45. वैवाहिक जीवन मेरी मंजिल नहीं है

कैथलीन, इटली

मेरा जन्म 80 के दशक के मध्य में हुआ था, और बड़े होते हुए मुझे टीवी नाटक देखना बहुत पसंद था। जब भी मैं शादी के सफेद जोड़े में नायिका को अपने प्रेमी के साथ गलियारे में चलते हुए देखती थी और उस आदमी को उससे यह कहते हुए सुनती थी, “मैं पूरी जिंदगी तुम्हारी रक्षा करूँगा और तुम्हें खुश रखूँगा,” तो मैं रश्क से भर उठती थी। मुझे यकीन था कि जिस व्यक्ति से तुम प्यार करते हो उसके साथ होना, अपने पास एक प्यारा-सा बच्चा होना और एक सामंजस्यपूर्ण परिवार की तरह एक साथ रहना—यही सबसे सुखी जीवन था। जब मैं बड़ी हुई, तो मेरी मुलाकात एक युवक से हुई जो परिपक्व और सुस्थिर था। वह मेरा खास खयाल रखता था, मेरी मनमानियों को सहन करता था, और हमेशा मेरे लिए रोमानी चीजें करता था, जैसे मेरे लिए छोटे-छोटे उपहार खरीदना। उसने वादा किया कि वह मेरे साथ हमेशा अच्छे ढंग से पेश आएगा और मुझे कभी जरा-सी भी तकलीफ नहीं होने देगा। हालाँकि उसका परिवार बहुत गरीब था और मेरे माता-पिता हमारी शादी के सख्त खिलाफ थे, फिर भी मैंने बिना किसी हिचकिचाहट के उससे शादी कर ली। शादी के बाद, हमारा एक प्यारा-सा बेटा हुआ, और मेरा पति अभी भी मेरा उतना ही खयाल रखता था। वह परिवार के सभी छोटे-बड़े मामलों का खयाल रखता था, इसलिए मुझे शायद ही किसी बात की चिंता करनी पड़ती थी। मैं अपने बच्चे की देखभाल करने और घर का काम करने के लिए घर पर ही रहती थी, उसके घर आने से पहले हर दिन उसके लिए स्वादिष्ट खाना बनाती और एक अच्छी पत्नी बनने की पूरी कोशिश करती थी। इस वैवाहिक जीवन ने मुझे बहुत संतुष्ट महसूस कराया और मुझे लगा कि मैं दुनिया की सबसे खुशहाल औरत हूँ।

जब हमारा बच्चा सात महीने का था, तो मैंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर का अंत के दिनों का सुसमाचार स्वीकार कर लिया। परमेश्वर के वचन पढ़कर मुझे मानवजाति के पतन के मूल के बारे में पता चला, शैतान किस तरह लोगों को भ्रष्ट करता है और परमेश्वर किस तरह लोगों को बचाने के लिए चरणबद्ध ढंग से कार्य करता है। मैं बहुत सारे ऐसे सत्यों को समझ गई जो मैं पहले नहीं समझती थी। मुझे लगा कि परमेश्वर में विश्वास करना अद्भुत है, और मुझे उम्मीद थी कि मेरा पति भी मेरे साथ परमेश्वर में विश्वास करेगा। लेकिन मुझे हैरानी हुई कि जब मेरे पति को पता चला मैं परमेश्वर में विश्वास करती हूँ तो वह आग बबूला हो गया। उसने मुझे विश्वास करने से बिल्कुल मना कर दिया, और यहाँ तक पूछा कि मुझे सुसमाचार किसने सुनाया था, कहा कि वह उस बंदे से निपट लेगा। अपने पति का रवैया देखकर मेरा दिल टूट गया। मुझे डर था कि मेरी आस्था की वजह से वह हर दिन मुझसे बहस करेगा, हमारा रिश्ता चौपट हो जाएगा और मैं अपने वैवाहिक संबंध को खो बैठूँगी। मैंने थोड़ी-सी कमजोरी महसूस की और मेरे पास अब अपनी आस्था में उतनी अधिक प्रेरणा नहीं रही। कुछ दिनों बाद, एक बहन को मेरी मनोदशा के बारे में पता चला और उसने परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़कर मुझे सुनाया : “परमेश्वर द्वारा मनुष्य पर किए जाने वाले कार्य का हर कदम बाहर से लोगों के बीच मेलजोल प्रतीत होता है, मानो यह मानवीय व्यवस्थाओं द्वारा या मानवीय विघ्न से उत्पन्न हुआ हो। किंतु, कार्य के प्रत्येक कदम, और घटित होने वाली हर चीज के पीछे शैतान द्वारा परमेश्वर के सामने चली गई बाजी है और इनमें अपेक्षित है कि लोग परमेश्वर के लिए अपनी गवाही में अडिग बने रहें। उदाहरण के लिए, जब अय्यूब का परीक्षण हुआ : पर्दे के पीछे शैतान परमेश्वर के साथ शर्त लगा रहा था और अय्यूब के साथ जो हुआ वे मनुष्यों के कर्म थे और मनुष्यों के विघ्न थे। परमेश्वर द्वारा तुम लोगों पर किए गए कार्य के हर कदम के पीछे शैतान की परमेश्वर के साथ बाजी होती है—इसके पीछे एक लड़ाई होती है। ... जब परमेश्वर और शैतान आध्यात्मिक क्षेत्र में लड़ाई करते हैं, तो तुम्हें परमेश्वर को कैसे संतुष्ट करना चाहिए और किस प्रकार उसके लिए गवाही में अडिग रहना चाहिए? तुम्हें यह पता होना चाहिए कि जो कुछ भी तुम्हारे साथ होता है वह एक महान परीक्षण है और वह समय है जब परमेश्वर को तुम्हारी गवाही की आवश्यकता होती है(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, केवल परमेश्वर से प्रेम करना ही वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करना है)। बहन ने यह कहते हुए मेरे साथ संगति की, “तुम्हारा पति परमेश्वर में तुम्हारे विश्वास में बाधा डाल रहा है, लेकिन इसके पीछे दरअसल शैतान की बाधा है। तुमने अभी-अभी परमेश्वर का अंत के दिनों का सुसमाचार स्वीकार किया है और तुम उद्धार प्राप्त करने के लिए सत्य का अनुसरण करना चाहती हो। शैतान नहीं चाहता कि लोग परमेश्वर का अनुसरण करें, इसलिए वह तुम्हारे पति का इस्तेमाल तुम्हें रोकने और तुम्हारा उत्पीड़न करने के लिए करता है, तुमसे तुम्हारी आस्था छुड़वाने के लिए करता है। यह शैतान की साजिश है! देखो, शुरुआत में परमेश्वर ने आदम और हव्वा को बनाया। वे परमेश्वर की उपस्थिति और आपूर्ति में अदन की वाटिका में रहते थे, और वे बहुत खुश थे। शैतान इंसान को परमेश्वर के हाथों से छीनना चाहता था, इसलिए उसने हव्वा को धोखा देने और उसे अच्छाई और बुराई