पूरी तरह से आधारहीन होते हैं। ये ऐसे दृष्टिकोण हैं जिन्हें खुलकर सामने नहीं लाया जा सकता और जिन्हें कोई सामान्य इंसान कभी नहीं कहेगा, फिर भी वे उन्हें बहुत संजोकर रखते हैं। संक्षेप में, दानवों से पैदा होने वालों और जानवरों से पैदा होने वालों, दोनों की अभिव्यक्तियों में सत्य के प्रति बहुत ज्यादा अरुचि और बेहद घृणा का रवैया होता है : दानवों से पैदा होने वालों में अत्यंत व्यक्तिपरक अरुचि, बेहद घृणा और निंदा होती है; वहीं जानवरों से पैदा होने वालों में अन्यमनस्क अरुचि, बेहद घृणा और दूरी बनाने का भाव होता है—भले ही यह उतना कट्टर नहीं होता है, लेकिन सत्य के प्रति उनके रवैये की प्रकृति एक जैसी होती है। इसलिए, ये दोनों तरह के लोग चाहे कितने भी धर्मोपदेश सुन लें, वे उनका मतलब नहीं समझ पाते या उन्हें समझ नहीं पाते, क्योंकि वे उन्हें ग्रहण ही नहीं कर पाते। अगर कोई तीन या पाँच साल से परमेश्वर में विश्वास कर रहा है और वह आध्यात्मिक शब्दों का पूरी तरह से या अच्छी तरह से इस्तेमाल नहीं कर सकता है, तो यह माफ करने लायक है, क्योंकि आध्यात्मिक शब्द हर किसी के लिए बहुत अपरिचित होते हैं; वे एक नई तरह की भाषा हैं। जब लोग परमेश्वर में विश्वास करना शुरू करते हैं, तब वे जो आध्यात्मिक शब्द सुनते हैं उन्हें ठीक से समझ नहीं पाते और कई शब्द उनके लिए बिल्कुल अनजान होते हैं। लेकिन पाँच साल से ज्यादा परमेश्वर में विश्वास रखने के बाद, चूँकि वे अक्सर धर्मोपदेश सुनते हैं, सत्य पर संगति करते हैं और इस भाषा के संपर्क में आते हैं, इसलिए वे धीरे-धीरे इससे परिचित हो जाते हैं। वे इसे आसानी से, धाराप्रवाह, स्वाभाविक रूप से और बेझिझक बोल पाएँगे। वे इसका इस्तेमाल कर पाएँगे और यह उनकी अपनी भाषा और उनके जीवन का हिस्सा बन जाएगी। ये सामान्य लोगों की अभिव्यक्तियाँ हैं। जिनमें सामान्य लोगों की अभिव्यक्तियाँ नहीं होती हैं, वे ये चीजें हासिल नहीं कर सकते। यहाँ तक कि जब वे कुछ मूलभूत आध्यात्मिक शब्द बोलते हैं, तब भी यह बहुत अजीब लगता है और दूसरों के लिए इसे समझना मुश्किल होता है। जब तुम ऐसे लोगों से मिलते-जुलते हो, तब तुम शायद ही उनसे ऐसी कोई बात सुन पाओगे जो लोगों को सीख दे या जो तार्किक या पूर्ण हो। वे जो कुछ भी कहते हैं वह अधूरा होता है—उसकी शुरुआत तो होती है, लेकिन अंत नहीं होता या अंत तो होता है, लेकिन शुरुआत नहीं होती—या फिर उनकी सोच में कोई तर्क नहीं होता, बस बकवास की एक धारा होती है। इतने लंबे समय तक जीने के बाद भी, वे अभी भी नहीं जानते कि बात कैसे करें। वे जो सोच रहे हैं या जो उन्होंने अनुभव किया है, उसे व्यक्त नहीं कर सकते, उसके बारे में बता नहीं सकते, उसका वर्णन नहीं कर सकते या स्पष्ट रूप से समझा नहीं सकते। वे हमेशा अधूरी बातें बोलते हैं, हमेशा बेवकूफी दिखाते हैं या फिर वे विकृत विचार और दृष्टिकोण व्यक्त करते हैं। चाहे तुम इसे किसी भी दृष्टिकोण से देखो—परमेश्वर के प्रति उनके रवैये से, दैनिक जीवन में उनकी मानवता के खुलासों और अभिव्यक्तियाँ से या इस तथ्य से कि इतने सालों तक जीने के बाद भी उन्हें कुछ हासिल नहीं हुआ—ऐसे लोग गैर-मानव हैं। क्या गैर-मानवों के लिए सत्य समझना आसान है? (नहीं।) अब यह बात और स्पष्ट होती जा रही है कि ऐसे लोगों के लिए सत्य समझना आसान नहीं है।
जहाँ तक यह जानने की बात है कि क्या सही है और क्या गलत, इन उदाहरणों पर चर्चा करने के बाद, क्या अब तुम्हें यह भेद पहचानना नहीं आना चाहिए कि क्या सही है और क्या गलत? हमने जिन ज्यादातर उदाहरणों पर चर्चा की है, वे नकारात्मक हैं। इन नकारात्मक उदाहरणों से तुलना करके, लोगों को असल में पता होना चाहिए कि कौन-सी चीजें सकारात्मक चीजें हैं। जिस किसी में भी मानवता के गुण होते हैं, उसे ऐसी नकारात्मक चीजों की जानकारी होती है। इसलिए, एक सामान्य इंसान ऐसी चीजें सिर्फ विशेष परिस्थितियों में ही करेगा और उन्हें करने के बाद उसे दुख और दर्द होगा, उसमें पश्चात्ताप का रवैया होगा। लेकिन गैर-मानव अलग होते हैं। भले ही वे ये चीजें सौ साल तक