50. क्या ज्ञान का अनुसरण एक अच्छे भविष्य की गारंटी देता है?

फांग शाओयू, चीन

मेरे परिवार और शिक्षकों ने मुझे बचपन से ही बताया था कि मुझे मन लगाकर पढ़ाई करनी चाहिए और सिर्फ विश्वविद्यालय में दाखिला लेकर ही मेरा जीवन अच्छा हो सकता है। वरना मुझे अपना जीवन दुख और गरीबी में बिताना पड़ता। यह देखकर कि मेरा परिवार गरीब था और गाँव के लोग हमें नीची नजर से देखते थे, मैंने सोचा कि अगर मेरा विश्वविद्यालय में दाखिला हो गया तो मुझे एक अच्छी नौकरी मिल जाएगी और तब गाँव के लोग हमें नीची नजर से देखने की हिम्मत नहीं करेंगे। मुझे अपनी प्राथमिक विद्यालय की पाठ्यपुस्तक का एक वाक्यांश याद आया, “पढ़ने से व्यक्ति प्यार और धन दोनों पा सकता है।” मेरा मानना था कि अगर मैं मन लगाकर पढ़ाई करूँगी तो मुझे किताबों से बहुत ज्ञान मिलेगा और जितना अधिक ज्ञान और बेहतर शिक्षा मेरे पास होगी, मैं उतनी ही अमीर बनूँगी और सिर्फ ज्ञान ही मेरा भाग्य बदल सकता था। जब मेरे परिवार ने मुझसे परमेश्वर में विश्वास करने के बारे में बात की तो मैंने मुँह से तो सहमति दे दी, लेकिन अपने दिल में मैंने सोचा, “अभी पढ़ाई सबसे पहले है। एक बार जब मेरा विश्वविद्यालय में दाखिला हो जाएगा और अच्छी नौकरी मिल जाएगी, तब मैं ठीक से विश्वास करूँगी।” इसलिए मैं कभी सभाओं में नहीं गई। कभी-कभी मेरा परिवार मुझे परमेश्वर के वचन दिखाता था, लेकिन मैं उन्हें बस एक कहानी की किताब की तरह पढ़ लेती थी, जबकि मेरा दिल विश्वविद्यालय में दाखिला लेकर एक उज्ज्वल भविष्य बनाने पर लगा रहता था।

उस समय मेरे अंक काफी अच्छे थे और गाँव के लोग मेरे अच्छे अंकों और समझदारी के लिए मेरी प्रशंसा करते थे, वे कहते थे कि मैं निश्चित रूप से सफल होऊँगी। मेरे रिश्तेदार अक्सर मुझे मन लगाकर पढ़ाई करने के लिए प्रोत्साहित करते थे, वे कहते थे कि हमारे परिवार में निश्चित रूप से कोई विश्वविद्यालय से स्नातक होगा। यह सुनकर मैं खुश भी थी और हैरान भी। क्योंकि मेरा परिवार गरीब था और दूसरे हमें नीची नजर से देखते थे, मैं दूसरों के बीच सच में बहुत हीन महसूस करती थी, जैसे मैं सबसे नीचे हूँ। मैंने कभी उम्मीद नहीं की थी कि लोग मेरे अच्छे अंकों के कारण मेरे बारे में ऊँचा सोचेंगे, तो मुझे लगा कि पढ़ा-लिखा होना वास्तव में दूसरों की प्रशंसा दिला सकता है। लेकिन फिर मैंने सोचा कि मेरे अंक अभी भी सबसे अच्छे नहीं हैं, इसलिए मुझे बेहतर परिणाम पाने के लिए मेहनत करने की खातिर बहुत प्रयास करना था। बाद में मुझे जिले के सबसे प्रतिष्ठित हाई स्कूल में दाखिला मिल गया और मुझे विश्वास हो गया कि मेरे पास विश्वविद्यालय में दाखिला पाने का अच्छा मौका है और तब तक जो लोग मुझे जानते थे, वे निश्चित रूप से मुझे एक नई नजर से देखेंगे। जब मैं हाई स्कूल के अंतिम वर्ष में पहुँची, तो मेरे शिक्षक अक्सर कहते थे, “कॉलेज की प्रवेश परीक्षा ही तुम्हारे जीवन का स्तर तय करती है,” “आज के समाज में मुकाबला बहुत कड़ा है, यहाँ वही बचता है जो सबसे काबिल हो, केवल माहौल में ढलने वाले ही जी पाते हैं,” और “अगर तुम जवानी में मेहनत नहीं करोगी तो बुढ़ापे में पछताओगी।” मुझे एहसास हुआ कि केवल एक शीर्ष विश्वविद्यालय से डिप्लोमा लेकर ही मेरा भविष्य अच्छा हो सकता है और इस लक्ष्य को पाने के लिए मैंने और भी ज्यादा मेहनत से पढ़ाई की। मैं अक्सर दोपहर में भोजन करने के बजाय कक्षा में सवाल हल करती थी; यहाँ तक कि कैफेटेरिया जाना भी समय की बर्बादी लगता था। हर परीक्षा में मैं अपने अंक और रैंक की बहुत परवाह करती थी। जब मेरी रैंक ऊपर जाती तो मुझे खुशी होती, लेकिन जब मेरी रैंक में सुधार नहीं होता या वह गिर जाती तो मैं सच में बहुत निराश और बेचैन हो जाती थी। भले ही मैंने कड़ी मेहनत से पढ़ाई की, ज्यादातर समय कक्षा में मेरी रैंक बारहवीं या तेरहवीं ही रहती थी और मैं बहुत पीड़ा और भारी दबाव में थी। लेकिन मैंने सोचा कि केवल विश्वविद्यालय में दाखिला मिलने पर ही मेरा जीवन अच्छा होगा और मुझे नीची नजर से नहीं देखा जाएगा। इसलिए मैं कड़ी मेहनत करती रही, जरा भी ढील देने की हिम्मत नहीं की।