के ज्ञान के वृक्ष का फल खाने का लालच देने के लिए झूठ का इस्तेमाल किया। आदम और हव्वा ने, विवेकशीलता के अभाव में, परमेश्वर के वचनों पर संदेह किया और इन्हें नकार किया। उन्होंने शैतान की बात मानी, फल खाया और परमेश्वर के साथ विश्वासघात किया। नतीजतन वे अदन की वाटिका से निकाल दिए गए और शैतान की सत्ता के अधीन आ गए, जहाँ वे उसके द्वारा रौंदे और सताए जाते। शैतान तुम्हें उत्पीड़ित और बाधित करने के लिए तुम्हारे पति का इस्तेमाल कर रहा है। हमें शैतान की साजिश की असलियत देखनी चाहिए और परमेश्वर के लिए अपनी गवाही में अडिग रहना चाहिए।” बहन की संगति सुनने के बाद मैं समझ गई। चूँकि मैं परमेश्वर में विश्वास करना और उसका अनुसरण करना चाहती थी, इसलिए शैतान मुझे रोकने के लिए भरसक कोशिश करता। मुझसे आस्था छुड़वाने के लिए वह मेरे पति द्वारा मेरे उत्पीड़न के इस्तेमाल की कोशिश कर रहा था। अगर मैं अपने पति की बात मान लेती और विश्वास करना छोड़ देती, तो मैं परमेश्वर के साथ विश्वासघात कर रही होती। मैं शैतान की चाल में नहीं फँस सकती थी। चाहे मेरे पति ने मेरा कैसे भी उत्पीड़न किया हो, मैं परमेश्वर में अपनी आस्था नहीं छोड़ सकती थी। उसके बाद जब भी मेरा पति घर पर नहीं होता था, मैं चुपके से परमेश्वर के वचन पढ़ती थी और सभाओं में जाती थी। एक साल बाद मुझे सिंचन उपयाजक चुना गया। सभाओं में जाने, परमेश्वर के वचन पढ़ने और उसके वचनों की अनुभवजन्य समझ के बारे में भाई-बहनों की संगति सुनने के जरिए, मुझे अधिकाधिक यकीन होता चला गया कि परमेश्वर में विश्वास करना ही जीवन का सही मार्ग है और मैं अपना कर्तव्य निभाने में और अधिक सक्रिय हो गई। लेकिन, मैं अभी भी अपने पति से बाधित थी। कभी-कभी, अगर सभा थोड़ी देर से खत्म होती, तो मैं बेचैन हो जाती, यह चिंता करती थी कि जब मेरा पति घर आएगा और मुझे नहीं देखेगा तो वह गुस्सा हो जाएगा और मुझसे झगड़ा करेगा। इसलिए जैसे ही सभाएँ समाप्त होतीं, मैं जितनी तेजी से हो सके घर भागती थी। घर पहुँचते ही मैं जल्दी से खाना बनाती थी और घर की हर चीज व्यवस्थित करती थी। अपने पति के साथ किसी भी तरह की अप्रियता से बचने के लिए उसके घर रहते मैं कभी भी भक्ति नहीं करती थी। हर बार मैं उसके चले जाने का इंतजार करती थी, तभी मैं परमेश्वर के वचनों की पुस्तकें निकालने की हिम्मत करती थी और जैसे ही मुझे दरवाजे के बाहर कोई शोर सुनाई देता था, मैं जल्दी से उन्हें छिपा देती थी।

बाद में, कलीसिया का कार्य अधिकाधिक व्यस्त होता गया और कभी-कभी मुझे घर पहुँचने में देर हो जाती थी। एक बार, एक सभा देर से खत्म हुई और मैं अपने बच्चे को समय पर बालवाड़ी से नहीं ला पाई, इसलिए शिक्षिका ने मेरे पति को फोन कर दिया। जब मैं घर पहुँची, तो उसने गुस्से में मुझसे पूछा कि मैं कहाँ थी। मैं उससे झूठ नहीं बोलना चाहती थी और मैं इस मौके का फायदा उठाकर उसे यह भी बताना चाहती थी कि जब से मैंने परमेश्वर में विश्वास करना शुरू किया है, मैंने क्या हासिल किया है। लेकिन मुझे हैरानी हुई, मेरी बात सुनने के बाद उसने गुस्से में कहा, “क्या तुम्हारे पिता ने तुम्हें यह परमेश्वर वाली बात सिखाई है?” और उसने मेरे पिता का नंबर मिलाना शुरू कर दिया। मैं उसके साथ एक कायदे की बात करना चाहती थी, लेकिन वह बहुत गुस्से में था। मैंने उससे पूछा, “परमेश्वर की विश्वासी होने के नाते मैं धूम्रपान नहीं करती हूँ, शराब नहीं पीती हूँ या माहजोंग नहीं खेलती हूँ और मैं निश्चित रूप से कोई अनुचित काम नहीं करती हूँ। तुम परमेश्वर में विश्वास से इतनी नफरत क्यों करते हो?” उसने तिरस्कारपूर्ण हँसी फेंकी और मुझसे सवाल किया, “क्या तुमने स्कूल में नहीं सीखा कि इंसान वनमानुषों से विकसित हुए हैं? परमेश्वर कैसे हो सकता है? परमेश्वर कहाँ है? अगर परमेश्वर है तो वह मुझे अभी जान से मार दे!” मुझे अपने पति के शब्दों से बेहद धक्का लगा और मैंने उसे फौरन आगाह किया कि वह इस कदर बिना सोचे-विचारे बात न करे। लेकिन उसने अट्टहास किया और कहा, “तुम्हारा विश्वास तुम्हें सिरफिरा बना चुका है! परमेश्वर कैसे हो सकता है? तुम धूम्रपान कर सकती हो, शराब पी सकती हो, माहजोंग खेल सकती हो और जो चाहो कर सकती हो, लेकिन बस परमेश्वर में विश्वास नहीं कर सकती हो! मैं तुमसे एक और बार पूछता हूँ : तुम्हें परमेश्वर चाहिए या यह परिवार?” मैंने कहा, “परमेश्वर में मेरी आस्था पक्की है!” जब उसने देखा कि मैं परमेश्वर में विश्वास करने के लिए दृढ़ हूँ, तो उसने कहा, “तो चली जाओ! तुम परमेश्वर में विश्वास कर सकती हो और अपने स्वर्ग में जा सकती हो, और मैं अपने नरक में जाऊँगा!” उसके खूँखार हाव-भाव को देखकर मुझे वाकई विश्वास नहीं हुआ कि यह वही पति है जिसने कभी मुझे ताउम्र प्यार करने और मुझे जीवन भर की खुशी देने का वादा किया था। वह परमेश्वर से इतनी नफरत करता था; वह पक्का नास्तिक था। मेरा दिल टूट गया था। अंदर ही अंदर, मैं इस सच को स्वीकार नहीं करना चाहती थी कि वह परमेश्वर का प्रतिरोध करता है और मैं अपने वैवाहिक जीवन को नहीं छोड़ सकती थी। मैं खुद को दिलासा देती रही, यह सोचती रही कि वह शायद गुस्से में बातें कह रहा है और उसके शांत होने पर सब ठीक हो जाएगा। इसलिए, मैंने कुछ समय के लिए अपनी माँ के घर रहने का फैसला किया। इस तरह, मैं अपना कर्तव्य भी सामान्य रूप से कर सकती थी। लेकिन अनपेक्षित रूप से, कुछ दिनों बाद मेरा पति दोस्तों के एक समूह को मेरी माँ के घर ले आया। वे सब एक साथ बोल रहे थे, मुझे अपनी आस्था छोड़ने के लिए मनाने की कोशिश कर रहे थे। मुझे यह डर था कि वे मोहल्ला समिति या पुलिस का ध्यान खींच लेंगे, इसलिए मेरे पास फिलहाल अपने पति के साथ घर वापस जाने के अलावा कोई चारा नहीं था।

