37. क्या परमेश्वर के लिए त्याग करने और खुद को खपाने के बदले आशीषें मिलनी चाहिए?

निंग यू, चीन

2022 में मैं एक कलीसिया में बहन गुओ ली से मिली। बातों-बातों में, मुझे पता चला कि उसने दस साल पहले अपना कर्तव्य निभाने के लिए घर छोड़ दिया था और वह इतने सालों से अगुआ या कार्यकर्ता के रूप में सेवा कर रही थी। जब भी किसी कलीसिया को सिंचन और सहारे की ज़रूरत होती, तो वह हमेशा सक्रिय रूप से सहयोग करती थी और वह कठिनाई झेलने और कीमत चुकाने में भी सक्षम थी। लेकिन हाल के कुछ सालों में उसकी बाँह में एक घातक ट्यूमर हो गया था और तीन साल में उसकी चार सर्जरी हुई थीं। यह सुनकर मैं बहुत बेचैन हो गई। मैंने सोचा, “यह बहन सच में परमेश्वर में विश्वास करती है और वह अपने कर्तव्य में त्याग करने, खुद को खपाने, कठिनाई झेलने और कीमत चुकाने में सक्षम है। परमेश्वर ने उसकी देखभाल और रक्षा कैसे नहीं की, इसके बजाय उसे इतनी भयानक बीमारी कैसे होने दी? मैंने भी सालों से चीजों का त्याग किया है और खुद को खपाया है। जब मेरे पति ने मुझे सताया, तब भी मैंने अपना कर्तव्य नहीं छोड़ा। अब मैं लगभग 50 साल की हूँ और मेरी गर्दन और कंधे का दर्द बढ़ता जा रहा है। मुझे तो यह भी नहीं पता कि भविष्य में परमेश्वर मुझे सुरक्षित रखेगा या नहीं! क्या होगा अगर एक दिन मुझे भी उसी की तरह कोई गंभीर बीमारी हो जाए?” मैं आगे सोचने की हिम्मत नहीं कर सकी और न चाहते हुए भी थोड़ी हताश हो गई। उस दौरान, मैं लगातार गुओ ली की हालत को लेकर चिंतित रहती थी। जब मुझे पता चला कि वह अपने दर्द के बीच सत्य खोज रही थी, अपने भ्रष्ट स्वभाव पर चिंतन कर रही थी और उसे समझ रही थी, बिना शिकायत के परमेश्वर के प्रति समर्पण कर पा रही थी और फिर भी यथासंभव अपना कर्तव्य निभा रही थी, तो मैं उम्मीद करने लगी कि परमेश्वर उसकी सच्ची आस्था और उसके लिए खुद को खपाने के कारण उसकी रक्षा करेगा और उसकी बीमारी को ठीक कर देगा। उसके बाद जब भी हम मिलते, मैं सबसे पहले उसकी हालत के बारे में पूछती थी। एक बार, गुओ ली ने मुझे बताया कि उसके डॉक्टर ने कहा है कि अब चिंता की कोई गंभीर बात नहीं है। यह खबर सुनकर मैं बहुत खुश हुई और मैंने सोचा, “ऐसा लगता है कि जो लोग परमेश्वर के लिए ईमानदारी से खुद को खपाते हैं, परमेश्वर वास्तव में उनकी रक्षा करता है। हालाँकि इस चरण में परमेश्वर का कार्य अनुग्रह के युग में प्रभु यीशु के कार्य जैसा नहीं है, जहाँ उसने बीमारों को चंगा किया और दानवों को निकाला, परमेश्वर के न्याय, ताड़ना, परीक्षण और शोधन के कार्य के साथ उसकी आशीषें भी होती हैं। जब तक लोग अपनी बीमारी में सबक सीखते हैं, परमेश्वर के बारे में शिकायत नहीं करते और उसके लिए अपनी गवाही में अडिग रहते हैं, तब तक वह उन्हें सुरक्षित रखेगा। यह ठीक वैसा ही है जैसा अय्यूब के साथ हुआ जब वह परमेश्वर के परीक्षणों से गुजरा। उसने अपनी विशाल संपत्ति और अपने सभी बच्चों को खो दिया और उसका शरीर दर्दनाक फोड़ों से ढक गया, फिर भी उसने बिना शिकायत किए परमेश्वर के नाम की स्तुति की और परमेश्वर के लिए अपनी गवाही में अडिग रहा। अंत में उसकी बीमारी ठीक हो गई और परमेश्वर ने उसे पहले से भी ज्यादा धन का आशीष दिया। उसके बच्चे और भी सुंदर थे और उसकी उम्र दोगुनी हो गई। परमेश्वर कितना धार्मिक है!” इस तरह सोचने पर मेरी हताशा तुरंत गायब हो गई और मुझे अपने कर्तव्य में फिर से ऊर्जा महसूस हुई।

मुझे हैरानी हुई, जब कुछ महीनों बाद मैंने सुना कि गुओ ली का कैंसर वापस आ गया है और उसे अपनी बाँह कटवानी पड़ी। मेरा दिल बैठ गया। “ऐसा नतीजा कैसे हो सकता है? गुओ ली सच में परमेश्वर में विश्वास करती है, उसने सालों से त्याग किया है और खुद को खपाया है और जब वह गंभीर रूप से बीमार हो गई, तब भी उसने परमेश्वर के साथ विश्वासघात नहीं किया और अपनी क्षमता के अनुसार अपना कर्तव्य निभाती रही। परमेश्वर ने उसे पूरी तरह से ठीक क्यों नहीं किया? उसे अपनी बाँह क्यों कटवानी पड़ी?” मैं समझ नहीं पा रही थी। “वह अपनी गवाही में अडिग रही, तो परमेश्वर ने उसकी रक्षा क्यों नहीं की? लगता है कि चीजों का त्याग करने और खुद को खपाने से परमेश्वर की देखभाल और सुरक्षा की गारंटी नहीं मिलती! जो लोग सच में उस पर विश्वास करते हैं और चीजें त्यागते और खुद को खपाते हैं, परमेश्वर उन्हें कोई विशेष इनाम या आशीष भी नहीं देता। अगर परमेश्वर में विश्वास करना गुओ ली जैसे अंत की ओर ले जाता है, तो इसमें कोई फायदा नहीं है!” मैं उस समय ऐसा नतीजा स्वीकार नहीं कर सकी। परमेश्वर को लेकर मेरी धारणाएँ, गलतफहमियाँ और आलोचनाएँ, सब अनियंत्रित रूप से