27. मैं दूसरों की समस्याएँ बताने की हिम्मत क्यों नहीं करती थी

शु हुई, चीन

पहले, मेरी एक पड़ोसन थी जो बहुत साफ-साफ बोलती थी। जब भी वह किसी को कुछ गलत करते हुए देखती, तो वह सीधे-सीधे बता देती थी और नतीजतन अक्सर लोगों को नाराज कर देती थी। दूसरे सभी पड़ोसी उसकी पीठ पीछे बातें करते थे, कहते थे : “इतनी होशियार दिखने वाली लड़की ऐसी मूर्खतापूर्ण हरकतें कैसे कर सकती है?” समय के साथ, जब पड़ोसी आपस में बात कर रहे होते थे, तो उसके आने पर वे सब तितर-बितर हो जाते थे। धीरे-धीरे वह अकेली पड़ गई। इन बातों का मुझ पर गहरा असर हुआ और इसलिए मैंने मान लिया कि भविष्य में दूसरों से मिलते-जुलते समय मुझे उसकी तरह मुँहफट नहीं होना चाहिए, ताकि लोग मुझे नापसंद न करें। जैसा कि कहा जाता है, “अच्छे दोस्तों की गलतियों पर खामोश रहने से दोस्ती अच्छी और लंबी होती है” और “अगर तुम दूसरों पर वार करते हो तो उनके चेहरे पर वार मत करो; अगर तुम दूसरों की आलोचना करते हो तो उनकी कमियों की आलोचना मत करो।” जब तुम दूसरों की समस्याएँ देखो, तो दिल में उन्हें जान लेना ही काफी है—तुम्हें उन्हें लोगों को बताने की जरूरत नहीं है। अगर तुम ऐसा करोगी, तो तुम उन्हें शर्मिंदा करोगी और उन्हें नाराज कर सकती हो। इसलिए जब भी मुझे दूसरों की समस्याएँ दिखती थीं, तो मैं उनके बारे में सीधे बात नहीं करती थी। मेरे सभी पास-पड़ोसी मुझसे मेलजोल रखकर खुश थे और मुझसे कोई भी बात करने को तैयार रहते थे। वे यह कहकर मेरी तारीफ भी करते थे कि मैं लोकप्रिय हूँ और मेरे साथ घुलना-मिलना आसान है। परमेश्वर में विश्वास रखना शुरू करने के बाद, मैं भाई-बहनों के साथ भी अपने रिश्ते इसी तरह निभाती थी। अगर मुझे उनकी समस्याएँ या भ्रष्टता प्रकट होती दिखाई देती, तो मैं उन्हें बताने और उजागर करने को तैयार नहीं होती थी। मेरा मानना था कि ऐसा करने से वे शर्मिंदा होंगे और यह बस उनकी कमजोरियों को उजागर करना होगा और मैं उन्हें नाराज कर दूँगी। कुछ बातों का अनुभव करने के बाद ही मैं समझी कि दुनिया से निपटने के इन तरीकों के सहारे जीना सत्य के विपरीत है।

सितंबर 2023 के मध्य में, मैं अगुआ के रूप में सेवा करने के लिए एक कलीसिया में गई। कुछ भाई-बहनों ने बताया कि सुसमाचार का प्रचार करने वाली बहन झाओ जेन का स्वभाव घमंडी है। वह दूसरे लोगों की भावनाओं का ख्याल किए बिना बोलती है और वे उसके आस-पास थोड़ा बाधित महसूस करते हैं। उन्होंने मुझसे झाओ जेन के साथ संगति करने और उसकी समस्याओं का गहन-विश्लेषण करने को कहा, ताकि उसे खुद को समझने में मदद मिले। मैंने मन में सोचा, “मुझे उसकी मदद करनी है और उसकी समस्याओं का गहराई से विश्लेषण करना है। नहीं तो वह अपने घमंडी स्वभाव के आधार पर बोलती और काम करती रहेगी। इससे भाई-बहन तो उससे बाधित होंगे ही, कार्य पर भी असर पड़ेगा।” लेकिन फिर मैंने सोचा, “मैं इस कलीसिया में नई हूँ और झाओ जेन से परिचित नहीं हूँ। अगर मैं आते ही उसे उजागर करूँगी और उसका गहन-विश्लेषण करूँगी तो क्या यह उसके लिए शर्मनाक नहीं होगा? भविष्य में हम एक-दूसरे के साथ कैसे रहेंगे?” इस पर सोचने के बाद भी मुझे समझ नहीं आया कि क्या करूँ, लेकिन आखिर में मैं बेमन से झाओ जेन से मिलने गई। जब मैंने उसे देखा, तो लगा जैसे मेरे मुँह पर पट्टी बँध गई हो और काफी देर तक मैं कुछ कह नहीं पाई। मैंने सोचा कि भविष्य में मुझे अक्सर उसके साथ ही रहना होगा। अगर मैंने उसे नाराज कर दिया, तो क्या मैं अपने लिए मुसीबत नहीं खड़ी कर लूँगी? मैंने बाद में उसकी समस्याओं का विश्लेषण करने और उन्हें उजागर करने का फैसला किया। इसलिए मैंने बस उसे भविष्य में अपने बोलने के तरीके को लेकर सावधान रहने की एक हल्की सी हिदायत दी और चेहरे पर नाराजगी न दिखाने को कहा क्योंकि इससे लोग बाधित होते हैं। झाओ जेन ने यह सुना और कहा, “मैं साफ बोलने वाली हूँ और मेरे कहने का कोई गलत मतलब नहीं होता। मैं भविष्य में ध्यान दूँगी।” घर जाते