घर पहुँचने के बाद, मेरा पति हर दिन मुझ पर नजर रखता था, वह जहाँ भी जाता मुझे अपने साथ ले जाता और मुझे घर पर अकेले नहीं रहने देता था। वह हर दिन मेरे लिए स्वादिष्ट खाना भी खरीदता था, मुझे और बच्चे को पार्कों और मॉलों में ले जाता था और हमेशा मुझे बताता रहता था कि मैं एक अच्छी पत्नी कैसे बनूँ और हमारा तीन लोगों का परिवार कैसे खुश रह सकता है। धीरे-धीरे, मैंने उसकी बातों का भेद पहचानना बंद कर दिया। मुझे बस यह लगता था, “मेरा पति मेरे प्रति इतना नेक है और हमारा बच्चा इतना सभ्य है; बस इसी तरह जीते रहना कितना अच्छा होगा।” चूँकि मुझे इस तरह की जिंदगी अधिकाधिक रास आने लगी थी, इसलिए मैं अब अपने कर्तव्य के प्रति जिम्मेदारी की भावना महसूस नहीं करती थी। मैं एक महीने तक समूह की सभाओं में शामिल नहीं हुई, और इसके बाद अगुआ ने मेरी परिस्थितियों के मद्देनजर मुझे बर्खास्त कर दिया।

बाद के दिनों में, हालाँकि मेरा पति अब मुझसे नाराज नहीं था, लेकिन मैं अपनी आत्मा के खालीपन को दूर नहीं कर पाई। मैं हर दिन लक्ष्यहीन गुजारती थी। मैं अक्सर खुद से पूछती थी, “क्या मैं अपनी पूरी जिंदगी इसी तरह जीने वाली हूँ? जीवन का अर्थ क्या है?” फिर, मेरे दिमाग में परमेश्वर के वचनों की कुछ पंक्तियाँ आईं : “कहाँ है तुम्हारा संकल्प? कहाँ है तुम्हारी महत्वाकांक्षा? कहाँ है तुम्हारी गरिमा? कहाँ है तुम्हारी सत्यनिष्ठा?(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, कार्य और प्रवेश (8))। परमेश्वर के एक के बाद एक सवालों का सामना करते हुए, मुझे बहुत बुरा लगा। मैंने अपने दिल में खुद से पूछा, “मेरा संकल्प कहाँ है? मैं अपने पति की पाबंदियों से आजाद क्यों नहीं हो सकती?” उसके बाद, मैंने परमेश्वर के वचनों का वह अंश पढ़ने के लिए ढूँढ़ा। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “परमेश्वर ने कई वचन कहे हैं, फिर भी किसने उन्हें कभी भी गंभीरता से लिया है? मनुष्य परमेश्वर के वचनों को नहीं समझता, फिर भी वह अविचलित और उत्कंठा-रहित रहता है; उसने वास्तव में कभी भी बूढ़े दानव का सार नहीं जाना है। लोग रसातल में, नरक में रहते हैं, लेकिन मानते हैं कि वे समुद्र-तल के महल में रहते हैं; उन्हें बड़े लाल अजगर द्वारा सताया जाता है, फिर भी वे स्वयं को बड़े लाल अजगर की सत्ता के ‘कृपापात्र’ मानते हैं; दानव द्वारा उन्हें मूर्ख बनाया जाता है, फिर भी उन्हें लगता है कि वे देह के उत्कृष्ट कला-कौशल का आनंद ले रहे हैं। कैसा घटिया, नीच अभागों का समूह है यह! मनुष्य का दुर्भाग्य से पाला पड़ चुका है, लेकिन उसे इसका पता नहीं है, और इस अंधेरे समाज में वह एक के बाद एक दुर्घटनाओं का सामना करता है, फिर भी वह इसके प्रति जागृत नहीं हुआ है। कब वह खुद के प्रति उदार होने के अपने स्वभाव को और अपने दासता के स्वभाव को त्याग पाएगा? क्यों वह परमेश्वर के हृदय के प्रति विचारशील नहीं है? क्या वह चुपचाप इस दमन और कठिनाई को सहता रहता है? क्या वह उस दिन की कामना नहीं करता, जब वह अंधेरे को प्रकाश में बदल सके? क्या वह उस न्याय और सत्य को प्राप्त करना नहीं चाहता है जिसे दबाया गया है? क्या वह लोगों द्वारा सत्य को अस्वीकार किए जाने और तथ्यों को तोड़े-मरोड़े जाने को देखते रहने और कुछ न करने का इच्छुक है? क्या वह इस अन्याय को सहते रहना चाहता है? क्या वह गुलाम होने के लिए तैयार है? क्या वह इस असफल राज्य के गुलामों के साथ परमेश्वर के हाथों नष्ट होने को तैयार है? कहाँ है तुम्हारा संकल्प? कहाँ है तुम्हारी महत्वाकांक्षा? कहाँ है तुम्हारी गरिमा? कहाँ है तुम्हारी सत्यनिष्ठा? कहाँ है तुम्हारी स्वतंत्रता? ... इस प्रकार उसे निरुद्देश्य ढंग से तंग और प्रताड़ित किया गया है और उसका पूरा जीवन अंततः व्यर्थ ही बीता है; उसे आने और विदा होने की इतनी जल्दी क्यों है? वह परमेश्वर को देने के लिए कोई अनमोल चीज़ क्यों नहीं रखता?(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, कार्य और प्रवेश (8))। मानव जीवन की मौजूदा दशा के बारे में परमेश्वर का प्रकाशन पढ़कर मुझे लगा मानो मैं किसी सपने से जागी हूँ। मैं सोचा करती थी कि तीन लोगों के परिवार का सामंजस्यपूर्ण ढंग से एक साथ रहना सबसे अद्भुत जीवन है, लेकिन क्या सचमुच ऐसा ही था? परमेश्वर में विश्वास करना बिल्कुल स्वाभाविक और उचित बात है, फिर भी अपने पति को नाराज न करने के लिए, मैं घर पर परमेश्वर के वचन पढ़ने की हिम्मत भी नहीं करती थी, सभाओं में जाने या अपना कर्तव्य निभाने की तो बात ही छोड़िए। मैं हर दिन बस अपने पति और बच्चे की रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने में बिताती थी, बिना किसी लक्ष्य या दिशा के जी रही थी, एक चलती-फिरती लाश की तरह। अपनी पहचान खोकर यह निरर्थक जीवन जीना खुशी की बात कतई नहीं थी। यह ठीक