कॉलेज की प्रवेश परीक्षा से तीन महीने पहले एक ऐसी घटना हुई जिसने मुझे बहुत प्रभावित किया। स्कूल ने एक मॉक परीक्षा आयोजित की और दोबारा परीक्षा देने वाला एक छात्र एक प्रमुख विश्वविद्यालय के कटऑफ स्कोर से कुछ ही अंकों से चूक गया और उसने कूदकर अपनी जान दे दी। जब मैंने यह सुना तो मैं बहुत बेचैन हो गई। उसके अंक मुझसे बहुत ज्यादा थे, लेकिन सिर्फ कुछ अंकों के कारण उसने अपनी जान दे दी। कक्षा में बैठे-बैठे, मैंने अपने चारों ओर किताबों से पटी पड़ी मेज़ों और लगन से पढ़ाई करते सहपाठियों को देखा और अचानक मैं पूरी तरह से खोई हुई महसूस करने लगी। मैं सोचे बिना नहीं रह सकी, “एक नौजवान ज़िंदगी सिर्फ कुछ अंकों के कारण खत्म हो गई, क्या यह इसके लायक है? क्या हम छात्र सिर्फ अंकों के लिए जीते हैं? क्या अंक जीवन से ज्यादा महत्वपूर्ण हैं? क्या परीक्षा की रैंक सच में किसी व्यक्ति का भाग्य तय कर सकती है? वह इससे आगे क्यों नहीं देख सका?” जब मैंने सोचा कि कैसे मैं भी, ठीक उसी दोबारा परीक्षा देने वाले छात्र की तरह, एक अच्छे विश्वविद्यालय में दाखिला पाने के लिए अच्छे अंकों के लिए जी-तोड़ कोशिश कर रही थी, मैंने खुद से पूछा, “क्या विश्वविद्यालय ही मेरा एकमात्र रास्ता है? तो क्या हुआ अगर मेरा विश्वविद्यालय में दाखिला नहीं हो पाता? क्या ज्ञान सच में किसी व्यक्ति का भाग्य बदल सकता है?” ऐसे बहुत-से सवाल जिनका मैं जवाब नहीं दे सकती थी, मेरे मन में घूम रहे थे। मैंने अपने दादाजी के बारे में सोचा। वे पढ़े-लिखे थे और उन्होंने बहुत सारी किताबें पढ़ी थीं, लेकिन उन्होंने अपना पूरा जीवन एक किसान के रूप में बिताया। ज्ञान ने उनका भाग्य नहीं बदला। फिर मेरी चचेरी बहन है। विश्वविद्यालय से स्नातक होने के बाद वह एक बड़े शहर में काम करने चली गई और गाँव के लोग उसकी बहुत प्रशंसा करते थे, लेकिन वह फिर भी शिकायत करती थी कि नौकरी अच्छी नहीं है। मुझे नहीं पता था कि अपनी सारी कोशिशों के बाद मेरा हश्र मेरे दादाजी जैसा होगा, जिनका ज्ञान किसी काम का नहीं था, या अपनी चचेरी बहन जैसा, जिसकी दूसरे प्रशंसा तो करते थे पर वह कभी संतुष्ट नहीं थी। क्या होगा अगर मेरा सच में एक अच्छे विश्वविद्यालय में दाखिला हो जाए, मैं स्नातक हो जाऊँ और मुझे एक अच्छी नौकरी मिल जाए और मुझे दूसरों की प्रशंसा मिल जाए और फिर मेरी शादी हो जाए और मेरा एक परिवार हो—क्या मैं अपने बच्चों से भी अपनी तरह पढ़ाई के लिए मेहनत करवाऊँगी, विश्वविद्यालय में दाखिले के लिए संघर्ष करवाऊँगी? हर पीढ़ी जीवन के इसी ढर्रे को दोहराती है, लेकिन क्या सच में जीने का यही एकमात्र तरीका हो सकता है? क्या कोई और रास्ता नहीं था? मैंने अपने जीवन के आगे के रास्ते को लेकर एक अभूतपूर्व उलझन महसूस की और मुझे नहीं पता था कि मैं क्यों जीवित हूँ या मुझे किस सार्थक चीज का अनुसरण करना चाहिए।