समय, मैंने सोचा कि झाओ जेन को अपने भ्रष्ट स्वभाव की कोई समझ नहीं है और मेरे दिल में थोड़ी आत्म-ग्लानि हुई। लेकिन फिर मैंने सोचा, “मैंने उसे कुछ समस्याएँ बताई हैं। अगर भविष्य में मुझे वह फिर से घमंडी स्वभाव प्रकट करती हुई मिली, तो मैं उसके साथ संगति कर उसे उजागर कर सकती हूँ।” इसके कुछ ही समय बाद, सिंचन उपयाजक ने बताया कि सिंचन टीम की अगुआ वांग होंग ने कई मौकों पर अपने कर्तव्य से बचने और सभाओं में शामिल न होने के लिए परिवेश के खतरों का बहाना बनाया था और जिन दो समूहों की वह जिम्मेदार थी, उनकी उपेक्षा कर रही थी। स्थिति को समझने के बाद, मैंने पाया कि वह गिरफ्तार होने और कैद किए जाने से डरती थी। डर में जीते हुए उसे हमेशा शक रहता था कि कोई उसका पीछा कर रहा है। उसे कई मौकों पर संगति मिली थी लेकिन उसे कोई समझ हासिल नहीं हुई थी और इसलिए सिंचन अगुआ चाहती थी कि मैं उसके साथ संगति करूँ। मैं जानती थी कि मुझे जल्द से जल्द वांग होंग को ढूँढ़कर उसके साथ संगति करनी है, लेकिन फिर मैंने सोचा, “वांग होंग और मैं अभी तक मिले नहीं हैं। अगर मैं आते ही उसकी समस्याएँ उजागर कर दूँगी, तो क्या वह यह नहीं सोचेगी कि मुझमें सहानुभूति का भाव नहीं है? अगर मैंने उसे नाराज कर दिया तो? मैं इस कलीसिया में नई हूँ। अगर मैं शुरू से ही लोगों का गहन-विश्लेषण करना और उजागर करना शुरू कर दूँ और सबको नाराज कर दूँ तो हर कोई मुझसे विमुख महसूस करेगा और मुझे अलग-थलग कर देगा। तब भविष्य में मेरे लिए अगुआई का कार्य करना मुश्किल हो जाएगा। बेहतर होगा कि मैं तब तक इंतजार करूँ जब तक कि मैं कलीसिया के कार्य के सभी पहलुओं से परिचित न हो जाऊँ।” इसलिए, मैं वांग होंग से बात करने नहीं गई, बल्कि सिंचन उपयाजक से उसके साथ संगति करने को कहा। लेकिन उससे संगति करके भी कोई नतीजा नहीं निकला। इस तरह वांग होंग की समस्या वैसी ही बनी रही और आखिर में उसने एक महीने से ज्यादा समय तक न तो किसी सभा में भाग लिया और न ही अपना कर्तव्य निभाया। दो महीने बाद, ऊपरी अगुआओं ने हमें यह पूछने के लिए पत्र लिखा कि हम अपने कर्तव्य कितनी अच्छी तरह से निभा रहे हैं और जब हमें भाई-बहनों के विचलन, समस्याएँ या भ्रष्ट अवस्थाएँ मिलती हैं, तो क्या हम उन्हें तुरंत सुझाव देते हैं और उनकी मदद करते हैं। पत्र में अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियों के बारे में परमेश्वर के वचनों का एक अंश उद्धृत किया गया था, जिसने मेरे दिल को छू लिया। मैंने सोचा कि जब मैं पहली बार इस कलीसिया में आई थी और भाई-बहनों ने मुझे झाओ जेन की समस्या के बारे में बताया था, तो मैंने झाओ जेन से उसकी समस्या के बारे में उससे बस हल्के में बात की थी और उसके घमंडी स्वभाव के सहारे काम करने की प्रकृति और परिणामों का गहराई से विश्लेषण नहीं किया था। नतीजतन, झाओ जेन को खुद की कोई समझ नहीं थी और उसका घमंडी स्वभाव बिल्कुल भी नहीं बदला था। इसके अलावा, वांग होंग लगातार डरपोकपन में जी रही थी और सभाओं में शामिल नहीं हो रही थी। वह अपने कर्तव्य नहीं निभा रही थी। इसके बावजूद, मैंने उसके साथ संगति या उसकी मदद नहीं की थी। कलीसिया में एक अगुआ के रूप में, अगर मैं किसी भाई या बहन की समस्या को देखकर भी उसे बताती नहीं, उसकी मदद नहीं करती, या अपनी जिम्मेदारियाँ पूरी नहीं करती, तो क्या इसका मतलब यह नहीं होगा कि मैं कोई वास्तविक काम नहीं कर रही थी? जब मैंने यह सोचा, तो मुझे अपराध बोध और बेचैनी महसूस हुई। बाद में, मैंने झाओ जेन को ढूँढ़ा और उसके घमंडी स्वभाव से काम करने की अभिव्यक्तियों, प्रकृति और परिणामों को उजागर किया और उनका गहराई से विश्लेषण किया। मेरी बात सुनने के बाद, उसे खुद की कुछ समझ हासिल हुई और वह खुद को बदलने को तैयार हो गई। बाद में, मैं सिंचन उपयाजक के साथ वांग होंग से मिलने गई। हमने परमेश्वर के वचनों को शामिल करते हुए संगति की और उसकी समस्याओं का गहराई से विश्लेषण किया और वह अपने स्वार्थी और घिनौने भ्रष्ट स्वभाव को समझ गई। बाद में, उसने फिर से अपना कर्तव्य निभाना शुरू कर दिया। संगति के बाद, जब मैंने देखा कि वे दोनों मेरी सोच के मुताबिक नाराज नहीं हुई थीं, बल्कि मैंने उनकी मदद की थी, तो मुझे उनके साथ पहले संगति न करने का पछतावा हुआ।