वैसा ही था जैसा परमेश्वर कहता है : “तुम लोग घोड़ों और मवेशियों की ऐसी दुनिया में रहते हो, फिर भी तुम लोगों को वास्तव में परेशानी महसूस नहीं होती; तुम लोग आनंद से भरे हुए हो और आज़ादी तथा आसानी से जीते हो। तुम लोग उस गंदे पानी में तैर रहे हो, फिर भी तुम्हें वास्तव में इस बात का एहसास नहीं है कि तुम इस तरह की दुर्दशा में गिर चुके हो। हर दिन तुम अशुद्ध आत्माओं के साहचर्य में रहते हो, ‘मल-मूत्र’ के साथ व्यवहार करते हो और तुम्हारा जीवन बहुत भद्दा है; तुम वास्तव में इस बात से अवगत नहीं हो कि तुम बिल्कुल भी मनुष्यों की दुनिया में नहीं रहते और तुम अपने नियंत्रण में नहीं हो। क्या तुम नहीं जानते कि तुम्हारा जीवन बहुत पहले ही अशुद्ध आत्माओं द्वारा रौंद दिया गया था या कि तुम्हारा चरित्र बहुत पहले ही गंदे पानी से मैला कर दिया गया था? क्या तुम्हें लगता है कि तुम एक सांसारिक स्वर्ग में रह रहे हो और तुम खुशियों के बीच में हो? क्या तुम नहीं जानते कि तुमने अपना जीवन अशुद्ध आत्माओं के साथ बिताया है, और तुम हर उस चीज़ के साथ सह-अस्तित्व में रहे हो जो उन्होंने तुम्हारे लिए तैयार की है? तुम्हारे जीने के ढंग का कोई अर्थ कैसे हो सकता है? तुम्हारे जीवन का कोई मूल्य कैसे हो सकता है?(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुम सभी कितने नीच चरित्र के हो!)। मैंने परमेश्वर के वचनों पर जितना अधिक चिंतन किया, मुझे अपना जीवन उतना ही अधिक दयनीय लगा। मेरे भाई-बहन सारे ही परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने और सत्य का अनुसरण करने के लिए कोई समय नहीं गँवा रहे थे और उनका जीवन निरंतर संवृद्धि कर रहा था। लेकिन मेरे दिन मेरे पति और बच्चे के इर्द-गिर्द घूमते थे, और मैं अपना जीवन अपने वैवाहिक संबंध पर बर्बाद कर रही थी। परमेश्वर लोगों को शुद्ध करने और बचाने के लिए सत्य व्यक्त करने के खातिर देहधारी हुआ है, ताकि वे अपने भ्रष्ट स्वभाव को उतार फेंकें, परमेश्वर का उद्धार पाएँ, और एक सार्थक जीवन जिएँ। अगर मेरे सारे दिन मेरे पति और बच्चे के इर्द-गिर्द घूमते रहे, तो मैं निश्चित रूप से परमेश्वर का उद्धार पाने के इस बेहद दुर्लभ अवसर को गँवा दूँगी, और अंत में, मैं दानवों के साथ नष्ट हो जाऊँगी। यह जीवन भर का पछतावा होगा! फिर मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, “हे परमेश्वर, मैं अब और लक्ष्यहीन होकर बस भ्रमित होकर नहीं जी सकती हूँ। मैं सत्य का अनुसरण करना और अपना कर्तव्य निभाना चाहती हूँ, लेकिन मैं अपने दिल से अपने पति को नहीं निकाल पा रही हूँ। शैतान की साजिशों की असलियत पहचानने के लिए तुम मेरा मार्गदर्शन करो ताकि मैं उसके द्वारा अब और बाधित न होऊँ और तुम में पूरे दिल से विश्वास कर सकूँ और अपना कर्तव्य उचित रूप से निभा सकूँ।”

बाद में, मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े और अपने पति के सार को और स्पष्ट रूप से देखा। परमेश्वर कहता है : “पति अपनी पत्नी से क्यों प्रेम करता है? पत्नी अपने पति से क्यों प्रेम करती है? बच्चे क्यों माता-पिता के प्रति कर्तव्यशील होते हैं? माता-पिता क्यों अपने बच्चों की गहरी परवाह करते हैं? लोगों की सारी मंशा किस चीज पर केंद्रित होती है? क्या यह सारी उनकी अपनी योजनाओं और स्वार्थी इच्छाओं को पूरा करने पर केंद्रित नहीं होती है?(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर और मनुष्य साथ-साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे)। “मान लो कि कोई व्यक्ति परमेश्वर का उल्लेख होने पर आग-बबूला हो जाता है और क्रोधित हो जाता है : क्या उसने परमेश्वर को देखा है? क्या वह जानता है कि परमेश्वर कौन है? वह नहीं जानता कि परमेश्वर कौन है, वह उसमें विश्वास नहीं करता, परमेश्वर ने उससे बात नहीं की है और परमेश्वर ने उसे कभी उकसाया नहीं है—तो वह क्रोधित क्यों होगा? क्या हम कह सकते हैं कि यह व्यक्ति दुष्ट है? सांसारिक प्रवृत्तियाँ, खाना-पीना, मौज-मस्ती और मशहूर हस्तियों की पूजा—इनमें से कोई भी चीज ऐसे व्यक्ति को क्रोधित नहीं करेगी। लेकिन, केवल ‘परमेश्वर’ शब्द का उल्लेख होने पर या परमेश्वर के वचनों के सत्य का उल्लेख होने पर ही वह क्रोधित हो जाता है। क्या यह एक दुष्ट प्रकृति नहीं है? यह इस बात को साबित करने के लिए पर्याप्त है कि यह उसकी दुष्ट प्रकृति है(वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है V)। परमेश्वर के वचनों ने मुझे जगा दिया। मेरे पति को मुझसे बिल्कुल भी सच्चा प्यार नहीं था; उसका तथाकथित प्यार सशर्त था। मैंने सोचा कि मेरा पति क्यों मेरी हर बात मान लिया करता था। ऐसा इसलिए था क्योंकि उसका परिवार बहुत गरीब था और हमारी शादी के समय उसने मुझे कोई वैवाहिक उपहार नहीं दिया था, जबकि मेरा रूप-रंग और पारिवारिक पृष्ठभूमि दोनों उससे बेहतर थे। उसे मेरे साथ देखे जाने पर गर्व महसूस होता था। साथ ही शादी के बाद मैं कपड़े-लत्ते धोती थी, उसके लिए खाना बनाती थी और मैंने उसे एक बच्चा दिया और मैं जीवन के हर पहलू में उसकी परवाह और देखभाल करती थी। जब मैंने परमेश्वर में विश्वास करना शुरू किया, तो चूँकि सीसीपी ईसाइयों को गिरफ्तार कर रही थी, उसे डर था कि अगर मैं गिरफ्तार हो गई, तो उसकी