बाद में मैंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन पढ़े और मेरे संदेह दूर हो गए। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “ब्रह्मांड और आकाश की विशालता में अनगिनत जीव रहते और प्रजनन करते हैं, एक अंतहीन चक्र में जीवन के नियम का पालन करते हैं, और एक अटल नियम का अनुसरण करते हैं। जो मर जाते हैं वे अपने साथ जीवित लोगों की कहानियाँ लेकर चले जाते हैं, और जो लोग जी रहे हैं वे खत्म हो चुके लोगों के उसी त्रासद इतिहास को दोहराते हैं। और इसलिए, मानवजाति यह पूछे बिना नहीं रह पाती : हम क्यों जीते हैं? और हमें मरना क्यों पड़ता है? इस संसार पर कौन शासन करता है? और इस मानवजाति को किसने बनाया? क्या मानवजाति को वास्तव में प्रकृति ने बनाया? क्या मानवजाति वास्तव में अपने भाग्य को नियंत्रित कर सकती है? ...(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परिशिष्ट 3 : मनुष्य को केवल परमेश्वर के प्रबंधन के बीच ही बचाया जा सकता है)। क्या परमेश्वर के वचन ठीक उन्हीं उलझनों के बारे में नहीं बता रहे थे जो मुझे थे? लेकिन मैंने ये मन की बातें कभी किसी से साझा नहीं की थीं, तो परमेश्वर को कैसे पता चला? ऐसा लगा कि परमेश्वर मेरे विचार समझता है और इससे भी बढ़कर वह पूरी मानवता के जीवन की वर्तमान दशा को जानता है। मैंने अपने दिल में परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता को महसूस किया और साथ ही परमेश्वर के वचनों ने मुझे पढ़ते रहने के लिए आकर्षित किया। परमेश्वर कहता है : “सामाजिक विज्ञानों के आगमन के बाद से ही मनुष्य का दिल विज्ञान और ज्ञान से भर गया है। विज्ञान और ज्ञान तब मानवजाति के शासन के लिए उपकरण बन गए हैं, जिससे मनुष्य के पास परमेश्वर की आराधना करने के लिए पर्याप्त गुंजाइश और परमेश्वर की आराधना करने के लिए उतनी अनुकूल परिस्थितियाँ नहीं बची हैं। मनुष्य के हृदय में परमेश्वर की स्थिति लगातार गिरती जा रही है। अपने हृदय में परमेश्वर के लिए स्थान न होने पर मनुष्य का आंतरिक संसार अंधकारमय, निराशाजनक और खाली होता है। बाद में मनुष्य के हृदय और मन में भरने के लिए कई समाज-वैज्ञानिकों, इतिहासकारों और राजनीतिज्ञों ने सामने आकर सामाजिक विज्ञान के सिद्धांत, मानव-विकास के सिद्धांत और अन्य कई सिद्धांत व्यक्त किए, जो इस सत्य का खंडन करते हैं कि परमेश्वर ने मनुष्य की रचना की है, और इस तरह, यह विश्वास करने वाले बहुत कम होते गए हैं कि परमेश्वर ने सब कुछ बनाया है और विकास के सिद्धांत पर विश्वास करने वालों की संख्या और अधिक बढ़ती गई है। अधिकाधिक लोग पुराने विधान के युग के दौरान परमेश्वर के कार्य के अभिलेखों और उसके वचनों को मिथक और किंवदंतियाँ समझते हैं। अपने हृदयों में लोग परमेश्वर की गरिमा और महानता के प्रति उदासीन हो जाते हैं और वे परमेश्वर के अस्तित्व के प्रति उदासीन हो जाते हैं और इस सिद्धांत के प्रति भी कि परमेश्वर सभी चीजों पर संप्रभु है। मानवजाति का अस्तित्व और देशों एवं राष्ट्रों का भाग्य उनके लिए अब महत्वपूर्ण नहीं रहे, और मनुष्य केवल खाने-पीने और भोग-विलास के अनुसरण पर ध्यान लगाए एक खोखले संसार में रहता है। ... विज्ञान, ज्ञान, स्वतंत्रता, लोकतंत्र, सुख और आराम मनुष्य को केवल अस्थायी सांत्वना देते हैं। यहाँ तक कि इन चीजों के होने के बावजूद मनुष्य अभी भी अनिवार्यतः पाप करता है और समाज में फैले अन्याय की शिकायत करता है। इन चीजों का होना मनुष्य की अन्वेषण की अभिलाषा और इच्छा को बाधित नहीं कर सकता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि मनुष्य को परमेश्वर द्वारा बनाया गया था और मनुष्य के बेतुके त्याग और अन्वेषण उसके लिए और अधिक कष्ट ही ला सकते हैं, वे मनुष्य को एक निरंतर व्याकुलता की स्थिति में रख सकते हैं और वह यह नहीं जान सकता कि मानवजाति के भविष्य या आगे आने वाले मार्ग का सामना किस प्रकार किया जाए, इस हद तक कि मनुष्य ज्ञान-विज्ञान से भी डरने लगता है और खालीपन के एहसास से तो और भी घबराने लगता है। इस संसार में, चाहे तुम किसी स्वतंत्र देश में रहते हो या बिना मानवाधिकारों वाले देश में, तुम मानवजाति के भाग्य से बचकर भागने में सर्वथा असमर्थ हो। तुम चाहे शासक हो या शासित, तुम भाग्य, रहस्यों और मानवजाति के गंतव्य की खोज करने की इच्छा से बचकर भागने में सर्वथा असमर्थ हो, और तुम खालीपन की अव्याख्येय भावना से बचकर निकलने में तो और भी असमर्थ हो। इस प्रकार की घटनाएँ, जो समस्त मानवजाति के लिए आम हैं, समाजशास्त्रियों द्वारा सामाजिक घटनाएँ कही जाती हैं, फिर भी कोई महान व्यक्ति इस समस्या का समाधान करने के लिए सामने नहीं आ सकता। मनुष्य आखिर मनुष्य है; परमेश्वर के दर्जे और जीवन की जगह कोई मनुष्य नहीं ले सकता। मानवजाति को केवल एक ऐसे न्यायपूर्ण समाज की ही आवश्यकता नहीं है जिसमें हर व्यक्ति को भरपेट भोजन मिले, सभी समान और स्वतंत्र हों; मानवजाति को जिस चीज की जरूरत है वह है परमेश्वर का उद्धार और मनुष्य के लिए उसके जीवन का पोषण। जब मनुष्य परमेश्वर का उद्धार और जीवन का पोषण प्राप्त करता है, केवल तभी उसकी आवश्यकताओं, अन्वेषण की इच्छा और दिल के खालीपन का समाधान हो सकता है(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परिशिष्ट 2 : परमेश्वर संपूर्ण मानवजाति के भाग्य पर संप्रभु है)। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद मैं समझी कि मनुष्य परमेश्वर द्वारा बनाए गए हैं और हमारे खालीपन और लाचारी की जड़ यह है कि परमेश्वर का अब हमारे दिलों में कोई स्थान नहीं है। पीछे मुड़कर देखूँ तो मैं बचपन में परमेश्वर के अस्तित्व में विश्वास करती थी, लेकिन स्कूल जाने के बाद पाठ्यपुस्तकों में परमेश्वर का कोई उल्लेख नहीं था। उनमें कहा गया कि मनुष्य बंदरों से विकसित हुए हैं और यह भी कि “ज्ञान तुम्हारा भाग्य बदल सकता है,” “अन्य अनुसरण छोटे हैं, किताबें उन सबसे श्रेष्ठ हैं,” और “विज्ञान सर्वोच्च है।” ऐसे विचार और कथन शैतान से आते हैं, जो लोगों को ज्ञान और विज्ञान की पूजा करने की ओर ले जाते हैं। मुझे नहीं पता कब, लेकिन मैंने भी इन कथनों को स्वीकार कर लिया था, ज्ञान को बहुत महत्व देती थी और उसे अत्यंत महत्वपूर्ण मानती थी और ज्ञान की खोज में मैं आस्था को दोयम दर्जे की चीज मानने लगी थी। अब मैं जीवन को लेकर उलझन से भर गई थी और कई बार मुझे एक अकथनीय खालीपन महसूस होता था। असल में ऐसा इसलिए था क्योंकि मैं परमेश्वर से बहुत दूर चली गई थी। हालाँकि पढ़ाई ने मेरे ज्ञान को बढ़ाया और मेरे दृष्टिकोण को व्यापक किया था और मुझे दूसरों से प्रशंसा और तारीफ मिली थी, पर ज्ञान जीवन के बारे में मेरी उलझन का जवाब नहीं दे सका, न ही वह मुझे जीवन का सही मार्ग दिखा सका। मेरा दिल उलझन, लाचारी और पीड़ा में डूबा रहा। मैंने पढ़ा कि परमेश्वर कहता है : “अपने हृदय में परमेश्वर के लिए स्थान न होने पर मनुष्य का आंतरिक संसार अंधकारमय, निराशाजनक और खाली होता है।” “मानवजाति को केवल एक ऐसे न्यायपूर्ण समाज की ही आवश्यकता नहीं है जिसमें हर व्यक्ति को भरपेट भोजन मिले, सभी समान और स्वतंत्र हों; मानवजाति को जिस चीज की जरूरत है वह है परमेश्वर का उद्धार और मनुष्य के लिए उसके जीवन का पोषण।” मैं समझ गई कि केवल परमेश्वर में विश्वास करके और उसका उद्धार पाकर ही व्यक्ति सभी खालीपन और पीड़ा से मुक्त हो सकता है। उस समय से मुझे पता था कि मुझे गंभीरता से परमेश्वर में विश्वास करना है और उसके वचन पढ़ने हैं और मैं अब अपनी आस्था की उपेक्षा नहीं कर सकती थी। आगे चलकर मैंने हफ्ते में एक बार सभाओं में जाना शुरू कर दिया और परमेश्वर के वचन पढ़ पाने से मुझे बहुत सुकून महसूस होता था।