बाद में, मैंने खुद पर चिंतन किया : किस भ्रष्ट स्वभाव के कारण मैं अपने भाई-बहनों की समस्याओं को उजागर करने और उनका गहराई से विश्लेषण करने की हिम्मत नहीं कर पाई? मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, “परमेश्वर, जब मुझे अपने भाई-बहनों में समस्याएँ दिखती हैं, तो एक अगुआ के रूप में, मुझे सत्य पर संगति करनी चाहिए, समस्याएँ बतानी चाहिए और उनकी मदद करनी चाहिए। लेकिन मैं उन्हें नाराज करने से डरती थी, इसलिए उनकी समस्याओं पर संगति करने और उन्हें उजागर करने की हिम्मत नहीं कर पाती थी। मैं जानती हूँ कि यह तेरे इरादों के अनुसार नहीं था। मुझे प्रबुद्ध कर मेरा मार्गदर्शन करो ताकि मैं खुद को समझ सकूँ और सबक सीख सकूँ।” खोज में, मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े : “सांसारिक आचरण के फलसफों का एक सिद्धांत कहता है, ‘अच्छे दोस्तों की गलतियों पर खामोश रहने से दोस्ती अच्छी और लंबी होती है।’ इसका मतलब है कि इस अच्छी दोस्ती को कायम रखने के लिए अपने मित्र की समस्याओं के बारे में चुप रहना चाहिए, भले ही वे उन्हें स्पष्ट रूप से दिखाई दें। वे लोगों के चेहरे पर वार न करने या उनकी कमियों की आलोचना न करने के सिद्धांतों का पालन करते हैं। वे एक दूसरे को धोखा देते हैं, एक दूसरे से चीजें छिपाते हैं और एक दूसरे के खिलाफ साजिश रखते हैं। यूँ तो वे स्पष्ट रूप से जानते हैं कि दूसरा व्यक्ति किस तरह का है, पर वे इसे सीधे तौर पर नहीं कहते, बल्कि अपना संबंध बनाए रखने के लिए शातिर तरीके अपनाते हैं। ऐसे संबंध को कोई व्यक्ति क्यों बनाए रखना चाहेगा? यह इस समाज में, अपने समूह के भीतर दुश्मन न बनाना चाहने के लिए होता है, जिसका अर्थ होगा खुद को अक्सर खतरनाक स्थितियों में डालना। यह जानकर कि किसी की कमियाँ बताने या उसे चोट पहुँचाने के बाद वह तुम्हारा दुश्मन बन जाएगा और तुम्हें नुकसान पहुँचाएगा और खुद को ऐसी स्थिति में न डालने की इच्छा से तुम सांसारिक आचरण के ऐसे फलसफों का इस्तेमाल करते हो, ‘अगर तुम दूसरों पर वार करते हो तो उनके चेहरे पर वार मत करो; अगर तुम दूसरों की आलोचना करते हो तो उनकी कमियों की आलोचना मत करो।’ इसके आलोक में, अगर दो लोगों का संबंध ऐसा है तो क्या वे सच्चे दोस्त माने जा सकते हैं? (नहीं।) वे सच्चे दोस्त नहीं होते, एक-दूसरे के विश्वासपात्र तो बिल्कुल नहीं होते। तो, यह वास्तव में किस तरह का संबंध है? क्या यह एक मूलभूत सामाजिक संबंध नहीं है? (हाँ।) ऐसे सामाजिक संबंध में लोग खुले दिल से की गई चर्चाओं में शामिल नहीं हो सकते हैं, न ही गहरे संपर्क रख सकते हैं, न ही वे जो भी इच्छा हो उस बारे में बात कर सकते हैं। वे अपने दिल की बात या जो समस्याएँ वे दूसरे लोगों में देखते हैं या ऐसे शब्द जो दूसरे लोगों के लिए लाभदायक हों, नहीं बोल सकते। इसके बजाय, वे कहने के लिए अच्छी बातें चुनते हैं, दूसरों की चापलूसी करना चुनते हैं। वे सच बोलने या सिद्धांतों को कायम रखने की हिम्मत नहीं करते, इस प्रकार वे अपने प्रति शत्रुतापूर्ण सोच विकसित करने से दूसरों को रोकते हैं। जब कोई भी किसी व्यक्ति के लिए खतरा नहीं बनता है, तो क्या वह व्यक्ति अपेक्षाकृत आराम और शांति से नहीं रहता? क्या ‘अगर तुम दूसरों पर वार करते हो तो उनके चेहरे पर वार मत करो; अगर तुम दूसरों की आलोचना करते हो तो उनकी कमियों की आलोचना मत करो’ को प्रचारित करने में लोगों का यही लक्ष्य नहीं है? (है।) स्पष्ट रूप से यह जीवित रहने का एक कुटिल और धूर्त तरीका है जिसमें रक्षात्मकता का तत्त्व है, जिसका लक्ष्य आत्म-संरक्षण है। इस तरह जीते हुए लोगों का कोई विश्वासपात्र नहीं होता, कोई