फूटने लगीं। मुझे यह भी नहीं पता था कि सभाओं में किस बारे में संगति करूँ। मेरा दिल खोखला, बर्फ की तरह ठंडा महसूस हुआ और दर्द अवर्णनीय था। मैं बेहद हताश हो गई। मैंने सोचा कि कैसे मैंने भी कई सालों तक अपना कर्तव्य निभाने के लिए अपना परिवार और नौकरी छोड़ दी थी। अब मेरे पति को कोई और औरत मिल गई थी और मेरे पास वापस जाने के लिए घर भी नहीं था। अगर एक दिन मैं गंभीर रूप से बीमार पड़ गई और परमेश्वर ने मुझे ठीक नहीं किया तो मैं क्या करूँगी? न चाहते हुए भी मैं अपने भविष्य और मेरा क्या होगा, इस बारे में चिंता और फिक्र करने लगी। उस दिन मैंने रात का खाना भी नहीं खाया और टीम सदस्यों द्वारा रिपोर्ट की गई समस्याओं को सुलझाने की मेरी कोई इच्छा नहीं थी। मैं उस रात बहुत जल्दी सो गई। उस दौरान, जब भी मैं गुओ ली की बीमारी के बारे में सोचती, मैं बहुत हताश हो जाती और अपने कर्तव्य के लिए सारी प्रेरणा खो देती। मैं नवागतों की मुश्किलों और समस्याओं पर समय पर ध्यान देने और उन्हें हल करने में नाकाम रही, जिसके कारण उनमें से अधिक लोग नियमित रूप से सभाओं में नहीं आ रहे थे। हालाँकि मेरा दिल धिक्कारता था, फिर भी मैं अपना कर्तव्य निभाने की हिम्मत नहीं जुटा पाती थी। जब मौसम थोड़ा ठंडा हो जाता और मुझे किसी दूर जगह जाना पड़ता, तो मैं जाना नहीं चाहती थी। मुझे बस यही लगा कि जब मेरे सारे त्याग और खुद को खपाने के बाद भी परमेश्वर की देखभाल और सुरक्षा निश्चित नहीं है, तब भी मैं इतनी कोशिश क्यों करूँ? मुझे तो अपना सब कुछ त्याग कर कर्तव्य निभाने के लिए बाहर आने पर भी पछतावा हुआ, मैं डरने लगी कि अगर मैं भी गुओ ली की तरह गंभीर बीमारी से ग्रस्त हो गई जिसे परमेश्वर ठीक नहीं करेगा, तो इतने सालों की मेहनत बेकार चली जाएगी। उस दौरान मेरा दिल अंधकार में डूबा हुआ था, और मुझे नहीं पता था कि प्रार्थना में क्या कहूँ। मैं सोचने लगी कि गुओ ली की बीमारी के दोबारा होने के बारे में जानने के बाद मैं इतनी हताश क्यों हो गई थी।

एक दिन अपनी भक्ति के दौरान मैंने परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा और अपनी अवस्था के बारे में कुछ समझ हासिल की। परमेश्वर कहता है : “कुछ लोग सोचते हैं कि परमेश्वर में विश्वास रखने से शांति और आनंद की प्राप्ति होनी चाहिए और अगर वे परिस्थितियों का सामना करते हैं, तो उन्हें सिर्फ परमेश्वर से प्रार्थना करने की जरूरत है और परमेश्वर उन पर ध्यान देगा, उन्हें अनुग्रह और आशीषें देगा और यह सुनिश्चित करेगा कि उनके लिए सब कुछ शांतिपूर्वक और सुचारू रूप से चले। परमेश्वर में विश्वास रखने का उनका उद्देश्य अनुग्रह माँगना, आशीषें प्राप्त करना और शांति और खुशी का आनंद लेना है। इन दृष्टिकोणों के कारण ही वे परमेश्वर के लिए खुद को खपाने के लिए अपने परिवारों का त्याग कर देते हैं या अपनी नौकरी छोड़ देते हैं और कष्ट सहन कर सकते हैं और कीमत चुका सकते हैं। नका मानना है कि जब तक वे चीजों का त्याग करेंगे, परमेश्वर के लिए खुद को खपाएँगे, कष्ट सहन करेंगे और लगन से कार्य करेंगे, असाधारण व्यवहार प्रदर्शित करेंगे, तब तक वे परमेश्वर के आशीष और विशेष कृपा प्राप्त करेंगे और कि चाहे वे कैसी भी मुश्किलों का सामना क्यों न करें, जब तक वे परमेश्वर से प्रार्थना करेंगे, वह उन्हें सुलझाएगा और हर चीज में उनके लिए एक मार्ग खोल देगा। परमेश्वर में विश्वास रखने वाले अधिकांश लोगों का यही नजरिया होता है। लोगों को लगता है कि यह नजरिया जायज और सही है। कई लोगों की वर्षों तक बिना अपनी आस्था छोड़े परमेश्वर में अपनी आस्था बनाए रखने की क्षमता सीधे इस नजरिए से संबंधित है। वे सोचते हैं, ‘मैंने परमेश्वर के लिए इतना कुछ खपाया है, मेरा व्यवहार इतना अच्छा रहा है और मैंने कोई बुरे कर्म नहीं किए हैं; परमेश्वर यकीनन मुझे आशीष देगा। चूँकि मैंने बहुत कष्ट सहे हैं और हर कार्य के लिए एक बड़ी कीमत चुकाई है, बिना कोई गलती किए परमेश्वर के वचनों और अपेक्षाओं के अनुसार सब कुछ किया है, इसलिए परमेश्वर को मुझे आशीष देना चाहिए; उसे यह सुनिश्चित करना चाहिए कि मेरे लिए सब कुछ सुचारू रूप से चले और यह कि मैं अक्सर अपने दिल में शांति और खुशी का अनुभव करूँ और परमेश्वर की मौजूदगी का आनंद लूँ।’ क्या यह एक मानवीय धारणा और कल्पना नहीं है? ... जब परमेश्वर जो करता है वह लोगों की धारणाओं के अनुरूप नहीं होता है, तो जल्द ही उनके दिलों में उसके बारे में शिकायतें और गलतफहमियाँ उत्पन्न होने लगती हैं। उन्हें यह भी लगता है कि उनके साथ अन्याय हुआ है और फिर वे परमेश्वर से बहस करना शुरू कर देते हैं और यहाँ तक कि वे उसकी आलोचना और निंदा भी कर सकते हैं। लोग चाहे जो भी धारणाएँ और गलतफहमियाँ बना लें, परमेश्वर के परिप्रेक्ष्य से वह कभी भी मानवीय धारणाओं या इच्छाओं के अनुसार न तो कार्य करता है और न ही किसी के साथ व्यवहार करता है। परमेश्वर हमेशा वही करता है जो उसकी इच्छा होती है, वह हमेशा अपने खुद के तरीके से और अपने स्वभाव सार के आधार पर कार्य करता है। परमेश्वर के पास हर व्यक्ति के साथ व्यवहार करने के सिद्धांत हैं; वह हर व्यक्ति के साथ जो भी करता है उसमें से कुछ भी मानवीय धारणाओं, कल्पनाओं या प्राथमिकताओं पर आधारित नहीं होता—परमेश्वर के कार्य का यही पहलू मानवीय धारणाओं से सबसे ज्यादा असंगत है। ... जब लोग अपनी धारणाओं से जकड़े रहते हैं, तो उनमें परमेश्वर के खिलाफ प्रतिरोध उत्पन्न होता है—यह स्वाभाविक रूप से होता है। प्रतिरोध की जड़ें कहाँ होती हैं? यह इस तथ्य में निहित है कि आम तौर पर लोगों के दिलों में जो कुछ होता है, वह निस्संदेह उनकी धारणाएँ और कल्पनाएँ होती हैं, सत्य नहीं होता है। इसलिए जब लोग देखते हैं कि परमेश्वर का कार्य मानवीय धारणाओं के अनुरूप नहीं है, तो वे परमेश्वर के विरुद्ध जा सकते हैं और उसके खिलाफ राय बना सकते हैं। इससे साबित होता है कि मूल रूप से लोगों में परमेश्वर के प्रति समर्पण करने वाला दिल नहीं होता है, उनका भ्रष्ट स्वभाव स्वच्छ किए जाने से दूर है और वे वास्तव में अपने भ्रष्ट स्वभाव के अनुसार जीवन जीते हैं। वे अब भी उद्धार प्राप्त करने से बहुत ही ज्यादा दूर हैं(वचन, खंड 5, अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ, अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ (16))। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद ही मुझे पता चला कि गुओ ली के कैंसर के वापस आने और उसकी बाँह कट जाने की खबर पर मेरी प्रतिक्रिया इतनी तीव्र क्यों थी, क्योंकि परमेश्वर में मेरा विश्वास हमेशा मेरी अपनी धारणाओं और कल्पनाओं पर आधारित था। मेरा मानना था कि जब तक कोई व्यक्ति ईमानदारी से परमेश्वर में विश्वास करता है और अपने कर्तव्य में चीजें त्यागने, खुद को खपाने, कष्ट सहने और कीमत चुकाने में सक्षम है, तो परमेश्वर उसे अनुग्रह और आशीषें प्रदान करेगा और उसे बीमारी और आपदा से मुक्त, सुरक्षित और स्वस्थ रखेगा। भले ही उन पर कोई विपत्ति आ जाए, जब तक वे ईमानदारी से प्रार्थना करते हैं और परमेश्वर पर भरोसा करते हैं और अपने कर्तव्य में लगे रहते हैं, तो वह उन्हें सुरक्षित रखेगा। यह देखकर कि गुओ ली ने सालों तक चीजों का त्याग किया, खुद को खपाया, कठिनाइयाँ सहीं और बड़ी कीमत चुकाई और खासकर यह कि वह बीमारी के बीच भी परमेश्वर से प्रार्थना कर सकती थी, सबक सीख सकती थी और अपने कर्तव्य में लगी रह सकती थी, मुझे लगा कि परमेश्वर को उसे आशीष देनी चाहिए थी और उसकी रक्षा करनी चाहिए थी। मैंने कभी उम्मीद नहीं की थी कि उसकी बीमारी वापस आ जाएगी और उसे अपनी बाँह कटवानी पड़ेगी। इससे मेरी धारणाओं को भारी झटका लगा और परमेश्वर में विश्वास करके आशीषें पाने की मेरी उम्मीद टूट गई। मैंने तुरंत सोचा कि अगर मैं एक दिन गुओ ली की तरह गंभीर रूप से बीमार पड़ जाऊँ और मेरी प्रार्थनाओं के बावजूद परमेश्वर मुझे ठीक न करे, तो परमेश्वर में विश्वास करने का कोई मतलब नहीं रह जाएगा। मैंने परमेश्वर के प्रति धारणाएँ और प्रतिरोध विकसित कर लिया, अपने दिल में उन्हें अधार्मिक ठहराने लगी। मैं इतनी नकारात्मक हो गई कि मैंने अपना कर्तव्य निभाने की सारी इच्छा खो दी, अपने भविष्य के बारे में चिंता करने लगी और यहाँ तक कि शुरू में अपना सब कुछ त्याग कर कर्तव्य निभाने पर भी पछताने लगी। परमेश्वर द्वारा मुझे प्रकट किए जाने पर ही मैंने देखा कि उनमें मेरा विश्वास बस उनके साथ सौदा करने की कोशिश थी। मैं अपने त्याग और खुद को खपाने का इस्तेमाल उसके अनुग्रह और आशीष माँगने के लिए करना चाहती थी; मैं एक सृजित प्राणी का कर्तव्य बिल्कुल भी नहीं निभा रही थी। यह बिल्कुल पौलुस की तरह था, जो मानता था, “मैं अच्छी कुश्ती लड़ चुका हूँ, मैं ने अपनी दौड़ पूरी कर ली है, मैं ने विश्वास की रखवाली की है। भविष्य में मेरे लिये धर्म का वह मुकुट रखा हुआ है” (2 तीमुथियुस 4:7-8)। उसने अपनी भाग-दौड़ और खुद को खपाने का इस्तेमाल परमेश्वर से धार्मिकता का मुकुट माँगने के लिए एक सौदेबाजी के तौर पर किया, वह उसके साथ सौदा करने की कोशिश ऐसे कर रहा था, मानो वह इसका हकदार हो और आशीषें और लाभ पाने के अपने घिनौने लक्ष्य को हासिल करने के लिए उनका इस्तेमाल करने की कोशिश कर रहा था। परमेश्वर ने कभी नहीं कहा कि लोग सिर्फ भाग-दौड़ करने और खुद को खपाने से स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर सकते हैं। पौलुस ने अपने ख्याली सोच के आधार पर अपनी धारणाओं और कल्पनाओं को अनुसरण किए जाने वाले सत्य के रूप में मान लिया। वह परमेश्वर में बिल्कुल भी विश्वास नहीं करता था, बल्कि खुद में करता था। जिस मार्ग पर वह चला, वह परमेश्वर के प्रतिरोध करने का मार्ग था और अंत में उसे परमेश्वर के दंड का सामना करना पड़ा। मैंने अपने त्याग, कष्ट और चुकाई गई कीमत को ऐसा सिक्का समझा जिससे परमेश्वर की आशीषों की सौदेबाजी कर सकूँ। मैं परमेश्वर को सृष्टिकर्ता मानते हुए व्यवहार नहीं कर रही थी; मैं लगातार उसे धोखा दे रही थी और उसका इस्तेमाल कर रही थी। यह परमेश्वर के स्वभाव को नाराज करना है और अगर मैंने पश्चात्ताप नहीं किया तो अंत में मुझे भी निकाल दिया जाएगा। तभी मुझे एहसास हुआ कि सत्य का अनुसरण किए बिना परमेश्वर में विश्वास करना और आँख मूँदकर आशीषें और अनुग्रह माँगना बहुत खतरनाक है। एक दिन एक बड़ा परीक्षण आ सकता है और मैं परमेश्वर के साथ विश्वासघात कर सकती हूँ और मुझे बेनकाब किया और निकाला जा सकता है।

बाद में मैंने और चिंतन किया। मैं इतने सालों से परमेश्वर में विश्वास करती थी और धर्म-सिद्धांत के तौर पर जानती थी कि मुझे परमेश्वर के साथ सौदा नहीं करना चाहिए, लेकिन आशीषें पाने की मेरी इच्छा अभी भी इतनी गहरी क्यों थी? अपनी भक्ति के दौरान मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े : “मसीह-विरोधियों की नजर में और उनके विचारों और दृष्टिकोणों में परमेश्वर का अनुसरण करने के पीछे कुछ न कुछ फायदे होने चाहिए; वे फायदों के बिना नहीं हिलने वाले। अगर वे प्रसिद्धि, लाभ या रुतबे का आनंद नहीं ले सकते, अगर वे जो भी कार्य करते हैं या कर्तव्य निभाते हैं उसमें लोगों की प्रशंसा नहीं मिलती तो वे परमेश्वर में विश्वास करने और अपने कर्तव्य निभाने में कोई तुक नहीं समझते। ... अपने विश्वास में मसीह-विरोधी सिर्फ आशीष पाना चाहते हैं और दुःख नहीं भोगना चाहते। जब वे यह देखते हैं कि किसी व्यक्ति को आशीष मिला है, उसे लाभ मिला है, अनुग्रह मिला है और उसे अधिक भौतिक सुख और बड़े लाभ मिले हैं, तो उन्हें लगता है कि यह परमेश्वर ने किया है; और अगर वे स्वयं ऐसे भौतिक आशीष नहीं पाते, तो फिर यह परमेश्वर का कार्य नहीं है। इसका तात्पर्य है, ‘अगर तुम सचमुच परमेश्वर हो तो फिर तुम लोगों को सिर्फ आशीष दे सकते हो; तुम्हें लोगों का दुःख टालना चाहिए और उन्हें पीड़ा नहीं होने देनी चाहिए। केवल तभी लोगों के लिए तुममें विश्वास करने का मूल्य और अर्थ है। अगर तुममें विश्वास करने के बाद भी लोग विपत्तियों से घिरे हैं और अभी भी पीड़ा में हैं, तो फिर तुममें विश्वास करने का क्या औचित्य है?’ वे यह स्वीकार नहीं करते कि सभी चीजें और घटनाएँ परमेश्वर के हाथ में हैं, कि परमेश्वर समस्त चीजों का संप्रभु है। और वे ऐसा क्यों नहीं स्वीकारते? क्योंकि मसीह-विरोधी विपत्तियाँ झेलने से घबराते हैं। वे सिर्फ लाभ उठाना चाहते हैं, फायदे में रहना चाहते हैं, आशीषों का आनंद लेना चाहते हैं; वे परमेश्वर की संप्रभुता या आयोजन को स्वीकार नहीं करना चाहते, बल्कि परमेश्वर से सिर्फ लाभ पाना चाहते हैं। मसीह-विरोधियों का यही स्वार्थी और घृणित दृष्टिकोण होता है(वचन, खंड 4, मसीह-विरोधियों को उजागर करना, मद दस : वे सत्य का तिरस्कार करते हैं, सिद्धांतों की खुलेआम धज्जियाँ उड़ाते हैं और परमेश्वर के घर की व्यवस्थाओं की उपेक्षा करते हैं (भाग छह))। “सभी भ्रष्ट मनुष्य अपने लिए जीते हैं। हर व्यक्ति अपनी सोचे बाकियों को शैतान ले जाए—यह मानव प्रकृति का सार है। सभी लोग अपनी खातिर परमेश्वर में विश्वास करते हैं; वे आशीष पाने के लिए चीजों को त्यागते हैं और खुद को खपाते हैं, जो कष्ट वे सहते हैं और जो कीमत वे अपना कर्तव्य करने में चुकाते हैं, वह भी पुरस्कृत होने के लिए होता है। संक्षेप में, यह सब आशीष पाने, पुरस्कृत होने और स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने के उद्देश्य से है। दुनिया में, लोग अपने लाभ के लिए काम करते हैं और परमेश्वर के घर में, वे आशीषें प्राप्त करने के लिए कर्तव्य करते हैं। आशीषें प्राप्त करने के लिए, लोग सब कुछ त्याग देते हैं और बहुत कष्ट सह सकते हैं। यह सब इस बात का सबसे स्पष्ट प्रमाण है कि लोगों में एक शैतानी प्रकृति होती है(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन)। परमेश्वर उजागर करता है कि मसीह-विरोधी केवल उससे आशीषें और लाभ पाने और विपत्ति से बचने के लिए उसमें विश्वास करते