कॉलेज की प्रवेश परीक्षा के बाद मेरे पास परमेश्वर के वचन पढ़ने के लिए ज्यादा समय था और मैं अक्सर भाई-बहनों के साथ कलीसियाई जीवन जीते हुए समय बिताती थी। मैंने देखा कि कलीसिया में सत्य का शासन है और भाई-बहनों के बीच धन या सामाजिक रुतबे का कोई भेद नहीं है, न ही वरिष्ठता या उम्र का। हर कोई खुलकर बात और संगति कर सकता है और जब हम भ्रष्टता प्रकट करते हैं तो सभी एक-दूसरे की मदद कर सकते हैं और हम एक-दूसरे को नीची नजर से नहीं देखते या एक-दूसरे से मुकाबला नहीं करते। मुझे इस तरह का जीवन बहुत पसंद आया। जल्द ही मुझे विश्वविद्यालय का प्रवेश पत्र मिला और मैं दुविधा में पड़ गई कि मुझे विश्वविद्यालय जाना चाहिए या नहीं। सच कहूँ तो मैं वाकई विश्वविद्यालय जाना चाहती थी, क्योंकि इतने सालों तक पढ़ाई करने के बाद मेरा लक्ष्य हमेशा से विश्वविद्यालय जाना और एक सम्मानजनक नौकरी पाना था जिसमें अच्छा वेतन और सुविधाएँ हों ताकि मुझे नीची नजर से न देखा जाए और मुझे गरीबी का दुख न उठाना पड़े। लेकिन मुझे यह भी चिंता थी कि अगर मैं विश्वविद्यालय गई और अपनी पढ़ाई में व्यस्त हो गई तो मेरे पास सभा करने और परमेश्वर के वचन पढ़ने का समय नहीं होगा। अपनी अनिश्चितता में मैंने अपने परिवार से पूछा और उन्होंने कहा, “कोई भी फैसला करने से पहले तुम्हें गंभीरता से परमेश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए।” तब मैंने परमेश्वर को अपनी कठिनाई के बारे में बताया और उससे सही चुनाव करने के लिए मेरा मार्गदर्शन करने को कहा।