करीबी दोस्त नहीं होता, जिससे वे जो चाहें कह सकें। लोगों के बीच बस एक-दूसरे के प्रति रक्षात्मकता होती है, आपसी शोषण होता है और आपसी साजिशबाजी होती है और साथ ही हर व्यक्ति उस रिश्ते से जो चाहता है, वह लेता है। क्या ऐसा नहीं है? मूल रूप से ‘अगर तुम दूसरों पर वार करते हो तो उनके चेहरे पर वार मत करो; अगर तुम दूसरों की आलोचना करते हो तो उनकी कमियों की आलोचना मत करो’ का लक्ष्य दूसरों को ठेस पहुँचाने और दुश्मन बनाने से बचना है, किसी को चोट न पहुँचाकर अपनी रक्षा करना है। यह व्यक्ति द्वारा खुद को चोट पहुँचने से बचाने के लिए अपनाई जाने वाली युक्ति और तरीका है(वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण करने का क्या अर्थ है (8))। परमेश्वर के वचनों के प्रकाशन से मैंने महसूस किया कि अगर तुम “अगर तुम दूसरों पर वार करते हो तो उनके चेहरे पर वार मत करो; अगर तुम दूसरों की आलोचना करते हो तो उनकी कमियों की आलोचना मत करो” के सांसारिक आचरण के फलसफे से जीते हो, तो तुम खुद को और भी अधिक धोखेबाज और कपटी बना लोगे। तुम किसी और से अपने मन की सच्ची बात नहीं कह पाओगे, दूसरे व्यक्ति के लिए फायदेमंद होने पर भी बातें कहने की हिम्मत नहीं करोगे और उनकी कोई सच्ची सहायता नहीं कर पाओगे। अविश्वासी इसी तरह से सांसारिक व्यवहार करते हैं। इतने बरसों तक मैं शैतान के सांसारिक आचरण के फलसफे के अनुसार जीती रही। मैंने “अगर तुम दूसरों पर वार करते हो तो उनके चेहरे पर वार मत करो; अगर तुम दूसरों की आलोचना करते हो तो उनकी कमियों की आलोचना मत करो” को अपने जीने का तरीका मान लिया था। मेरा मानना था कि जब मुझे किसी दूसरे व्यक्ति की समस्याएँ या कमियाँ दिखाई दें, तो चतुराई से उसका जिक्र कर देना ही काफी है और मुझे उन्हें उजागर या उनका गहराई से विश्लेषण नहीं करना चाहिए वरना मैं उन्हें नाराज कर दूँगी, दुश्मन बना लूँगी और खुद को नुकसान पहुँचाऊँगी। जब मैंने अपने किसी पड़ोसी में कुछ गलत देखा, तो मैंने कभी कुछ नहीं कहा; मैं अपने पड़ोसियों को नाराज करने और नतीजतन अलग-थलग पड़ जाने से डरती थी। परमेश्वर में विश्वास करने के बाद, मैं इसी नजरिए से जीती रही। एक कलीसिया अगुआ के रूप में, जब मैं भाई-बहनों द्वारा प्रकट की गई कोई भ्रष्टता देखती हूँ, तो मुझे प्यार से उनकी मदद करनी चाहिए थी और उनकी समस्याएँ बतानी चाहिए थीं। यह वह जिम्मेदारी है जिसे मुझे पूरा करना चाहिए, लेकिन मैंने कोई वास्तविक कार्य बिल्कुल नहीं किया। जब भाई-बहनों ने झाओ जेन की समस्या बताई, मैं अच्छी तरह से जानती थी कि अगर मैंने उसके साथ संगति नहीं की और उसकी समस्या का गहराई से विश्लेषण नहीं किया, उसे खुद को समझने और चीजों को बदलने में मदद नहीं की, तो वह और भी भाई-बहनों को बाधित करेगी और कार्य पर असर डालेगी। लेकिन मुझे डर था कि मैं उसे नाराज कर दूँगी और भविष्य में उसके साथ रहना मुश्किल हो जाएगा, जिससे मेरे लिए अगुआई का कार्य करना मुश्किल हो जाएगा। इसलिए, मैंने बस हल्के से इसका जिक्र किया। नतीजतन, झाओ जेन को अपने घमंडी स्वभाव की कोई समझ नहीं थी और वह बिल्कुल भी नहीं बदली। यही हाल वांग होंग का था। मैंने साफ देखा कि वांग होंग कायरता और भय में जी रही थी और सभाओं में शामिल नहीं हो रही थी या अपना कर्तव्य नहीं निभा रही थी, जिससे काम में देरी हुई थी। लेकिन मैंने सोचा कि अगर मैंने पहली ही मुलाकात में उसकी समस्याओं को उजागर किया और उनका गहराई से विश्लेषण किया, तो वह कहेगी कि मुझमें सहानुभूति का भाव नहीं है। अगर मैंने उसे नाराज कर दिया तो मैं क्या करूँगी? इसलिए, मैं उसकी समस्याएँ उजागर करना या बताना नहीं चाहती थी और यहाँ तक कि इस मुद्दे को हल करने का जिम्मा सिंचन उपयाजक पर डालकर एक छोटी सी चाल भी चली। मैंने लोगों के साथ अपने रिश्ते बनाए रखने के लिए शैतानी फलसफों का इस्तेमाल किया और सभी के साथ मिलजुलकर रही, लेकिन असल में, मैंने भाई-बहनों को नुकसान पहुँचाया था और कार्य