नाक कट जाएगी, इसलिए वह मेरे प्रति रूखा हो गया, अक्सर मुझसे गुस्सा होता था, और यहाँ तक कि उसने मुझे परमेश्वर में विश्वास करने से रोकने के लिए हर संभव कोशिश की। यह मुझसे प्यार करना कैसे हुआ? यह साफ तौर पर सिर्फ मुझे नियंत्रित करना और मेरा इस्तेमाल करना था। मैं तथाकथित प्यार से अंधी हो गई थी, यह सोचती थी कि मेरा पति मुझसे सच्चा प्यार करता है। मैं इतनी मूर्ख थी! जैसे ही परमेश्वर का जिक्र होता, मेरा पति लाल-पीला और आग बबूला हो जाता था, यहाँ तक कि ऐसी बातें कहता जो परमेश्वर को नकारतीं और उसका तिरस्कार करती थीं। वह एक दानव था जो परमेश्वर से नफरत करता था और उसका प्रतिरोध करता था! मेरी आस्था छुड़वाने के लिए उसने कठोर और नरम दोनों तरकीबें आजमाईं और यहाँ तक कहा कि मैं खा-पी और मौज कर सकती हूँ, माहजोंग खेल सकती हूँ—कुछ भी कर सकती हूँ लेकिन परमेश्वर में विश्वास नहीं कर सकती हूँ और सही मार्ग पर नहीं चल सकती हूँ। दानव इतने ही विकृत होते हैं! अतीत में, मैं उसे परिपक्व, सुस्थिर और अपने प्रति हर तरह से सहिष्णु मानती थी और मुझे लगता था कि वह एक ऐसा आदमी है जिसे मैं अपना पूरा जीवन सौंप सकती हूँ। लेकिन अब मैंने स्पष्ट रूप से यह देख लिया : यह सब बस एक भ्रम था। मेरे पास सत्य नहीं था और मैं लोगों का भेद पहचान नहीं सकती थी। मैं हमेशा उसकी मीठी बातों से धोखा खाती रही। मैं इतनी अंधी थी! फिर, मैंने परमेश्वर के वचनों के बारे में सोचा : “विश्वासी और अविश्वासी अंतर्निहित रूप से एक दूसरे के प्रति सुसंगत नहीं हैं; बल्कि वे परस्पर विरोधी हैं(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर और मनुष्य साथ-साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे)। मेरा पति एक नास्तिक है जो सांसारिक प्रवृत्तियों के पीछे भागता है और खाने-पीने और मजे करने का आनंद लेता है। मैं परमेश्वर में विश्वास करती हूँ और सत्य और उद्धार का अनुसरण करती हूँ। हम एक ही रास्ते पर नहीं चल रहे हैं। वह मेरी आस्था को नहीं बदल सकता है और मैं उसके सार को नहीं बदल सकती हूँ। अगर हम साथ भी रहते, तो भी हम खुश नहीं होते। मेरे पति ने मुझे अपनी निगरानी में रखा, हर दिन मुझे अपने साथ बुरी प्रवृत्तियों के पीछे भागने के लिए मनाता रहा और मुझे परमेश्वर में विश्वास करने और अपना कर्तव्य निभाने से रोकता रहा। यह प्यार नहीं था; यह उसका मुझे अपने साथ नरक में खींचना था। मैं इस दानव के साथ अब और समझौता नहीं कर सकती थी। मुझे पूरे दिल से परमेश्वर में विश्वास करना था और अपना कर्तव्य उचित रूप से निभाना था।

उसके बाद से मैं सामान्य रूप से बाहर जाती थी और अपना कर्तव्य निभाती थी। जब मेरे पति ने देखा कि वह मुझे नियंत्रित नहीं कर सकता, तो उसने मुझसे बात करना बंद कर दिया। हालाँकि इस तरह के वैवाहिक जीवन ने मुझे शारीरिक और मानसिक रूप से थका दिया था, फिर भी मैं अपने दिल में उम्मीद करती थी कि एक दिन मेरा पति मेरी आस्था में बाधा डालना बंद कर देगा और हमारा परिवार पहले की तरह मिल-जुलकर रह सकेगा। बाद में, मैंने विचार किया, “मैं अपने दिल से इस वैवाहिक रिश्ते को क्यों नहीं छोड़ पा रही हूँ?” फिर मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े : “हजारों वर्षों की ‘राष्ट्रीय भावना’ के माध्यम से मानव हृदय में गहराई तक बैठे हानिकारक प्रभावों और सामंती सोच ने लोगों को बाँध और जकड़ दिया है, जिससे उनमें जरा-सी भी स्वतंत्रता नहीं बची है, न कोई महत्वाकांक्षा या दृढ़ता है और न ही प्रगति करने की कोई इच्छा है; इसके बजाय वे नकारात्मक और प्रतिगामी बने रहते हैं, गुलामी की मानसिकता में जकड़े रहते हैं, इत्यादि। इन वस्तुनिष्ठ कारकों ने मानवता के वैचारिक दृष्टिकोण, आकांक्षाओं, नैतिकता और स्वभाव पर एक अमिट गंदा और बदसूरत रंग चढ़ा दिया है। ऐसा लगता है कि मनुष्य आतंकवाद की एक अँधेरी दुनिया में जी रहे हैं और उनमें से कोई भी इससे पार पाने के बारे में नहीं सोचता या एक आदर्श दुनिया में जाने के बारे में नहीं सोचता; बल्कि, वे अपने जीवन की स्थिति को लेकर संतोष की भावना के साथ अपने दिन बिताते हैं : बच्चे पैदा करना और पालना, प्रयास करना, पसीना बहाना, अपने श्रम में लगे रहना और एक आरामदायक और सुखी परिवार, वैवाहिक स्नेह, संतानोचित बच्चों, जीवन के अंतिम पड़ाव में आनंद और शांतिपूर्ण ढंग से अपने जीवन जीने का सपना देखना...। दसियों, हजारों, लाखों वर्षों से लेकर अब तक लोग इसी तरह अपना समय बरबाद करते आ रहे हैं, किसी ने भी समस्त मानव जीवन में सबसे शानदार जीवन का निर्माण नहीं किया है, वे केवल इस अँधेरी दुनिया में एक-दूसरे की हत्या, प्रसिद्धि और लाभ की दौड़ और एक-दूसरे के खिलाफ साजिशें रचने में लगे रहते हैं। किसने कभी परमेश्वर के इरादे जानने का प्रयास किया है? क्या किसी ने कभी परमेश्वर के कार्य पर ध्यान दिया है? वे सभी लोग, जिन पर अंधकार ने प्रभाव जमा लिया है, वह एक लंबे अरसे से उनकी मानव प्रकृति बन गया है, इसलिए परमेश्वर के कार्य को करना काफी कठिन हो गया है, यहाँ तक कि जो परमेश्वर ने लोगों को आज सौंपा है, उस पर वे ध्यान भी देना नहीं चाहते(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, कार्य और प्रवेश (3))। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद मैं समझ गई। शैतान द्वारा भ्रष्ट किए जाने के बाद, लोग विभिन्न पारंपरिक सांस्कृतिक विचारों और सामंती सोच से बंधे और जकड़े हुए हैं। वे एक प्यार भरे वैवाहिक जीवन और बच्चों के पालन-पोषण को अपने जीवन भर के अनुसरण का लक्ष्य बना देते हैं, और यह पीढ़ी-दर-पीढ़ी चला आ रहा है। इसके अलावा, सभी तरह के टीवी शो, फिल्में और साहित्यिक रचनाएँ “प्रेम सर्वोपरि है” और “एक-दूसरे का हाथ पकड़ना और साथ-साथ बूढ़ा होना” जैसे विचारों को बढ़ावा देती हैं। नतीजतन, लोग मानते हैं कि एक सुखी वैवाहिक जीवन की कामना करना सबसे महत्वपूर्ण चीज है। मैंने भी इन विचारों को अपने दिल में उतार लिया था और एक सुखी वैवाहिक जीवन होने को अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया था। हमारी शादी के बाद, मेरा पति हमेशा छोटे-छोटे रोमानी पल रचता रहता था और मेरा खयाल रखता था और मेरी परवाह करता था, इसलिए मैं बहुत संतुष्ट महसूस करती थी। मुझे लगता था कि उसके साथ अपनी पूरी जिंदगी बिता पाना ही जीवन को सार्थक बनाता है। अपने सुखी वैवाहिक जीवन को कायम रखने के लिए मैंने खाना बनाना सीखा, अपने बच्चे को पालने के लिए घर पर रही, और एक अच्छी पत्नी और माँ बनने की पूरी कोशिश की, अपने सारे समय और ऊर्जा को अपने वैवाहिक जीवन और परिवार में झोंक दिया। मैंने शादी को ही अपने जीवन की मंजिल माना और मुझे लगा कि इसके लिए सब कुछ देना ही मेरा फर्ज है। परमेश्वर को पाने के बाद, मैंने उसके वचनों से बहुत सारे सत्य और रहस्य समझे। मैं यह भी जानती थी कि एक सृजित प्राणी के रूप में, मुझे सृष्टिकर्ता की आराधना करनी चाहिए और अपना कर्तव्य उचित रूप से निभाना चाहिए। लेकिन मुझे डर था कि परमेश्वर में विश्वास करने से मेरा पति नाराज हो जाएगा और मैं अपने वैवाहिक जीवन को खो बैठूँगी, इसलिए सभाओं के दौरान मेरा ध्यान अक्सर भटक जाता था और मैं घर पर परमेश्वर के वचन पढ़ने या भजन सुनने की हिम्मत नहीं करती थी। अपने पति के साथ अपना रिश्ता बनाए रखने के लिए, मैंने अपना कर्तव्य ताक पर रख दिया और यहाँ तक कि इसे निभाने पर पछतावा भी किया। मैं “औरत की शादी ही उसकी जीवन भर की मंजिल है,” “सुखी शादी ही सबसे बड़ी खुशी है,” और “एक-दूसरे का हाथ पकड़ना और साथ-साथ बूढ़ा होना” जैसे शैतानी विचारों में बुरी तरह जकड़ी हुई थी। मैं सकारात्मक और नकारात्मक चीजों के बीच फर्क नहीं कर पा रही थी, और मैंने सुखी वैवाहिक संबंध के अनुसरण के लिए बेहिचक अपना कर्तव्य छोड़ दिया। अगर मैं इसी तरह चलती रही, तो अंततः मैं शैतान के साथ नष्ट हो जाऊँगी। इस बारे में सोचती हूँ तो भले ही मैं अपने पति के साथ एक सामंजस्यपूर्ण जीवन जी सकती थी, तो भी इसमें क्या अर्थ होता? मैं एक सृजित प्राणी के रूप में अपना कर्तव्य अच्छी तरह नहीं निभाती, न ही मैं उन सत्यों को समझ पाती जो मुझे समझने चाहिए थे। क्या अपनी पूरी जिंदगी भ्रमित होकर जीना समय की बर्बादी नहीं होती? फिर मैंने परमेश्वर के वचनों के बारे में सोचा : “दसियों, हजारों, लाखों वर्षों से लेकर अब तक लोग इसी तरह अपना समय बरबाद करते आ रहे हैं, किसी ने भी समस्त मानव जीवन में सबसे शानदार जीवन का निर्माण नहीं किया है।” जिस जीवन के पीछे मैं भाग रही थी वह एक निरर्थक जीवन था, और मैं आत्म-चिंतन किए बिना नहीं रह सकी : सबसे सुंदर जीवन क्या है? एक व्यक्ति को वास्तव में कैसे जीना चाहिए ताकि उसके जीवन में अर्थ हो?

फिर मैंने परमेश्वर के वचनों के दो अंश पढ़े और उनमें अपने जीवन की दिशा पा ली। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “कुछ लोग गलती से वैवाहिक सुख की तलाश, या अपने साथी के प्रति अपनी जिम्मेदारियाँ निभाने, अपने साथी का ध्यान रखने, उसकी देखभाल करने, उसे संजोने और उसकी रक्षा करने को अपने जीवन का मिशन बना लेते हैं; वे अपने साथी को अपनी पूरी दुनिया, अपना जीवन बना लेते हैं—यह गलत है। तुम्हारी नियति परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन है, इसमें तुम्हारे साथी का कोई नियंत्रण नहीं है। शादी तुम्हारी नियति नहीं बदल सकती, और न ही वह इस तथ्य को बदल सकती है कि परमेश्वर तुम्हारी नियति पर संप्रभुता रखता है। जीवन के प्रति तुम्हारा जो नजरिया होना चाहिए और तुम्हें जिस मार्ग पर चलना चाहिए, उन्हें तुम्हें परमेश्वर की शिक्षाओं और अपेक्षाओं के वचनों में खोजना चाहिए, उनके लिए अपने साथी पर निर्भर नहीं रहना चाहिए और इन्हें अपने साथी को तय करने नहीं देना चाहिए। तुम्हारे प्रति अपनी जिम्मेदारियाँ निभाने के अलावा, उसका तुम्हारे भाग्य पर कोई नियंत्रण नहीं होना चाहिए और न ही उसे तुमसे अपने जीवन की दिशा बदलने की माँग करनी चाहिए, उसे यह तय नहीं करना चाहिए कि तुम किस मार्ग पर चलोगे, जीवन के प्रति तुम्हारा नजरिया क्या रहेगा; तुम्हें उद्धार का अनुसरण करने से रोकना या बाधित करना तो दूर रहा। जहाँ तक शादी की बात है, लोगों को बस इसे परमेश्वर से आया मानकर स्वीकार लेना चाहिए और परमेश्वर द्वारा मनुष्य के लिए शादी की निर्धारित परिभाषा के अनुरूप चलना चाहिए, जहाँ पति-पत्नी दोनों ही एक-दूसरे के प्रति अपनी जिम्मेदारियाँ और दायित्व पूरा करेंगे। वे अपने साथी की नियति, उसका पिछला जीवन, वर्तमान जीवन या अगला जीवन तय नहीं कर