बाद में मैंने परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा जो मेरे लिए काफी मददगार था। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “क्या ज्ञान ऐसी चीज़ है, जिसे हर कोई सकारात्मक चीज मानता है? लोग कम से कम यह तो सोचते ही हैं कि ‘ज्ञान’ शब्द का संकेतार्थ नकारात्मक के बजाय सकारात्मक है। तो हम यहाँ क्यों उल्लेख कर रहे हैं कि शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए ज्ञान का उपयोग करता है? क्या विकास का सिद्धांत ज्ञान का एक पहलू नहीं है? क्या न्यूटन के नियम ज्ञान का भाग नहीं हैं? पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण भी ज्ञान का ही एक भाग है, है न? (हाँ।) तो फिर ज्ञान क्यों उन चीजों की सूची में है जिन्हें शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए इस्तेमाल करता है? तुम लोगों का इस बारे में क्या दृष्टिकोण है? क्या ज्ञान में सत्य का लेश मात्र भी होता है? (नहीं।) तो ज्ञान का सार क्या है? लोग जो समस्त ज्ञान अर्जित करते हैं उसका आधार क्या है? क्या यह विकास के सिद्धांत पर आधारित नहीं है? क्या मनुष्य द्वारा अन्वेषण और सारांशित किए जाने के माध्यम से प्राप्त ज्ञान नास्तिकता पर आधारित नहीं है? क्या ऐसे किसी ज्ञान का परमेश्वर के साथ कोई संबंध है? क्या यह परमेश्वर की आराधना करने के साथ जुड़ा है? क्या यह सत्य के साथ जुड़ा है? (नहीं।) तो मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए शैतान ज्ञान का उपयोग कैसे करता है? मैंने अभी-अभी कहा कि इसमें से कोई भी ज्ञान परमेश्वर की आराधना करने या सत्य से नहीं जुड़ा है। कुछ लोग इस बारे में इस तरह सोचते हैं : ‘हो सकता है, ज्ञान का सत्य से कोई लेना-देना न हो, किंतु फिर भी, यह लोगों को भ्रष्ट नहीं करता।’ तुम लोगों का इस बारे में क्या दृष्टिकोण है? क्या तुम्हें ज्ञान के द्वारा यह सिखाया गया है कि व्यक्ति की खुशी उसके अपने दो हाथों से रची जाती है? क्या ज्ञान ने तुम्हें यह सिखाया कि मनुष्य का भाग्य उसके अपने हाथों में है? (हाँ।) यह कैसी बात है? (यह शैतानी बात है।) बिल्कुल सही! यह शैतानी बात है! ज्ञान वास्तव में काफी जटिल है। सरल शब्दों में कहें तो, चाहे ज्ञान किसी भी क्षेत्र का हो, यह एक ऐसी चीज है जिसे लोग अच्छा मानते हैं। ज्ञान कैसे उत्पन्न होता है? सारा ज्ञान उन अविश्वासियों द्वारा सारांशित किया गया है जो परमेश्वर को नहीं जानते हैं और उसकी आराधना नहीं करते हैं। जब लोग ज्ञान के इस क्षेत्र का अध्ययन करते हैं, तो वे यह नहीं देख पाते कि सभी चीजों पर परमेश्वर की संप्रभुता है; वे यह नहीं देख पाते कि परमेश्वर ही सारी चीजों को सँभालता या उनका प्रबंधन करता है। इसके बजाय, वे बस अंतहीन रूप से शोध और अन्वेषण करते हैं और ज्ञान के भीतर उन उत्तरों को खोजते हैं। लेकिन क्या यह सच नहीं है कि अगर लोग परमेश्वर पर विश्वास नहीं करेंगे और इसके बजाय केवल अनुसंधान करेंगे, तो वे कभी भी सही उत्तर नहीं पाएँगे? यह सारा ज्ञान तुम्हें केवल एक आजीविका, एक नौकरी और आमदनी दे सकता है ताकि तुम भूखे न रहो; किंतु वह तुमसे कभी भी परमेश्वर की आराधना नहीं कराएगा और वह कभी भी तुम्हें बुराई से दूर नहीं रखेगा। लोग जितना अधिक ज्ञान अर्जित करेंगे, उतना ही अधिक वे परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह करने, परमेश्वर की पड़ताल करने, परमेश्वर की परीक्षा लेने और परमेश्वर का प्रतिरोध करने की इच्छा करेंगे। तो अब हम ऐसा क्या देखते हैं जो ज्ञान लोगों को सिखा रहा है? यह सब शैतान का फलसफा है। क्या शैतान द्वारा भ्रष्ट मानवजाति के बीच फैलाए गए फलसफों और जीवित रहने के नियमों का सत्य से कोई लेना-देना है? उनका सत्य से कोई लेना-देना नहीं है, और वास्तव में, वे सत्य के प्रतिकूल हैं(वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है V)। परमेश्वर उजागर करता है कि शैतान लोगों को भ्रष्ट करने के लिए ज्ञान को एक चाल के रूप में कैसे इस्तेमाल करता है। मैंने देखा कि व्यावहारिक ज्ञान हमें बुनियादी सामान्य ज्ञान समझने में मदद कर सकता है और यह हमें काम और जीवन में सहायता कर सकता है, लेकिन हमारी सीखने की प्रक्रिया के दौरान, शैतान हमारे अंदर नास्तिकता, विकासवाद, मार्क्सवाद और अन्य विचारधाराओं को भर देता है। ये हमें परमेश्वर का ज्यादा से ज्यादा इनकार और उससे विद्रोह करने और उससे और भी दूर जाने के लिए प्रेरित करती हैं। मुझे याद आया कि एक बहन कह रही थी कि उसकी बेटी बचपन में परमेश्वर के अस्तित्व में विश्वास करती थी और आस्था में उसका अनुसरण करती थी, लेकिन बाद में जब वह विश्वविद्यालय चली गई, तो बहन ने अपनी बेटी से परमेश्वर में विश्वास करने के बारे में बात की, तो उसकी बेटी ने परमेश्वर के अस्तित्व को मानना ही बंद कर दिया। सच में मैं भी वैसी ही थी। जब मैं छोटी थी तो मैं परमेश्वर के अस्तित्व में विश्वास करती थी, लेकिन पाठ्यपुस्तकों और स्कूल में सिखाए जाने वाले ज्ञान में “परमेश्वर” शब्द का कभी उल्लेख नहीं किया गया था और सब कुछ केवल भौतिकवाद और विकासवाद के सिद्धांत के बारे में था, यह कहा जाता था कि दुनिया में सब कुछ स्वाभाविक रूप से बना है और मनुष्य बंदरों से विकसित हुए हैं, जिससे मुझे परमेश्वर के अस्तित्व पर संदेह होने लगा था। मुझे एहसास हुआ कि शैतान सच में लोगों को गुमराह करने और भ्रष्ट करने के लिए ज्ञान का उपयोग करता है। लेकिन उस समय मुझे इसका कोई एहसास नहीं था और मैं अभी भी ज्ञान के लिए तरसती थी, ज्ञान के सागर में तैरते रहना चाहती थी। मुझे तब बिल्कुल पता नहीं था कि यह एक चाल है, जिसका इस्तेमाल शैतान लोगों को गुमराह करने और भ्रष्ट करने के लिए करता है। ठीक वैसे ही जैसे धीरे-धीरे गर्म होते पानी में एक मेंढक को जिंदा उबाला जाता है, अगर कोई व्यक्ति सतर्क नहीं रहता और जल्दी से पानी से बाहर नहीं निकलता, तो उन्हें तब तक कोई एहसास नहीं होता जब तक शैतान उन्हें निगल नहीं लेता। विश्वविद्यालयों में सिखाया जाने वाला ज्ञान पूरी तरह से नास्तिकतापूर्ण है, मैंने जितना ज्यादा सीखा, उतनी ही गहराई से मेरे अंदर जहर फैल गया। अगर अंत में बहुत ज्यादा ज्ञान होने के कारण मैं परमेश्वर का इनकार करने वाली बन गई, तो बहुत देर हो चुकी होगी। क्या यह खुद को बर्बाद करना नहीं होगा? इसके परिणाम भयानक थे!

एक दिन मैंने परमेश्वर के और वचन पढ़े और मुझे परमेश्वर की संप्रभुता की कुछ समझ हासिल हुई। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “जिस क्षण तुम रोते हुए इस दुनिया में आते हो उसी पल से तुम अपनी जिम्मेदारियाँ निभाना शुरू कर देते हो। परमेश्वर की योजना और उसके विधान की खातिर तुम अपनी भूमिका निभाते हो और अपनी जीवन यात्रा शुरू करते हो। तुम्हारी पृष्ठभूमि जो भी हो और तुम्हारी आगे की यात्रा जैसी भी हो, किसी भी स्थिति में कोई भी स्वर्ग के आयोजनों और व्यवस्थाओं से बच नहीं सकता और कोई भी अपनी नियति को नियंत्रित नहीं कर सकता, क्योंकि जो सभी चीजों का संप्रभु है सिर्फ वही ऐसा करने में सक्षम है(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर मनुष्य के जीवन का स्रोत है)। मैं समझ गई कि एक व्यक्ति का भाग्य परमेश्वर के हाथों में है और लोगों में अपना भाग्य बदलने की कोई क्षमता नहीं है। मेरा भाग्य कैसे खुलेगा, मैं किस तरह का काम करूँगी, मेरा जीवन कैसा होगा और मैं गरीब होऊँगी या अमीर—यह सब परमेश्वर की पूर्वनियति और संप्रभुता के अधीन है और मैं इन्हें बदल नहीं सकती, ज्ञान या डिप्लोमा के माध्यम से तो ये और भी नहीं बदले जा सकते। ठीक मेरे दादाजी की तरह। परमेश्वर ने उन्हें एक किसान होने के लिए पूर्वनियत किया था और भले ही उन्होंने बहुत सारी किताबें पढ़ीं और बहुत कुछ सीखा, यह उनका भाग्य नहीं बदल सका। मुझे एहसास हुआ कि एक व्यक्ति का भाग्य सच में उसके अपने हाथों में नहीं है और ज्यादा शिक्षा होने का मतलब यह जरूरी नहीं है कि अच्छी नौकरी मिल ही जाए। मैं पढ़ाई के जरिए अपना भाग्य बदलना चाहती थी, लेकिन वह विचार सच में मूर्खतापूर्ण था। एक बार जब मुझे इसका एहसास हुआ, मैं खुद को परमेश्वर को सौंपने के लिए तैयार हो गई और मैं परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करने को तैयार हो गई।

उस दौरान मैंने परमेश्वर के और भी वचन पढ़े और एक खास अंश ने मुझ पर गहरी छाप छोड़ी। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “युवा लोगों को आकांक्षाओं, दृढ़ संकल्प और ऊपर उठने की जीवट भावना से रहित नहीं होना चाहिए; उन्हें अपनी संभावनाओं को लेकर निराश नहीं होना चाहिए और न ही उन्हें जीवन में आशा और भविष्य में आस्था खोनी चाहिए; उनमें यह दृढ़ता होनी चाहिए कि वे सत्य के उस मार्ग पर कायम रहें जो उन्होंने अब चुना है—ताकि वे मेरे लिए पूरा जीवन खपाने की अपनी इच्छा साकार कर सकें। युवा लोगों को सत्य से रहित नहीं होना चाहिए, न ही उन्हें पाखंड और अन्याय को प्रश्रय देना चाहिए—उन्हें अपने उचित रुख पर अडिग रहना चाहिए। उन्हें धारा के साथ बहना नहीं चाहिए, बल्कि उनमें न्याय और सत्य के लिए त्याग करने और संघर्ष करने का हिम्मत भरा जज्बा होना चाहिए। युवा लोगों में यह बहादुरी होनी चाहिए कि वे अँधकार की शक्तियों के उत्पीड़न के सामने न झुकें और अपने अस्तित्व की सार्थकता को परिवर्तित कर दें। युवा लोगों को चुपचाप सब कुछ सह नहीं लेना चाहिए, बल्कि इससे भी बढ़कर उनमें सच्चाई, बेबाकी और अपने भाई-बहनों के प्रति क्षमा की भावना होनी चाहिए। बेशक, मेरी ये अपेक्षाएँ सभी से हैं और सभी को मेरा यह प्रोत्साहन है। लेकिन इससे भी बढ़कर ये सभी युवा लोगों के लिए मेरे सांत्वनापूर्ण वचन हैं। तुम लोगों को मेरे वचनों के अनुसार अभ्यास करना चाहिए। विशेष रूप से युवा लोगों को चीजों के सही-गलत का स्पष्ट भेद पहचानने, न्याय और सत्य खोजने के संकल्प से रहित नहीं होना चाहिए। तुम लोगों को सभी सुंदर और अच्छी चीजों का अनुसरण करना चाहिए और सभी सकारात्मक चीजों की वास्तविकता प्राप्त करनी चाहिए। यही नहीं, तुम लोगों को अपने खुद के जीवन के प्रति जिम्मेदार होना चाहिए और इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए। लोग इस दुनिया में तो आते हैं, पर मुझसे उनका सामना होना दुर्लभ है और सत्य खोजने और उसे प्राप्त करने का अवसर मिलना भी दुर्लभ है। तुम लोग इस सुंदर समय को इस जीवन में अनुसरण करने के सही मार्ग के रूप में क्यों नहीं सँजोओगे? और तुम लोग हमेशा सत्य और न्याय के प्रति इतने तिरस्कारपूर्ण क्यों बने रहते हो? ... तुम लोगों का जीवन न्याय, सत्य और पवित्रता से भरा होना चाहिए; तुम्हें कभी भी इतनी जल्दी पतित नहीं होना चाहिए था और इस तरह रसातल में नहीं गिरना चाहिए था। क्या तुम लोगों को नहीं लगता कि यह एक भयानक दुर्भाग्य होगा? क्या तुम लोगों को नहीं लगता कि यह बहुत अन्यायपूर्ण होगा?(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, युवा और वृद्ध लोगों के लिए वचन)। परमेश्वर के इन वचनों ने मुझे जीवन में सही दिशा खोजने में मदद की। परमेश्वर सभी सुंदरता और अच्छाई का स्रोत है। मैं परमेश्वर में विश्वास करती हूँ और उसके वचन पढ़ती हूँ और उनसे मैं सकारात्मक और नकारात्मक चीजों के बीच अंतर कर सकती हूँ और विभिन्न बुरी प्रवृत्तियों का भेद पहचान सकती हूँ और मैं यह भी जानती हूँ कि सामान्य मानवता को कैसे जीना है, वगैरह-वगैरह। ये सभी चीजें मेरे आध्यात्मिक जीवन के लिए जरूरी हैं। अगर मैं सत्य का अनुसरण नहीं करूँ और इसके बजाय ज्ञान का ही अनुसरण करती रहूँ, तो मैं हर तरह के शैतानी फलसफों और जहर से प्रभावित हो जाऊँगी और ज्यादा से ज्यादा भ्रष्ट हो जाऊँगी। ठीक वैसे ही जैसे जब मैं स्कूल में थी, मैं साफ तौर पर जानती थी कि मेरे अंक औसत थे, लेकिन मैं यह मानने को तैयार नहीं थी और एक अच्छे विश्वविद्यालय में दाखिला पाने के लिए मैंने बहुत मेहनत से पढ़ाई की। नतीजतन, मैंने खुद को सताया और परमेश्वर से और भी दूर चली गई। हम मूल रूप से परमेश्वर द्वारा बनाए गए थे और हमें उसमें विश्वास करना चाहिए और सत्य का अनुसरण करना चाहिए, लेकिन शैतान के बहकाने और गुमराह करने के कारण, मैं केवल स्कूल जाना और पढ़ाई करना ही जानती थी और यह नहीं समझती थी कि मुझे परमेश्वर में विश्वास करना चाहिए और उसकी आराधना करनी चाहिए और मैं यह नहीं समझती थी कि जीवन सत्य और उद्धार का अनुसरण करने के लिए होना चाहिए। मैं पूरी तरह से अपनी पढ़ाई पर केंद्रित थी और मैंने बहुत समय बर्बाद किया। मैंने देखा कि परमेश्वर ने इतने सारे सत्य व्यक्त किए थे और अभी भी बहुत कुछ ऐसा था जो मैं नहीं समझती थी और मैं पछतावे से भर गई। अगर मैंने कुछ साल पहले ठीक से सभाओं में भाग लिया होता, तो क्या मैं और ज्यादा सत्य नहीं समझ पाती? अगर मैं कुछ और साल विश्वविद्यालय में पढ़ने चली गई, तो शायद परमेश्वर का कार्य पहले ही समाप्त हो चुका हो और इस तरह मैं निश्चित रूप से उद्धार का अपना मौका गँवा दूँगी। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद मैंने परमेश्वर के फौरी इरादे को महसूस किया। परमेश्वर मानवता के उसके सामने वापस आने और उसका उद्धार स्वीकार करने का इंतजार कर रहा है ताकि वे अब और शैतान से हानि न उठाएँ। मैं यह मौका नहीं गँवा सकती थी।