में देरी की थी। अगर मैं पहले सत्य का अभ्यास कर पाती और झाओ जेन और वांग होंग की समस्याओं को उजागर कर उनका गहराई से विश्लेषण कर पाती, तो वे खुद को जल्दी समझ पातीं और कलीसिया के कार्य और उनके जीवन प्रवेश को हुए नुकसान से बचा जा सकता था। मैंने देखा कि “अगर तुम दूसरों पर वार करते हो तो उनके चेहरे पर वार मत करो; अगर तुम दूसरों की आलोचना करते हो तो उनकी कमियों की आलोचना मत करो” कोई सकारात्मक बात नहीं है, बल्कि सांसारिक आचरण का एक धूर्त और धोखेबाज तरीका है। यह पूरी तरह से सत्य के विपरीत है। अगर मैं शैतान के फलसफों के अनुसार जीती रहती, तो मैं कई ऐसे कार्य करती जो दूसरों को और खुद को नुकसान पहुँचाते, कलीसिया के कार्य में विघ्न-बाधा डालती और परमेश्वर की घृणा और नफरत की पात्र बनती। और आखिर में, मुझे उजागर कर हटा दिया जाता।

बाद में, मैंने परमेश्वर के वचनों का एक और अंश पढ़ा और मैंने समझा कि दूसरों की कमियों की आलोचना करना क्या है और सही सुझाव देना और मदद करना क्या है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “‘अगर तुम दूसरों की आलोचना करते हो तो उनकी कमियों की आलोचना मत करो’ कहावत में ‘आलोचना करना’ वाक्यांश अच्छा है या बुरा? क्या ‘आलोचना करना’ वाक्यांश में लोगों के बेनकाब या उजागर किए जाने का वह अर्थ शामिल है जैसा कि परमेश्वर के वचनों में होता है? (नहीं।) मेरी समझ से ‘आलोचना करना’ वाक्यांश का, जिस रूप में यह इंसानी भाषा में मौजूद है, यह अर्थ नहीं है। इसमें कुछ हद तक उजागर करने के एक दुर्भावनापूर्ण रूप की प्रकृति है; इसका अर्थ है लोगों की समस्याओं और कमियों को उजागर करना या कुछ ऐसी चीजों और व्यवहारों को उजागर करना जो दूसरों के लिए अज्ञात हैं या पृष्ठभूमि में चल रहे कुछ षड्यंत्रों, विचारों या नजरियों को उजागर करना। ‘अगर तुम दूसरों की आलोचना करते हो तो उनकी कमियों की आलोचना मत करो’ कहावत में ‘आलोचना करना’ वाक्यांश का यही अर्थ है। अगर दो लोगों में अच्छी बनती है और वे विश्वासपात्र हैं, उनके बीच कोई बाधा नहीं है और उनमें से प्रत्येक को दूसरे के लिए फायदेमंद और मददगार होने की आशा है तो उनके लिए सबसे अच्छा यही होगा कि वे एक-साथ बैठें, खुलेपन और सच्चे मन से अपने सामने मौजूद समस्याओं के बारे में स्पष्टता से बोलें। यह उचित है और यह दूसरे की कमियों की आलोचना करना नहीं है। अगर तुम्हें किसी व्यक्ति में समस्याएँ दिखती हैं, लेकिन तुम देखते हो कि वह व्यक्ति अभी तुम्हारे द्वारा इसके बारे में बताने को स्वीकार करने में सक्षम नहीं है, तो झगड़े या संघर्ष से बचने के लिए उससे कुछ न कहो। अगर तुम उसकी मदद करना चाहते हो, तो तुम उसकी राय माँग सकते हो और पहले उससे पूछ सकते हो, ‘मुझे लगता है कि तुममें कुछ समस्या है और मैं तुम्हें थोड़ी सलाह देना चाहता हूँ। पता नहीं, तुम इसे स्वीकार कर पाओगे या नहीं। अगर स्वीकार कर पाओ, तो मैं तुम्हें बताऊँगा। अगर न स्वीकार पाओ तो मैं फिलहाल इसे अपने तक ही रखूँगा और कुछ नहीं बोलूँगा।’ अगर वह कहता है, ‘मुझे तुम पर भरोसा है। तुम जो भी कहोगे, वह उपयुक्त होगा; मैं उसे स्वीकार कर सकता हूँ,’ तो इसका मतलब है कि तुम्हें अनुमति दी गई है और तुम तब उसकी समस्याओं के बारे में उसके साथ संगति कर सकते हो। वह न केवल तुम्हारा कहा पूरी तरह से मानेगा, बल्कि इससे उसे फायदा भी होगा और तुम दोनों अभी भी एक सामान्य संबंध बनाए रख पाओगे। क्या यह एक-दूसरे के साथ ईमानदारी से व्यवहार करना नहीं है? (बिल्कुल है।) यह दूसरों के साथ मेलजोल करने का सही तरीका है; यह दूसरे की कमियों की आलोचना करना नहीं है(वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण करने का क्या अर्थ है (8))। परमेश्वर के वचनों से मैं समझ गई कि किसी व्यक्ति की कमियों की आलोचना करना एक दुर्भावनापूर्ण हमला है, जानबूझकर दूसरों की कमियों, निजी मामलों और यहाँ तक कि सबसे वर्जित चीजों को पकड़कर उन्हें उजागर करना; यह जानबूझकर