हैं। अगर वे आशीषें नहीं पा सकते, तो उन्हें लगता है कि परमेश्वर में विश्वास करना निरर्थक है और वे उसे त्याग देंगे। यह पूरी तरह से मसीह-विरोधियों की स्वार्थी और घिनौनी प्रकृति से निर्धारित होता है। खुद पर चिंतन करते हुए, मैंने देखा कि मैं भी “हर व्यक्ति अपनी सोचे बाकियों को शैतान ले जाए” और “बिना पुरस्कार के कभी कोई काम मत करो” जैसे शैतानी विष के सहारे जी रही थी। मैं जो कुछ भी करती थी, वह स्वार्थ से प्रेरित था और उससे मुझे लाभ होना ही चाहिए था। परमेश्वर में विश्वास करने से पहले, मैं हमेशा कमजोर और बीमार रहती थी। लेकिन जब मैंने विश्वास करना और अपना कर्तव्य निभाना शुरू किया, तो मेरी सारी बीमारियाँ ठीक हो गईं। परमेश्वर से इतनी बड़ी कृपा पाकर, मैंने ईमानदारी से विश्वास करने का संकल्प लिया, यह सोचते हुए कि जब तक मैं ऐसा करती हूँ और परमेश्वर के लिए त्याग करती और खुद को खपाती हूँ, तो मुझे उसकी और भी ज़्यादा आशीषें और सुरक्षा मिलेगी। इसीलिए मैंने सक्रिय रूप से अपना कर्तव्य निभाया, चाहे मेरे पति ने मुझे कितना भी सताया या रोकने की कोशिश की, और इसीलिए मैं कोई भी कष्ट सहने को तैयार थी। लेकिन जब मैंने देखा कि इतने सालों तक अपना कर्तव्य निभाने के बाद गुओ ली को इतनी गंभीर बीमारी हो गई है, तो मुझे अचानक लगा कि त्याग करने और खुद को खपाने से ज़रूरी नहीं कि परमेश्वर की आशीषें और सुरक्षा मिले, तो फिर मेरा कर्तव्य निभाने का क्या मतलब था? इस प्रकार, मैं नकारात्मकता में जीती और परमेश्वर का विरोध करती रही, अपना कर्तव्य निभाने की सारी इच्छा खो दी, यहाँ तक कि कर्तव्य करने के लिए घर छोड़ने पर भी पछतावा हुआ। मैंने देखा कि मेरी प्रकृति कितनी स्वार्थी और धोखेबाज थी; मैं बस एक ऐसी इंसान थी जो स्वार्थ को पहले रखती है! यह परमेश्वर का अनुग्रह था कि मैं उनके घर आकर एक कर्तव्य निभा सकी। परमेश्वर चाहते थे कि मैं अपने स्वभाव में बदलाव लाने के लिए सत्य का अनुसरण करूँ, पूरी तरह से शैतान के बंधन से मुक्त हो जाऊँ, और सामान्य मानवता को जीऊँ। लेकिन मैंने सत्य का ज़रा भी अनुसरण नहीं किया; मैंने केवल आशीषें और लाभ पाने के बारे में सोचा। जब मुझे परमेश्वर की सुरक्षा और अनुग्रह मिला, तो मैं त्याग करने, खुद को खपाने और यहाँ तक कि कष्ट सहने को भी तैयार थी। लेकिन जैसे ही परमेश्वर का काम मेरी धारणाओं के अनुरूप नहीं हुआ और आशीष पाने की मेरी इच्छा चकनाचूर हो गई, मेरे कर्तव्य के प्रति मेरा रवैया तुरंत बदल गया। मैं नकारात्मक, प्रतिरोधी और लापरवाह हो गई और मुझे अपना कर्तव्य निभाने पर भी पछतावा हुआ। मैं पूरी तरह से एक अलग इंसान बन गई। मैंने देखा कि शैतानी नियमों से जीने की वजह से मैं अत्यधिक स्वार्थी, घिनौनी और मानवता से रहित हो गई थी। मेरा विश्वास एक धोखा था, परमेश्वर का इस्तेमाल करने का एक प्रयास था, और मैं उनका प्रतिरोध करने के मार्ग पर चल रही थी। अगर मैं वापस नहीं मुड़ी, तो मेरा निकाला जाना तय है। मुझे परमेश्वर के वचन याद आए : “उसने आशीषें प्राप्त करने को अनुसरण के लिए एक वैध लक्ष्य माना। यह गलत कैसे है? यह पूरी तरह से सत्य के विपरीत है और लोगों को बचाने के परमेश्वर के इरादे के अनुरूप नहीं है(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, सत्य का अभ्यास जीवन प्रवेश प्राप्त करने का एकमात्र मार्ग है)। परमेश्वर लोगों को उनके भ्रष्ट स्वभाव को शुद्ध करने और अंततः उन्हें अपने राज्य में लाने के लिए बचाता है। मैं, हालाँकि, केवल तत्काल अनुग्रह और आशीषों पर ध्यान केंद्रित कर रही थी और सत्य का अनुसरण नहीं कर रही थी। क्या यह परमेश्वर की अपेक्षाओं से भटकना नहीं था? अंत में, मुझे निश्चित रूप से कुछ भी हासिल नहीं होगा।

बाद में, मैंने परमेश्वर के वचनों के दो और अंश पढ़े और परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव के बारे में कुछ समझ हासिल की। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “धार्मिकता किसी भी तरह से निष्पक्षता या तर्कसंगतता नहीं है; यह समतावाद नहीं है, या तुम्‍हारे काम के लिए वह देना नहीं है जिसके तुम लायक हो, या तुमने जो भी काम किया हो उसके बदले भुगतान करने, या तुम्‍हारे किए प्रयास के अनुसार तुम्‍हारा देय चुकाने का मामला नहीं है। यह धार्मिकता नहीं है, यह केवल निष्पक्ष और तर्कसंगत होना है। बहुत कम लोग परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव को जान पाते हैं। मान लो कि अय्यूब द्वारा उसके लिए गवाही देने के बाद परमेश्वर अय्यूब का विनाश कर देता : क्या यह धार्मिक होता? वास्तव में, यह धार्मिक होता। इसे धार्मिकता