मैंने परमेश्वर के और वचन पढ़े जिन्होंने सचमुच मुझे प्रेरित किया। परमेश्वर कहता है : “यदि तुम्हारे पास ऊँचा रुतबा है, अत्यधिक प्रतिष्ठा है, प्रचुर ज्ञान है, असंख्य संपत्तियाँ हैं और बहुत-से लोगों का सहारा है, लेकिन तुम इन बातों से अप्रभावित रहते हो और परमेश्वर की पुकार और आदेश को स्वीकार करने और परमेश्वर तुमसे जो कुछ कहता है वह करने के लिए अभी भी उसके सम्मुख आते हो तो फिर तुम जो कुछ भी करोगे वह सब पृथ्वी पर सर्वाधिक सार्थक ध्येय होगा और मनुष्य का सर्वाधिक न्यायसंगत उपक्रम होगा। यदि तुम अपने रुतबे या लक्ष्यों की खातिर परमेश्वर के आह्वान को अस्वीकार करोगे, तो जो कुछ भी तुम करोगे, वह परमेश्वर द्वारा शापित किया जाएगा, और भी अधिक यह उसके लिए घृणित होगा(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परिशिष्ट 2 : परमेश्वर संपूर्ण मानवजाति के भाग्य पर संप्रभु है)। परमेश्वर स्पष्ट रूप से बताता है कि किस तरह के लोग उसकी स्वीकृति और आशीषें पाएँगे और किस तरह के लोग उसके द्वारा श्रापित और घृणित होंगे। जो लोग किसी भी बाधा के बावजूद परमेश्वर का आदेश स्वीकार करते हैं और तन-मन से खुद को परमेश्वर को अर्पित करते हैं, वे ही परमेश्वर की स्वीकृति और आशीषें पाएँगे। अगर कोई व्यक्तिगत हितों का अनुसरण करने के लिए परमेश्वर के आदेश को ठुकरा देता है, तो यह परमेश्वर से विद्रोह है और ऐसा व्यक्ति परमेश्वर द्वारा ठुकरा दिया जाता है। मैंने सोचा कि एक सृजित प्राणी के रूप में अगर मैंने केवल ज्ञान का अनुसरण किया, सत्य का नहीं, तो मैं परमेश्वर द्वारा दी गई साँस को व्यर्थ ही गँवा दूँगी। अगर मैं इन सालों का उपयोग विश्वविद्यालय में पढ़ाई करने के बजाय एक सृजित प्राणी के रूप में अपना कर्तव्य निभाने में कर सकूँ—और ज्यादा लोगों को यह सुसमाचार बताऊँ कि परमेश्वर मानवजाति को बचाने का कार्य करने आ गया है और मुझ जैसे और ज्यादा खोए हुए लोगों को परमेश्वर के सामने लौटने में मदद करूँ—तो यह करने के लिए सबसे सार्थक काम होगा। मैंने पतरस के बारे में सोचा। वह छोटी उम्र से ही पढ़ाई और आचरण दोनों में उत्कृष्ट था और उसके माता-पिता को उम्मीद थी कि वह पढ़ाई में सफल होगा और दुनिया में सबसे अलग होगा, लेकिन पतरस ने प्रसिद्धि, लाभ और रुतबा पाने के लिए और अधिक ज्ञान या उच्च शिक्षा का अनुसरण नहीं किया। बल्कि उसने परमेश्वर में विश्वास करना और प्रचार करना चुना। अपने माता-पिता के विरोध के बावजूद उसने हाई स्कूल पूरा करने के बाद अपनी पढ़ाई छोड़ दी। हालाँकि वह मछली पकड़कर अपनी आजीविका चलाता था और एक साधारण जीवन जीता था, परमेश्वर के लिए अपनी तड़प के कारण उसने लगातार परमेश्वर को जानने और उससे प्रेम करने की कोशिश की और अंत में उसे परमेश्वर की स्वीकृति मिली। पतरस के अनुसरण से मैं बहुत प्रभावित हुई और साथ ही इसने मुझे प्रेरित किया, जिससे मुझे विश्वविद्यालय छोड़ने का संकल्प मिला।

मुझे पता ही नहीं चला कि कब विश्वविद्यालय में पंजीकरण का दिन आ गया। एक सहपाठी ने साथ में पंजीकरण करने के लिए बुलाने को मुझे फोन किया, लेकिन मैंने उससे कह दिया कि मैं विश्वविद्यालय नहीं जा रही हूँ। उसके बाद, सहपाठी, दोस्त और परिवार के अविश्वासी सदस्य एक के बाद एक मुझे मनाने आए। कुछ ने कहा, “डिग्री के बिना तुम्हें बाहर की दुनिया में अच्छी नौकरी नहीं मिलेगी।” दूसरों ने कहा, “कुछ लोग विश्वविद्यालय में दाखिला लेना चाहते हैं लेकिन ले नहीं पाते। लेकिन तुम्हें देखो : तुम्हारा दाखिला हो गया है और तुम जा नहीं रही हो? क्या तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है?” मेरे बड़े भाई ने यह भी कहा कि अगर मैं विश्वविद्यालय गई तो वह मुझे तीन हजार युआन देगा और वह मुझे एक अच्छा फोन खरीदकर देगा। मैं थोड़ी दुखी और कमजोर पड़ गई, क्योंकि मुझे लगा कि मैं कभी उनकी नजरों में एक आज्ञाकारी और समझदार बच्ची थी, बेहतरीन अंकों वाली एक अव्वल छात्रा और एक होनहार नौजवान जिसका भविष्य उज्ज्वल था, फिर भी अब मुझे एक ऐसा व्यक्ति माना जा रहा था जिसका दिमाग खराब हो गया था और जो अवज्ञाकारी थी। मुझे थोड़ा असहज महसूस हुआ। लेकिन परमेश्वर की सुरक्षा के कारण जब मैंने इस तथ्य के बारे में सोचा कि मैं जीवन के सही मार्ग पर थी, सबसे नेक उद्देश्य चुन रही थी, तो मैंने खुद को फिर से आस्था से भरा हुआ पाया। वे जो चाहें सोच और कह सकते थे; मैं हमेशा की तरह सभाओं में जाना और अपना कर्तव्य निभाना जारी रखूँगी। उस समय मुझे परमेश्वर के वचनों का “सत्य के लिए तुम्हें सब कुछ त्याग देना चाहिए” नामक भजन गाना बहुत पसंद था :