दूसरों को शर्मिंदा करना है और उन्हें केवल नुकसान पहुँचाता है। दूसरी ओर, परमेश्वर के घर में, जब हम भाई-बहनों को भ्रष्ट स्वभाव प्रकट करते या सिद्धांतों के विपरीत कार्य करते हुए देखते हैं, तो हम परमेश्वर के वचनों के अनुसार उनकी समस्याओं को उजागर करते हैं, उनका गहराई से विश्लेषण करते हैं और उन्हें बताते हैं, ताकि उन्हें अपने भ्रष्ट स्वभाव को समझने में मदद मिले। यह उनके जीवन प्रवेश के लिए फायदेमंद है। इस तरह का विश्लेषण और प्रकाशन उन्हें उजागर करना नहीं, बल्कि प्यार से उनकी मदद करना है। झाओ जेन की समस्या से निपटने में, जब मैंने परमेश्वर के वचनों के प्रकाश में उसके घमंडी स्वभाव को उजागर किया और उसका गहराई से विश्लेषण किया, तो मैं उसे अपनी समस्याओं पर चिंतन करने और उन्हें जानने में मदद कर रही थी ताकि वह बदल सके, जीवन प्रवेश पा सके और भाई-बहनों के साथ सामंजस्यपूर्ण ढंग से सहयोग करके अपना कर्तव्य अच्छी तरह से निभा सके। यह उसके लिए एक फायदेमंद बात थी। इसके अलावा, जब मैंने वांग होंग के साथ संगति की और उसकी स्वार्थी और खुद को बचाने की समस्या का गहराई से विश्लेषण किया, तो इसका मकसद उसे अपने स्वार्थी और घिनौने प्रकृति सार की समझ हासिल करने में मदद करना था, ताकि वह पश्चात्ताप कर सके, बदल सके और अपना कर्तव्य निभा सके। यह वांग होंग की मदद करना भी था। इस तरह का प्रकाशन और गहन-विश्लेषण सत्य सिद्धांतों के अनुरूप है और एक सकारात्मक चीज है; यह लोगों की आलोचना करना नहीं है। उजागर करने और उचित मार्गदर्शन और मदद के बीच अंतर तय करने के लिए, मुख्य बात इरादे और शुरुआती बिंदु को देखना है। साथ ही, मैं हमेशा इस बात को लेकर चिंतित रहती थी कि दूसरों की समस्याओं को उजागर करने और उनका गहराई से विश्लेषण करने से वे नाराज हो जाएँगे और मुझे दुश्मन मानने लगेंगे, जिससे मेरा अगुआई का काम और मुश्किल हो जाएगा। इसलिए, मैंने हर मोड़ पर दूसरों के साथ अपने रिश्ते बनाए रखे। असल में, परमेश्वर का घर समाज से अलग है। परमेश्वर के घर में, सत्य का राज होता है। अपना कर्तव्य अच्छी तरह से निभाने के लिए, तुम्हें सत्य सिद्धांतों के अनुसार कार्य करना चाहिए और ऐसा नहीं है कि तुम केवल दूसरों के साथ अच्छे रिश्ते बनाए रखकर ही कार्य अच्छी तरह से कर सकते हो। मुझे एहसास हुआ कि मेरे विचार बहुत विकृत हैं और सत्य के बिल्कुल भी अनुरूप नहीं हैं।

मैंने खोजना जारी रखा : किस तरह के भ्रष्ट स्वभाव के कारण मैं दूसरों की समस्याओं को उजागर करने की हिम्मत नहीं कर पाई थी? मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े : “अंतरात्मा और विवेक दोनों ही व्यक्ति की मानवता के घटक होने चाहिए। ये दोनों सबसे बुनियादी और सबसे महत्वपूर्ण चीजें हैं। वह व्यक्ति कैसा होता है जिसके पास जमीर नहीं होता और सामान्य मानवता का विवेक नहीं होता? सामान्यतया, वह एक ऐसा व्यक्ति है जिसमें मानवता नहीं है और वास्तव में भयानक मानवता का व्यक्ति है। अधिक विशिष्ट रूप से, ऐसे लोगों में कौन-सी विशेषताएँ पाई जाती हैं? मानवता से रहित होने की उनकी कौन-सी विशिष्ट अभिव्यक्तियाँ हैं? (वे स्वार्थी और नीच हैं।) स्वार्थी और नीच लोग अपने क्रियाकलापों में लापरवाह होते हैं और अगर चीजें उन्हें व्यक्तिगत रूप से प्रभावित नहीं करतीं तो वे उन्हें चलने देते हैं। वे परमेश्वर के घर के हितों के बारे में नहीं सोचते हैं, न ही वे परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशीलता दिखाते हैं। जब अपने कर्तव्य निभाने या परमेश्वर की गवाही देने की बात आती है तो उनमें बोझ या जिम्मेदारी की कोई भावना नहीं होती है। ... क्या इस तरह के व्यक्ति में जमीर और विवेक होता है? (नहीं।) क्या जमीर और विवेक से रहित कोई व्यक्ति इस तरह से कार्य करने के लिए आत्म-धिक्कार महसूस करता है? वह आत्म-धिक्कार महसूस नहीं करता है; इस तरह के व्यक्ति का जमीर किसी काम का नहीं होता। ऐसे लोगों को कभी भी अपने जमीर से धिक्कार महसूस नहीं होता है, तो क्या वे पवित्र आत्मा के धिक्कार या अनुशासन को महसूस कर सकते हैं? नहीं, वे नहीं कर सकते(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, अपना हृदय परमेश्वर को देकर व्यक्ति सत्य प्राप्त कर सकता है)। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद, मेरे दिल में चुभन महसूस हुई; मैंने जो किया था उसके लिए मुझे अपराध बोध और असहजता महसूस हुई। जमीर और मानवता वाले लोग अपने कर्तव्यों में बोझ उठाते हैं और उनमें जिम्मेदारी की भावना होती है, वे हर मोड़ पर कलीसिया के हितों का ध्यान रखते हैं और उन लोगों को उजागर करते हैं और उनका गहराई से विश्लेषण करते हैं जो कलीसिया के कार्य में विघ्न-बाधा डालते हैं। इसके विपरीत, ऐसे लोग जिनमें मानवता नहीं होती, सबसे पहले लोगों को नाराज करने और दुश्मन बनाने के डर के बारे में सोचते हैं। वे केवल अपने हितों की रक्षा करते हैं और खुशामदी लोगों की तरह व्यवहार करते हैं, कलीसिया के हितों की बिल्कुल भी रक्षा नहीं करते। जब मैंने खुद पर चिंतन किया, तो मैंने देखा कि मैं ठीक वैसी ही स्वार्थी और घिनौनी इंसान थी जिसकी खराब मानवता को परमेश्वर ने उजागर किया था। मैं साफ तौर पर जानती थी कि भाई-बहन झाओ जेन से बाधित हो रहे हैं और इसका कलीसिया के कार्य और भाई-बहनों के जीवन प्रवेश पर पहले ही असर पड़ चुका था। साथ ही, वांग होंग ने अपनी सुरक्षा के खतरों को अपने कर्तव्य छोड़ने का बहाना बनाया। एक कलीसिया अगुआ के रूप में, मुझे जल्द से जल्द उनके साथ संगति करनी चाहिए थी और इन समस्याओं का गहराई से विश्लेषण करना चाहिए था, ताकि वे इस तरह से कार्य करते रहने के नुकसान और परिणामों को समझ सकें, समय पर अपनी गलत दशाओं को बदल सकें और अपना कर्तव्य अच्छी तरह से निभा सकें। लेकिन मुझे डर था कि अगर मैंने उन्हें नाराज कर दिया, तो वे मुझसे चिढ़ जाएँगे और मुझे अलग-थलग कर देंगे, इसलिए मैंने उनके साथ संगति नहीं की। हर मोड़ पर, मैंने अपने हितों की रक्षा की और केवल लोगों के साथ अच्छे रिश्ते बनाए रखने और उन पर अच्छी छाप छोड़ने के बारे में सोचा। मैंने कलीसिया के हितों पर बिल्कुल भी विचार नहीं किया, न ही मैंने इस पर विचार किया कि इससे भाई-बहनों के जीवन को तो कोई नुकसान नहीं होगा। मैं पूरी तरह से स्वार्थी और घिनौनी थी और मुझमें जरा भी न्याय की भावना नहीं थी! मैं अपना कर्तव्य बिल्कुल भी नहीं निभा रही थी। मैं बुराई कर रही थी और परमेश्वर का प्रतिरोध कर रही थी! अगर मैंने पश्चात्ताप नहीं किया और नहीं बदली, तो आखिर में मैं परमेश्वर की घृणा की पात्र बनूँगी और हटा दी जाऊँगी। जब मैं यह समझी, तो मुझे अपने किए पर पछतावा हुआ। मुझे लगा कि मैं परमेश्वर की कर्जदार हूँ और महसूस किया कि मैंने भाई-बहनों को निराश किया है। मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, “परमेश्वर, मैं पश्चात्ताप करने और मानवता और न्याय की भावना वाली इंसान बनने को तैयार हूँ। मैं भविष्य में तेरे इरादों के प्रति विचारशील रहना चाहती हूँ और कलीसिया के हितों की रक्षा करना चाहती हूँ।”

प्रार्थना और खोज के माध्यम से, मुझे परमेश्वर के वचनों में अभ्यास का एक मार्ग मिला। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “अगर तुम परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध स्थापित करना चाहते हो तो तुम्हारा हृदय उसकी तरफ मुड़ना चाहिए; फिर इसी बुनियाद पर तुम दूसरे लोगों के साथ भी सामान्य संबंध रखोगे। अगर परमेश्वर के साथ तुम्हारा सामान्य संबंध नहीं है तो चाहे तुम दूसरों के साथ संबंध बनाए रखने के लिए कुछ भी कर लो, चाहे तुम जितनी भी मेहनत कर लो या जितना भी प्रयास लगा दो, यह सब सांसारिक आचरण का इंसानी फलसफा होगा। तुम परमेश्वर के वचनों के अनुसार सामान्य पारस्परिक संबंध स्थापित करने के बजाय लोगों के बीच अपनी स्थिति कायम रख रहे होगे और इंसानी दृष्टिकोणों और इंसानी फलसफों के जरिये