सकते, शाश्वत जीवन की तो बात छोड़ ही दो। तुम्हारी मंजिल, तुम्हारी नियति, और तुम्हारे जीवन का मार्ग केवल सृष्टिकर्ता तय कर सकता है। इसलिए, एक सृजित प्राणी होने के नाते, चाहे तुम्हारी भूमिका पत्नी की हो या पति की, इस जीवन में तुम्हें जिन खुशियों का अनुसरण करना चाहिए वे एक सृजित प्राणी के रूप में अपना कर्तव्य करने और एक सृजित प्राणी का मिशन पूरा करने से ही आती हैं। सिर्फ शादी कर लेने से खुशियाँ नहीं मिल जाती हैं, और शादी के ढाँचे में रहकर एक पत्नी या पति की जिम्मेदारियाँ निभाने से तो बिल्कुल भी नहीं मिलती हैं। बेशक, जीवन में जो मार्ग तुम चुनते हो और जो नजरिया अपनाते हो, वह वैवाहिक सुख पर आधारित नहीं होना चाहिए; यह पति-पत्नी में से किसी एक के द्वारा निर्धारित तो और भी नहीं होना चाहिए—यह बात तुम्हें समझनी होगी। इसलिए, जो लोग शादी करने के बाद केवल वैवाहिक सुख की तलाश करते हैं और केवल इस तलाश को ही अपना मिशन मानते हैं, उन्हें ऐसे विचारों और दृष्टिकोणों को त्याग देना चाहिए, और अपने अभ्यास का तरीका और जीवन की दिशा बदलनी चाहिए(वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (11))। “सभी लोगों को अर्थपूर्ण जीवन जीने का प्रयास अवश्य करना चाहिए और उन्हें अपनी वर्तमान परिस्थितियों से संतुष्ट नहीं होना चाहिए। उन्हें पतरस की छवि को जीने की स्थिति में अवश्य आना चाहिए, और उनमें पतरस के ज्ञान और अनुभवों का होना जरूरी है। लोगों को उन चीजों का अनुसरण अवश्य करना चाहिए जो उच्चतर और अधिक गहन हैं। उन्हें परमेश्वर के प्रति एक अधिक गहरे एवं शुद्ध प्रेम का अनुसरण जरूर करना चाहिए और एक ऐसे जीवन का अनुसरण अवश्य करना चाहिए जिसका मूल्य और अर्थ हो। सिर्फ यही जीवन है; केवल तभी वे बिल्कुल पतरस जैसे होंगे। सकारात्मक पक्ष में, तुम्हें सक्रिय रूप से प्रवेश करने पर ध्यान देना चाहिए और तुम्हें इस कारण निष्क्रिय नहीं होना चाहिए और पीछे नहीं हटना चाहिए कि तुम अस्थायी आराम से संतुष्ट हो, साथ ही अधिक गहन, अधिक विस्तृत और अधिक व्यावहारिक सत्यों की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। तुम्हारे पास व्यावहारिक प्रेम होना चाहिए और तुम्हें बिल्कुल जानवरों जैसे इस पतनशील और बेपरवाह जीवन से खुद को मुक्त करने के लिए हर संभव उपाय ढूँढ़ना चाहिए। तुम्हें एक सार्थक जीवन, एक मूल्यवान जीवन जीना चाहिए और तुम्हें अपने-आपको मूर्ख नहीं बनाना चाहिए या अपने जीवन के साथ एक खिलौने की तरह पेश नहीं आना चाहिए। संकल्प रखने वाले और परमेश्वर से प्रेम करने वाले हर व्यक्ति के लिए कोई भी सत्य अप्राप्य नहीं है और ऐसा कोई न्याय नहीं है जिसके लिए वह अडिग न रह सके। तुम्हें अपना जीवन कैसे जीना चाहिए? तुम्हें परमेश्वर से कैसे प्रेम करना चाहिए और कैसे इस प्रेम का उपयोग उसके इरादे पूरे करने के लिए करना चाहिए? तुम्हारे जीवन में इससे बड़ा मामला कोई नहीं है। सबसे बढ़कर, तुममें इस तरह का संकल्प और दृढ़ता होनी चाहिए और रीढ़विहीन निर्बल नहीं होना चाहिए। तुम्हें सीखना चाहिए कि एक अर्थपूर्ण जीवन का अनुभव कैसे किया जाता है, तुम्हें अर्थपूर्ण सत्यों का अनुभव करना चाहिए और उस तरीके से अपने-आपसे लापरवाही से पेश नहीं आना चाहिए। तुम्हें एहसास भी नहीं होगा और तुम्हारा जीवन तुम्हारे हाथ से निकल जाएगा; उसके बाद क्या तुम्हारे पास अभी भी परमेश्वर से प्रेम करने का इस प्रकार का अवसर होगा? क्या मनुष्य मरने के बाद परमेश्वर से प्रेम कर सकता है? तुम्हारे अंदर बिल्कुल पतरस जैसा संकल्प और जमीर होना चाहिए; तुम्हें एक अर्थपूर्ण जीवन जीना चाहिए और अपने साथ खिलवाड़ नहीं करना चाहिए। एक मनुष्य के रूप में और परमेश्वर का अनुसरण करने वाले एक व्यक्ति के रूप में तुम्हें सावधानीपूर्वक अपने जीवन पर विचार करना चाहिए और इससे निपटने में सक्षम होना चाहिए—यह विचार करना चाहिए कि तुम्हें अपने-आपको परमेश्वर को कैसे अर्पित करना चाहिए, तुममें परमेश्वर के प्रति और अधिक अर्थपूर्ण आस्था कैसे होनी चाहिए और चूँकि तुम परमेश्वर से प्रेम करते हो, इसलिए तुम्हें उससे कैसे इस तरीके से प्रेम करना चाहिए कि यह ज्यादा शुद्ध, ज्यादा सुंदर और ज्यादा अच्छा हो। ... तुम्हें सत्य के लिए कष्ट उठाने होंगे, तुम्हें सत्य के लिए खुद को बलिदान करना होगा, तुम्हें सत्य के लिए अपमान सहना होगा और तुम्हें और अधिक सत्य प्राप्त करने की खातिर और अधिक कष्ट सहना होगा। यही तुम्हें करना चाहिए। पारिवारिक सामंजस्य का आनंद लेने के लिए तुम्हें सत्य का त्याग नहीं करना चाहिए और तुम्हें अस्थायी आनंद के लिए जीवन भर की गरिमा और सत्यनिष्ठा को नहीं खोना चाहिए। तुम्हें उस सबका अनुसरण करना चाहिए जो खूबसूरत और अच्छा है और तुम्हें जीवन में एक ऐसे मार्ग का अनुसरण करना चाहिए जो ज्यादा अर्थपूर्ण है। यदि तुम ऐसा साधारण और सांसारिक जीवन जीते हो और तुम्हारे पास अनुसरण का कोई लक्ष्य नहीं है, तो क्या इससे तुम्हारा जीवन बर्बाद नहीं हो रहा है? ऐसे जीवन से तुम्हें क्या हासिल हो सकता है? तुम्हें एक सत्य के लिए देह के सभी सुखों का त्याग करना चाहिए, और थोड़े-से सुख के लिए सारे सत्यों का त्याग नहीं कर देना चाहिए। ऐसे लोगों में कोई सत्यनिष्ठा या गरिमा नहीं होती; उनके अस्तित्व का कोई अर्थ नहीं होता!