क्‍यों कहा जाता है? लोग धार्मिकता को कैसे देखते हैं? अगर कोई चीज लोगों की धारणाओं के अनुरूप होती है, तब उनके लिए यह कहना बहुत आसान हो जाता है कि परमेश्वर धार्मिक है; परंतु, अगर वे किसी चीज को अपनी धारणाओं के अनुरूप नहीं पाते—अगर यह कुछ ऐसा है जिसे वे समझ नहीं पाते—तो उनके लिए यह कहना मुश्किल होगा कि परमेश्वर धार्मिक है। अगर परमेश्वर ने पहले तभी अय्यूब को नष्‍ट कर दिया होता, तो लोग यह नहीं कहते कि वह धार्मिक है। वास्तव में, चाहे लोग भ्रष्‍ट कर दिए गए हों या नहीं, चाहे वे बुरी तरह से भ्रष्‍ट कर दिए गए हों या नहीं, उन्हें नष्ट करते समय क्या परमेश्वर को इसका औचित्य सिद्ध करना पड़ता है? क्‍या उसे लोगों को समझाना चाहिए कि वह ऐसा किस आधार पर करता है? क्या परमेश्वर को लोगों को बताना चाहिए कि उसने कौन-सी व्यवस्थाएँ नियत की हैं? इसकी आवश्यकता नहीं है। परमेश्वर की नजरों में, जो व्यक्ति भ्रष्‍ट है, और जो परमेश्वर का प्रतिरोध कर सकता है वह बेकार है; परमेश्वर चाहे जैसे भी उससे निपटे, वह उचित ही होगा, और यह सब परमेश्वर की व्यवस्थाओं के अनुसार है। अगर तुम परमेश्वर की नजरों में अप्रिय होते और वह कहता कि तुम्हारी गवाही के बाद तुम उसके किसी काम के नहीं हो और इसलिए तुम्हें नष्ट कर देता, तो क्या यह उसकी धार्मिकता होती? यह भी होती। ... वह सब जो परमेश्वर करता है धार्मिक है। भले ही लोग यह समझ न पाएँ, तब भी उन्हें मनमाने ढंग से आलोचना नहीं करनी चाहिए। अगर मनुष्यों को उसका कोई कृत्‍य अतर्कसंगत प्रतीत होता है, या उसके बारे में उनकी कोई धारणाएँ हैं, और फिर वे कहते हैं कि वह धार्मिक नहीं है, तो वे सर्वाधिक विवेकहीन साबित हो रहे हैं(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन)। “परमेश्वर कुछ भी गलत नहीं करता और तुम्हें उसकी धार्मिकता की प्रशंसा करनी चाहिए। परमेश्वर चाहे जो कुछ करे, यह हमेशा सही होता है, और भले ही तुम यह मानकर परमेश्वर के कार्यों के बारे में धारणाएँ पाल लो कि उसका कार्य मानवीय भावनाओं के प्रति विचारशील नहीं होता है, कि यह तुम्हें पसंद नहीं है, फिर भी तुम्हें परमेश्वर की प्रशंसा करनी चाहिए। तुम्हें ऐसा क्यों करना चाहिए? तुम लोग इसका कारण नहीं जानते, है न? इसे समझाना वास्तव में बहुत आसान है : इसका कारण यह है कि परमेश्वर परमेश्वर है और तुम मनुष्य हो; वह सृष्टिकर्ता है, तुम एक सृजित प्राणी हो। तुम यह माँग करने के योग्य नहीं हो कि परमेश्वर एक निश्चित ढंग से कार्य करे या वह तुम्हारे साथ एक निश्चित ढंग से व्यवहार करे, जबकि परमेश्वर तुमसे माँग करने के योग्य है। आशीष, अनुग्रह, पुरस्कार, मुकुट—ये सभी चीजें कैसे और किसे दी जाती हैं, यह परमेश्वर पर निर्भर करता है। ... परमेश्वर की पहचान, स्थिति और सार को कभी भी मनुष्य की पहचान, स्थिति और सार के बराबर नहीं माना जा सकता, न ही इन चीजों में कभी कोई बदलाव होगा—परमेश्वर हमेशा परमेश्वर रहेगा और मनुष्य हमेशा मनुष्य रहेगा। यदि कोई व्यक्ति इसे समझने में सक्षम है तो फिर उसे क्या करना चाहिए? उसे परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करना चाहिए—यह चीजों को करने का सबसे तर्कसंगत तरीका है, और इसके अलावा कोई अन्य रास्ता नहीं है जिसे चुना जा सकता हो। यदि तुम समर्पण नहीं करते तो तुम विद्रोही हो और यदि तुम अवज्ञाकारी हो और बहस करते हो, तो तुम घोर विद्रोही बन रहे हो और तुम्हें नष्ट कर दिया जाना चाहिए। परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण कर पाना दर्शाता है कि तुम्हारे पास सूझ-बूझ है; यही रवैया लोगों के पास होना चाहिए और केवल यही रवैया सृजित प्राणियों के पास होना चाहिए(वचन, खंड 4, मसीह-विरोधियों को उजागर करना, मद बारह : जब उनके पास कोई रुतबा नहीं होता या आशीष पाने की आशा नहीं होती तो वे पीछे हटना चाहते हैं)। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद, लगा जैसे वे मेरे दिल को भेद रहे हों, और मैंने देखा कि मुझे परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव की बिल्कुल भी समझ नहीं थी। मेरी धारणाओं में, परमेश्वर की धार्मिकता का अर्थ निष्पक्ष और उचित होना था; कि यदि आप प्रयास करते हैं तो आपको उसका फल मिलेगा। मेरा मानना था कि परमेश्वर को उन लोगों को अनुग्रह और आशीष देने चाहिए जो उसके लिए कष्ट सहते और खुद को खपाते हैं, और खासकर जब वे परीक्षणों के दौरान अपनी गवाही में अडिग रहते हैं, तो उसे उन्हें और भी अधिक आशीष और सुरक्षा देनी चाहिए, और उनकी बीमारियों को ठीक करना चाहिए। उदाहरण के लिए, चूँकि गुओ ली ने कई सालों तक अपना कर्तव्य निभाने