उनकी प्रशंसा प्राप्त कर रहे होगे। अगर तुम दूसरे लोगों के साथ अपने संबंधों पर ध्यान केंद्रित नहीं करते हो, बल्कि इसके बजाय परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध बनाए रखते हो और तुम परमेश्वर को अपना हृदय देने और उसके प्रति समर्पण करना सीखने के लिए तैयार हो, तो सभी लोगों के साथ तुम्हारे संबंध भी स्वाभाविक रूप से सामान्य हो जाएँगे। तब ये संबंध देह पर नहीं, बल्कि परमेश्वर के प्रेम की बुनियाद पर निर्मित होंगे। दूसरे लोगों के साथ तुम्हारा लगभग कोई दैहिक मिलना-जुलना नहीं होगा, बल्कि आध्यात्मिक स्तर पर संगति होगी और साथ ही आपसी प्रेम, सांत्वना और आपूर्ति होगी। यह सब परमेश्वर को संतुष्ट करने की इच्छा की बुनियाद पर किया जाता है—ये संबंध इंसानी सांसारिक आचरण के फलसफों के जरिये नहीं बनाए रखे जाते पर ये स्वाभाविक रूप से तब बनते हैं, जब तुम्हारे पास परमेश्वर के लिए बोझ की भावना होती है। उनके लिए तुम्हारी ओर से किसी इंसानी प्रयास की आवश्यकता नहीं होती और तुम्हें सिर्फ परमेश्वर के वचनों के सिद्धांतों के अनुसार अभ्यास करने की आवश्यकता होती है(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध स्थापित करना बहुत महत्वपूर्ण है)। परमेश्वर के वचनों से मैं समझ गई कि भाई-बहनों के साथ अपने रिश्तों में, हमें दूसरों के साथ सत्य सिद्धांतों के अनुसार पेश आना चाहिए। जब हम पाते हैं कि भाई या बहनों में किसी भी तरह का भ्रष्ट स्वभाव है, तो हमें प्यार से उनके साथ संगति करनी चाहिए और उनकी मदद करनी चाहिए, ताकि वे आत्मचिंतन कर खुद को समझ सकें और जीवन प्रवेश पा सकें। हमें दूसरों के साथ अपने रिश्ते बनाए रखने के लिए सांसारिक आचरण के फलसफों पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। कभी-कभी, जब दूसरे अपनी समस्याएँ नहीं देख पाते, तो हमें उन्हें उजागर करना और उनका गहराई से विश्लेषण करना पड़ता है। जब तक वे सत्य का अनुसरण करने वाले भाई-बहन हैं, वे इसके साथ सही ढंग से पेश आ सकेंगे और बाद में बदलाव कर सकेंगे। लेकिन, जो सत्य का अनुसरण नहीं करते, इस ओर उनका ध्यान दिलाए जाने और उजागर किए जाने पर वे बहस और प्रतिरोध करते हैं। इससे वे प्रकट हो जाते हैं और साथ ही, हमें उनका कुछ भेद पहचानने में मदद मिलती है। बाद में, मैंने देखा कि सिंचन उपयाजक अपने कर्तव्य में बोझ नहीं उठा रही है। वह कार्य को लागू करने में टालमटोल कर रही थी और यह कहकर बहाने भी बना रही थी कि उसकी काबिलियत खराब है और वह सत्य नहीं समझती। मैं उसकी समस्याएँ बताना चाहती थी ताकि वह अपने कर्तव्य में और ज्यादा बोझ उठाए, लेकिन फिर मैंने सोचा, “अगर मैं सीधे उसकी समस्याएँ उजागर कर दूँ और उसे नाराज कर दूँ, तो हम भविष्य में कैसे सहयोग करेंगे?” जब मैंने यह सोचा, तो मुझे थोड़ी झिझक महसूस हुई। बाद में, मैंने परमेश्वर के कुछ वचनों के बारे में सोचा जो मैंने पहले पढ़े थे और महसूस किया कि मैं फिर से शैतान के सांसारिक आचरण के फलसफों के सहारे दूसरों के साथ अपने रिश्ते बनाए रखने की कोशिश कर रही थी। लेकिन मैं अपने दिल में स्पष्ट रूप से जानती थी कि मैं चाहे कितनी भी अच्छी तरह से दूसरों के साथ अपने रिश्ते बनाए रखूँ, यह सत्य का अभ्यास करना नहीं है और परमेश्वर इसे स्वीकृति नहीं देता है। मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की कि वह मुझे देह के खिलाफ विद्रोह करने और सत्य का अभ्यास करने का संकल्प दे। बाद में, मैंने सिंचन उपयाजक को बताया कि वह अपने कर्तव्य में लापरवाह है और लापरवाह होने की प्रकृति और परिणामों के बारे में संगति की। मेरी संगति के बाद, वह अपनी समस्या समझ गई और अपनी देह के खिलाफ विद्रोह करने और सत्य का अभ्यास करने को तैयार हो गई। मैंने अनुभव किया कि जब तुम सत्य सिद्धांतों के अनुसार लोगों के साथ व्यवहार करते हो, तो तुम सहज महसूस करते हो। परमेश्वर का धन्यवाद!

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