करें, उन्हें पता नहीं चलेगा कि वे गलत हैं; वे फिर भी सोचेंगे कि वे सही हैं और आखिर तक डटे रहेंगे। अगर तुम यह उजागर करोगे कि वे जो कर रहे हैं वह गलत है, तो वे जवाब देंगे, “तुम किस आधार पर कह रहे हो कि मैं जो कर रहा हूँ वह गलत है? मैं इतने सालों से यह कर रहा हूँ और मुझे किसी ने कभी नहीं कहा कि मैं गलत हूँ।” जब तुम उन्हें यह कहते हुए सुनते हो, तब तुम्हें कैसा लगता है? (मुझे लगता है कि यह इंसान तर्क से परे है।) वे तर्क से परे हैं। तुम उन्हें बताते हो कि ऐसा करना गलत है, लेकिन वे इसे स्वीकार नहीं करते, इस बात से अनजान रहते हैं कि क्या सही है और क्या गलत। तब तुम बस चुप रह सकते हो : “तुमसे तर्क करना नामुमकिन है; मेरी यह बातचीत यहीं खत्म होती है!” क्या अब तुम्हें गैर-मानवों की अभिव्यक्तियों के बारे में स्पष्ट हो गया है? (हाँ।) गैर-मानव जीवन के मामलों को, भावनाओं के मामलों को, इस बात को कि कैसे आचरण करना है और चीजों से कैसे निपटना है, या सत्यनिष्ठा और गरिमा से जुड़े मामलों को नहीं समझते हैं; यह भी कहा जा सकता है कि ये चीजें उनके बस से बाहर की हैं। स्पष्ट अंतरात्मा के साथ, वे लोगों और चीजों के साथ व्यवहार करने, आचरण और व्यवहार करने के लिए उन गलत विचारों, दृष्टिकोणों और तरीकों को चुनते हैं। इसके अलावा, वे आँखें बंद करके जिद पर अड़े रहते हैं और विश्वास करते हैं कि ऐसा करना सही है। इससे पता चलता है कि उनकी मानवता में अंतरात्मा या विवेक बिल्कुल नहीं है। तो, यह स्पष्ट है कि इन लोगों में मानवता के गुण नहीं हैं; बस यही कहा जा सकता है कि वे गैर-मानव हैं। उनमें जरा भी अंतरात्मा या विवेक नहीं होता और वे पूरी तरह से शैतान के फलसफों के अनुसार जीते हैं, वे सोचते हैं कि वे बहुत कुछ हैं और किसी के आगे नहीं झुकते। परमेश्वर में विश्वास रखने के बाद, अगर ये लोग परमेश्वर के लिए थोड़ा भी खुद को खपाते हैं, तो उन्हें लगता है कि वे परमेश्वर से प्यार करने वाले और उसके प्रति समर्पण करने वाले लोग हैं। ऐसे लोग भले ही दावा करें कि वे परमेश्वर से प्यार करते हैं, लेकिन अपने दिलों में, वे अभी भी उसके बारे में धारणाएँ पालते हैं और जब वे परमेश्वर को ऐसी चीजें करते हुए देखते हैं जो उनकी सोच के अनुरूप नहीं होतीं, तब वे अब भी परमेश्वर के बारे में राय बना सकते हैं और उसका प्रतिरोध कर सकते हैं। ऐसी परिस्थितियों में वे बेशर्मी से यह कहने की भी हिम्मत करते हैं कि वे ही परमेश्वर से सबसे ज्यादा प्यार करते हैं। क्या वे तर्क से परे नहीं हैं? धर्म में ऐसे बहुत-से लोग हैं। वे बाइबल के बारे में बात करते हैं और बाहर से सभी धर्म-सिद्धांतों को समझने वाले दिखते हैं, फिर भी वे परमेश्वर द्वारा व्यक्त किए गए सत्य को नहीं पहचान पाते। प्रभु यीशु में विश्वास करते हुए भी वे देहधारी परमेश्वर की निंदा करते हैं। लोग परमेश्वर में विश्वास करते हैं फिर भी उसका प्रतिरोध करते हैं; यहाँ तक कि उसे पकड़ने और उस पर हमला करने की कोशिश भी कर सकते हैं। वे हमेशा परमेश्वर के खिलाफ साजिश रचने की कोशिश करते हैं, हमेशा परमेश्वर के बारे में फैसला सुनाना चाहते हैं, हमेशा यह आकलन करना चाहते हैं कि परमेश्वर के वचन सही हैं या गलत, वे यह आकलन करना चाहते हैं कि परमेश्वर के क्रियाकलाप सही हैं या गलत, और यह पड़ताल करना चाहते हैं कि परमेश्वर सही है या गलत। क्या ऐसे लोगों के पास कोई अंतरात्मा या विवेक है? तुम परमेश्वर में विश्वास रखते हो, उसके वचनों को खाते और पीते हो, उसके इतने अनुग्रह और उसके इतने सारे आशीषों का आनंद लेते हो, फिर भी जैसे ही तुम परमेश्वर को कुछ ऐसा करते हुए देखते हो जो तुम्हारी धारणाओं के अनुरूप नहीं होता, तुम परमेश्वर के बारे में फैसला सुनाने, परमेश्वर का प्रतिरोध करने और परमेश्वर की निंदा करने की हिम्मत कर बैठते हो। यह तर्क से परे होना है। जो लोग तर्क से परे हैं वे गैर-मानव हैं; वे परमेश्वर में विश्वास रखने और परमेश्वर के सामने आने के लायक नहीं हैं।
ठीक है, आज की हमारी संगति के लिए बस इतना ही। अलविदा!
27 अप्रैल 2024