के लिए अपना परिवार और नौकरी छोड़ दी थी और अब उसे एक गंभीर बीमारी थी, मैंने सोचा कि परमेश्वर को यह ध्यान में रखते हुए कि उसने उनके लिए इतने सालों तक त्याग किया और खुद को खपाया, उसकी रक्षा करनी चाहिए और उसकी बीमारी को ठीक करना चाहिए। लेकिन अंत में, वह न केवल ठीक नहीं हुई, बल्कि उसे अपनी बाँह भी कटवानी पड़ी। तो मैंने शिकायत की कि परमेश्वर अविचारशील थे और उन्हें अधार्मिक ठहराया। परमेश्वर की धार्मिकता को मापने का मेरा मानक यह था कि अगर कोई प्रयास करता है, तो उसे उसका फल मिलना ही चाहिए, और वे जितना भी प्रयास करते या खुद को खपाते, परमेश्वर को उसी मूल्य का प्रतिफल उन्हें देना ही था। यह दृष्टिकोण कितना विकृत है! परमेश्वर सृष्टिकर्ता हैं और मैं एक सृजित प्राणी हूँ। मैं जिस भी चीज का आनंद लेती हूँ, साथ ही मेरा अपना जीवन भी, परमेश्वर द्वारा दिया गया है। मेरे लिए परमेश्वर का अनुसरण करना और अपना कर्तव्य निभाना बिल्कुल स्वाभाविक और उचित है। जहाँ तक बात है कि परमेश्वर मुझे अनुग्रह और आशीषें देते हैं या नहीं, यह उनका अपना मामला है। मुझे परमेश्वर से माँग करने का कोई अधिकार नहीं है; मुझे एक समर्पित दिल के साथ, बिना शर्त उनकी संप्रभुता और आयोजनों को स्वीकार करना चाहिए। इसके अलावा, परमेश्वर लोगों में जो कुछ भी करते हैं, उसका अर्थ होता है और उसमें उनकी बुद्धि होती है। मुझे चीज़ों को बाहरी दिखावे के आधार पर नहीं देखना चाहिए, और परमेश्वर जो कुछ भी करते हैं, उस पर अपनी धारणाओं और कल्पनाओं के आधार पर तो मुझे बिल्कुल भी राय नहीं बनानी चाहिए। यह अय्यूब की तरह ही है। वह परमेश्वर का भय मानता था और बुराई से दूर रहता था, फिर भी उसे अपनी संपत्ति के नुकसान और अपने बच्चों की मृत्यु का सामना करना पड़ा, और उसका अपना शरीर दर्दनाक फोड़ों से ढक गया था। मनुष्य की नज़रों में, वह दुर्भाग्य भोग रहा था, लेकिन परमेश्वर ने इस परीक्षण का इस्तेमाल उसमें अपने प्रति उसकी सच्ची आस्था को पूर्ण बनाने के लिए किया। अय्यूब परमेश्वर की नज़रों में एक पूर्ण व्यक्ति बन गया, और शैतान को अब उस पर आरोप लगाने या उसे लुभाने का कोई अधिकार नहीं रहा। गुओ ली पर जो बीमारी आई, उसमें भी परमेश्वर के नेक इरादे हैं। हालाँकि वह बीमार पड़ गई और उसके शरीर ने कष्ट सहा, अगर वह सत्य खोज सकी और अपने सबक सीख सकी, और परमेश्वर में सच्ची आस्था और उनके प्रति समर्पण हासिल कर सकी, तो यह कष्ट सहना सार्थक होगा। मैं अब अपनी धारणाओं और कल्पनाओं के आधार पर चीज़ों को नहीं देख सकती थी। परमेश्वर हमेशा धार्मिक हैं, और चाहे वह कुछ भी करें, उसमें उनके नेक इरादे और बुद्धि होती है। यह समझने पर, मेरा दिल काफी रोशन हो गया।

अपनी भक्ति के दौरान, मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े और यह समझने लगी कि परमेश्वर में विश्वास करने के लिए व्यक्ति का सही दृष्टिकोण क्या होना चाहिए। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “परमेश्वर के कार्य का अनुभव करना अनुग्रह का आनंद लेना नहीं है; बल्कि उससे अधिक इसका मतलब परमेश्वर के प्रति प्रेम के लिए कष्ट सहना है। चूँकि तुम परमेश्वर के अनुग्रह का आनंद लेते हो, इसलिए तुम्हें उसकी ताड़ना का भी आनंद लेना चाहिए; तुम्हें इस सबका अनुभव करना चाहिए। अगर तुम परमेश्वर द्वारा प्रबुद्ध किए जाने का अनुभव कर सकते हो और तुम उसके द्वारा तुम्हारी काट-छाँट और तुम्हारा न्याय किए जाने का भी अनुभव कर सकते हो, तो तुम्हारा अनुभव व्यापक होगा। परमेश्वर ने तुम पर अपना न्याय का कार्य किया है और उसने तुम पर अपनी ताड़ना का कार्य भी किया है। परमेश्वर के वचन ने तुम्हारी काट-छाँट की है, लेकिन इसने तुम्हें प्रबुद्ध और रोशन भी किया है। जब तुम नकारात्मक और कमजोर होते हो, परमेश्वर फिर भी तुम्हारी चिंता करता है। यह सब कार्य तुम्हें यह सिखाता है कि मनुष्य से संबंधित सब कुछ परमेश्वर के आयोजनों के अंतर्गत है। तुम्हें लग सकता है कि परमेश्वर पर विश्वास करना बस कष्ट सहने या उसके लिए बहुत सारी चीजें करने या अपनी देह की शांति या अपने लिए सब कुछ सहज रूप से होने देने या सभी चीजों में खुद आराम और सहजता से रहने के बारे में है। इनमें से कोई भी प्रयोजन ऐसा नहीं है जो लोगों का परमेश्वर पर अपने विश्वास में होना चाहिए। अगर तुम इन प्रयोजनों के लिए विश्वास करते हो, तो तुम्हारा दृष्टिकोण गलत है और तुम्हें पूर्ण बनाया जाना बिल्कुल भी संभव नहीं है। परमेश्वर के कर्म, परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव, उसकी बुद्धि, उसके वचन, उसकी अद्भुतता और उसका अथाहपन, वे सब चीजें हैं