(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, पतरस के अनुभव : ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान)। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद, मेरा दिल अचानक रोशनी से भर गया, और मुझे महसूस हुआ मानो परमेश्वर खुद मेरा मार्गदर्शन उस दिशा में कर रहा है जिधर मेरे जीवन को जाना चाहिए। मैं समझ गई कि वैवाहिक जीवन मेरी मंजिल नहीं है और वैवाहिक जीवन के ढाँचे के दायरे में पति-पत्नी बस एक-दूसरे के प्रति अपनी जिम्मेदारियाँ अच्छी तरह निभा रहे होते हैं और साथ और देखभाल प्रदान कर रहे होते हैं। हमारे वैवाहिक जीवन में, मैंने कपड़े धोए थे, खाना बनाया था और एक बच्चे को जन्म दिया था; मैं अपनी जिम्मेदारियाँ अच्छी तरह निभा चुकी थी और अपने पति के प्रति किसी भी चीज की ऋणी नहीं थी। अगर उसने मेरी आस्था में दखल न दिया होता, तो हम साथ रहना जारी रख सकते थे, बशर्ते इससे मेरे कर्तव्य में बाधा न आती। लेकिन अगर वह मेरी आस्था में बाधा डालता है, तो मुझे एक सृजित प्राणी के रूप में अपना कर्तव्य निभाना चुनना चाहिए। मुझे वैवाहिक जीवन को अपनी मंजिल नहीं मानना चाहिए या उस पर जीवन भर की खुशी की आस नहीं टिकानी चाहिए। यह एक गलत नजरिया है। सालों तक, मैंने अपने पति को ही अपना सब कुछ माना था। जब उसने मेरी आस्था का विरोध किया, तो मैंने आँख मूँदकर समझौता किया और हार मान ली, सभाओं को और यहाँ तक कि अपने कर्तव्य को भी छोड़ दिया। मैं पूरी तरह से अंधकार में गिर गई, खालीपन और पीड़ा महसूस कर रही थी। मैं अपना सारा समय और ऊर्जा एक सुखी वैवाहिक जीवन को कायम रखने में खपा चुकी थी, इसलिए मैंने परमेश्वर के बहुत सारे वचन नहीं पढ़े थे और बहुत सारे सत्यों को नहीं समझा था। मैंने अपना कर्तव्य निभाते समय अपराध भी किए थे और अपने जीवन के कई साल बर्बाद कर दिए थे। अब, जब मैं अपना कर्तव्य निभाती हूँ, सभाओं में जाती हूँ और अपने भाई-बहनों के साथ परमेश्वर के वचनों पर संगति करती हूँ, तो मुझे अपने दिल में शांति और सुकून महसूस होता है। मैं यह भी समझती हूँ कि एक सृजित प्राणी के रूप में, मुझे सत्य का अनुसरण करना चाहिए और अपना कर्तव्य अच्छे ढंग से निभाना चाहिए। यही वह जीवन है जिसका मुझे अनुसरण करना चाहिए। मैंने याद किया कि कैसे पतरस ने अपनी आस्था के लिए अपने माता-पिता से उत्पीड़न का सामना किया था, लेकिन उसने अपने परिवार से बाधित होने से इनकार कर दिया और दृढ़ता से परमेश्वर का अनुसरण करना चुना। अंत में, उसने परमेश्वर का आदेश पूरा किया और परमेश्वर की स्वीकृति पाई। ऐसे बहुत सारे ईसाई भी थे जिन्होंने प्रभु का अनुसरण करने के लिए सब कुछ त्याग दिया, उसके सुसमाचार का प्रसार किया और अपना पूरा जीवन उसके लिए खपा दिया। मेरा दिल बहुत प्रेरित हुआ और मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, “हे परमेश्वर, मैं भी अपना कर्तव्य निभाने के लिए अपना घर छोड़ना चाहती हूँ और अपना पूरा जीवन तेरे लिए खपाना चाहती हूँ। मैं तुझसे माँगती हूँ कि तू मेरे लिए एक अवसर तैयार कर।”

एक साल बाद, जब मेरे पति ने देखा कि उसने मुझे रोकने की चाहे कैसी भी कोशिश कर ली हो, मैं अभी भी परमेश्वर में विश्वास करने और अपना कर्तव्य निभाने के लिए दृढ़ हूँ, तो उसने तलाक माँग लिया। मैंने शांत होकर कहा, “तो चलो हम अपने अलग-अलग रास्तों पर चलते हैं और सौहार्दपूर्ण ढंग से अलग हो जाते हैं।” जब मेरे पति ने देखा कि मैं गंभीर हूँ, तो वह नरम पड़ गया। वह यह मान गया कि वह मुझे अपने कर्तव्य निर्वहन के लिए घर छोड़ने देगा, लेकिन मुझे तलाक नहीं देगा। जब मैंने घर छोड़ा, तो मुझे पिंजरे से आजाद पंछी जैसा महसूस हुआ, जो आखिरकार उड़ने के लिए आजाद है। मैं जब चाहे भजन गा सकती हूँ, जब चाहे परमेश्वर के वचनों को खा और पी सकती हूँ, और मुझे किसी बात की चिंता करने की जरूरत नहीं है, भले ही मैं अपना कर्तव्य पूरा करके देर से वापस आऊँ। हर दिन, मुझे अपने भाई-बहनों के साथ सभाओं में जाने और अपना कर्तव्य निभाने में दिल से बहुत आनंद मिलता है। इस तरह का जीवन विशेष रूप से संतोषजनक और खुशहाल लगता है।

अब, मैं हर दिन पूर्णकालिक रूप से अपना कर्तव्य निभाती हूँ, मैं विभिन्न कर्तव्यों का प्रशिक्षण लेती हूँ और मुझे पहले की तुलना में सत्य सिद्धांतों की ज्यादा और व्यावहारिक समझ है। मैंने अपने जीवन प्रवेश में भी कुछ हासिल किया है। मुझे वास्तव में समझ आ गया है कि सच्ची खुशी एक सुखी वैवाहिक जीवन से नहीं मिलती है। इसके बजाय, सृष्टिकर्ता को जानना, अपने मिशन और जिम्मेदारियों को पूरा करने के लिए एक सृजित प्राणी का कर्तव्य अच्छे ढंग से निभाना और उद्धार के मार्ग पर चलने के लिए सत्य को समझना—यही सच्ची खुशी है। साथ ही, मैं खुद को विशेष रूप से भाग्यशाली मानती हूँ कि मानवजाति की इस विशाल भीड़ में परमेश्वर ने मुझे वापस अपने घर लाकर अनुग्रह प्रदान किया है, सत्य को समझने के लिए मेरा मार्गदर्शन किया है और मुझे वैवाहिक जीवन के भँवर से बचाया है। मैं अपने दिल की गहराइयों से परमेश्वर के उद्धार के लिए उसका धन्यवाद करती हूँ, और मैं अब से परमेश्वर के लिए पूरी निष्ठा से खुद को खपाने और एक सार्थक जीवन जीने का संकल्प लेती हूँ!

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