जिन्हें लोगों को समझना चाहिए। इस समझ के जरिए तुम्हें अपने व्यक्तिगत माँगों, आशाओं और धारणाओं को अपने हृदय से निकाल देना चाहिए। केवल इन चीजों को हटा करके ही तुम परमेश्वर द्वारा अपेक्षित शर्तें पूरी कर सकते हो। केवल इसके माध्यम से ही तुम जीवन प्राप्त कर सकते हो और परमेश्वर को संतुष्ट कर सकते हो। परमेश्वर पर विश्वास करने का प्रयोजन उसे संतुष्ट करना और उसके द्वारा अपेक्षित स्वभाव को जीना है, ताकि अयोग्य लोगों के इस समूह के माध्यम से उसके कर्म और उसकी महिमा अभिव्यक्त हो सके। परमेश्वर में विश्वास करने का यही सही दृष्टिकोण है और यही वह लक्ष्य भी है जिसका तुम्हें अनुसरण करना चाहिए। परमेश्वर पर विश्वास करने के बारे में तुम्हारा दृष्टिकोण सही होना चाहिए और तुम्हें परमेश्वर के वचनों को प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए। तुम्हें परमेश्वर के वचनों को खाने-पीने की आवश्यकता है और तुम्हें सत्य को जीने, और विशेष रूप से उसके व्यावहारिक कर्मों और पूरे ब्रह्मांड में उसके अद्भुत कर्मों को देखने, और साथ ही देह में उसके द्वारा किए जाने वाले व्यावहारिक कार्य को देखने में सक्षम होना चाहिए। अपने वास्तविक अनुभवों के माध्यम से लोग इस बात को समझ सकते हैं कि कैसे परमेश्वर उन पर अपना कार्य करता है और उनके प्रति परमेश्वर के इरादे क्या हैं। इस सबका प्रयोजन यह है कि लोग अपने भ्रष्ट शैतानी स्वभावों को उतारकर फेंक सकें। अपने भीतर की सारी अशुद्धता और अधार्मिकता को उतारकर फेंक देने, अपने गलत इरादे छोड़ देने और परमेश्वर में सच्चा विश्वास विकसित करने के बाद—केवल सच्चे विश्वास के साथ ही तुम परमेश्वर से सच्चा प्रेम कर सकते हो(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जिन्हें पूर्ण बनाया जाना है उन्हें शोधन से गुजरना होगा)। परमेश्वर के वचनों से मैंने देखा कि परमेश्वर में विश्वास करना उससे आशीषें पाने के लिए नहीं है। मुख्य बात यह है कि अपने भ्रष्ट स्वभाव को त्यागने और उसका उद्धार पाने के लिए परमेश्वर के न्याय, ताड़ना, परीक्षणों और शोधन का अनुभव किया जाए। अपनी आस्था के वर्षों को याद करूँ तो मैंने परमेश्वर के वचनों के इतने सिंचन और पोषण का आनंद लिया था लेकिन सत्य का अनुसरण नहीं किया था। मैं परमेश्वर के अनुग्रह और आशीषों का आनंद लेने पर अड़ी हुई थी, और मेरे जीवन स्वभाव में ज़रा भी बदलाव नहीं आया था। गुओ ली की बीमारी ने वास्तव में मेरी अपनी अवस्था को प्रकट किया। अब से, मुझे उन चीज़ों में परमेश्वर के कार्य का अनुभव करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए जो मेरे साथ होती हैं। खासकर उन मामलों में जो मेरी अपनी धारणाओं के अनुरूप नहीं हैं, मुझे सत्य खोजना चाहिए, खुद पर चिंतन करना और खुद को जानना चाहिए, और अपने भ्रष्ट स्वभावों का समाधान करना चाहिए। एक बार जब मैं इन बातों को समझ गई, तो मुझे इस बात की चिंता नहीं रही कि भविष्य में मुझे आशीषें मिलेंगी या नहीं। मैं अपने कर्तव्य में अपना दिल भी लगा सकी, सोचने लगी कि नवागतों को अच्छी तरह से कैसे सींचूँ और परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए अपना कर्तव्य कैसे पूरा करूँ। भविष्य में चाहे कोई भी बीमारी या विपत्ति मेरे रास्ते में आए, मैं परमेश्वर की आज्ञा मानने वाले दिल के साथ उसका अनुभव करते हुए सत्य का अनुसरण करने और अपना कर्तव्य अच्छी तरह से निभाने पर ध्यान केंद्रित करने को तैयार हूँ।

जुलाई 2023 में, मैं गुओ ली से फिर मिली। हालाँकि उसकी एक बाँह काट दी गई थी, फिर भी वह अपने मेजबानी के कर्तव्य में लगी हुई थी। जब हमने बात की कि बाँह कटवाने की बात का सामना करते हुए उसे कैसा लगा, उसने मुझे शांति और संयम से बताया, “परमेश्वर का धन्यवाद! मैं सत्तर साल से ज़्यादा की हूँ। जो दूसरे लोग मेरे साथ बीमार हुए थे, वे सब गुज़र चुके हैं, लेकिन मैं अभी भी ज़िंदा हूँ। यह परमेश्वर की सबसे बड़ी सुरक्षा है। हालाँकि मुझे यह गंभीर बीमारी हुई थी, लेकिन मैंने इससे बहुत कुछ पाया है। इस जीवन में, परमेश्वर के इतने सारे वचन सुन पाना और अपना कर्तव्य निभाने में सक्षम होना—बस यही काफी है। यह परमेश्वर का अनुग्रह है! मैं और कुछ नहीं माँगती। मैं केवल यही माँगती हूँ कि मैं जितने दिन भी जीऊँ, परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए अपना कर्तव्य निभा सकूँ!” गुओ ली के शब्द सुनकर, मैं शर्मिंदा भी हुई और गहराई से प्रेरित भी, और मुझे परमेश्वर के कार्य का अनुभव करने का आत्मविश्वास भी मिला। परमेश्वर को धन्यवाद!

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