1  एक मनुष्य के रूप में और परमेश्वर का अनुसरण करने वाले एक व्यक्ति के रूप में तुम्हें सावधानीपूर्वक अपने जीवन पर विचार करना चाहिए और इससे निपटने में सक्षम होना चाहिए—यह विचार करना चाहिए कि तुम्हें अपने-आपको परमेश्वर को कैसे अर्पित करना चाहिए, तुममें परमेश्वर के प्रति और अधिक अर्थपूर्ण आस्था कैसे होनी चाहिए और चूँकि तुम परमेश्वर से प्रेम करते हो, इसलिए तुम्हें उससे कैसे इस तरीके से प्रेम करना चाहिए कि यह ज्यादा शुद्ध, ज्यादा सुंदर और ज्यादा अच्छा हो। आज तुम केवल इस बात से संतुष्ट नहीं हो सकते कि तुम पर किस प्रकार विजय पाई जानी है, बल्कि यह विचार भी करना चाहिए कि तुम्हें अपने आगे के पथ पर कैसे चलना चाहिए। पूर्ण बनाए जाने के लिए तुम्हारे पास संकल्प और साहस होना चाहिए और तुम्हें हमेशा यह नहीं सोचते रहना चाहिए कि तुम असक्षम हो। तुम्हें सत्य के लिए कष्ट उठाने होंगे, तुम्हें सत्य के लिए खुद को बलिदान करना होगा, तुम्हें सत्य के लिए अपमान सहना होगा और तुम्हें और अधिक सत्य प्राप्त करने की खातिर और अधिक कष्ट सहना होगा। यही तुम्हें करना चाहिए।

2  पारिवारिक सामंजस्य का आनंद लेने के लिए तुम्हें सत्य का त्याग नहीं करना चाहिए और तुम्हें अस्थायी आनंद के लिए जीवन भर की गरिमा और सत्यनिष्ठा को नहीं खोना चाहिए। तुम्हें उस सबका अनुसरण करना चाहिए जो खूबसूरत और अच्छा है और तुम्हें जीवन में एक ऐसे मार्ग का अनुसरण करना चाहिए जो ज्यादा अर्थपूर्ण है। यदि तुम ऐसा साधारण और सांसारिक जीवन जीते हो और तुम्हारे पास अनुसरण का कोई लक्ष्य नहीं है, तो क्या इससे तुम्हारा जीवन बर्बाद नहीं हो रहा है? ऐसे जीवन से तुम्हें क्या हासिल हो सकता है? तुम्हें एक सत्य के लिए देह के सभी सुखों का त्याग करना चाहिए, और थोड़े-से सुख के लिए सारे सत्यों का त्याग नहीं कर देना चाहिए। ऐसे लोगों में कोई सत्यनिष्ठा या गरिमा नहीं होती; उनके अस्तित्व का कोई अर्थ नहीं होता!

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, पतरस के अनुभव : ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान

परमेश्वर के वचनों से मैंने देखा कि परमेश्वर आशा करता है कि हम सत्य और उस चीज के अनुसरण के लिए जिएँ जो न्यायोचित है और अगर हम अस्थायी सुख के लिए सत्य को त्याग देते हैं, तो हम अपनी गरिमा खो देते हैं और इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि हम जीवन का मूल्य और अर्थ खो देते हैं। अतीत में मुझे नहीं पता था कि एक सार्थक जीवन क्या होता है। मैंने सोचा था कि स्कूल में ज्ञान का अध्ययन करने, एक अच्छे विश्वविद्यालय में दाखिला पाने और संभावनाओं से भरा भविष्य होने से दूसरों की प्रशंसा मिलेगी और इसका मतलब होगा कि मैं अपने जीवन में कुछ कर रही हूँ। लेकिन अप्रत्याशित रूप से, सालों-साल की इस पढ़ाई ने न केवल मुझे आचरण करना नहीं सिखाया, बल्कि मैं रास्ता भी भटक गई। मैं यह भी भूल गई थी कि मैं परमेश्वर से आई हूँ और जीवन की यह साँस मुझे परमेश्वर ने दी है और मुझे शैतान ने हानि पहुँचाई और मूर्ख भी बनाया। अंत में मैं लगभग शैतान जैसी बन गई थी, परमेश्वर का प्रतिरोध करती और उसका इनकार करती और बिना किसी मूल्य या गरिमा के जी रही थी। अब मैं परमेश्वर में आस्था और सत्य के अनुसरण के मार्ग पर चलना चुन रही थी। हालाँकि मेरे परिवार और दोस्तों ने मुझे नहीं समझा और मेरी निंदा की और भविष्य में शायद मैं धन-दौलत का जीवन न जीऊँ या लोगों की प्रशंसा न पाऊँ, पर परमेश्वर में विश्वास करके और अपना कर्तव्य निभाकर मैं सत्य को समझ सकती हूँ और जीवन पा सकती हूँ। यह सबसे सार्थक चीज है और यह दुख व्यर्थ नहीं है। इसलिए चाहे उन्होंने मुझे कितना भी मनाने की कोशिश की, मैं डिगी नहीं और मैं जानती थी कि यह शक्ति मुझे परमेश्वर ने दी है।

उसके बाद मैं विश्वविद्यालय नहीं गई और इसके बजाय मैंने कलीसिया में अपना कर्तव्य निभाया। परमेश्वर की संगति और प्रकाशन के माध्यम से, मुझे ज्ञान के अपने अनुसरण की गहरी समझ मिली। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “लोगों के ज्ञान प्राप्त करने की प्रक्रिया के दौरान सभी प्रकार के तरीके इस्तेमाल करके, चाहे वह कहानियाँ सुनाना हो, बस उन्हें कुछ ज्ञान देकर या उन्हें अपनी इच्छाएँ या आकांक्षाएँ पूरी करने देकर, शैतान लोगों को किस मार्ग पर ले जाना चाहता है? लोगों को लगता है कि ज्ञान अर्जित करने में कुछ भी गलत नहीं है, यह पूरी तरह स्वाभाविक और न्यायोचित है। इसे आकर्षक ढंग से प्रस्‍तुत करें तो ऊँची आकांक्षाएँ रखने या महत्वाकांक्षाएँ होने का मतलब दृढ़-संकल्प होना है और यही जीवन में सही मार्ग होना चाहिए। अगर कोई अपने जीवनकाल में अपनी आकांक्षाएँ पूरी कर सके या सफल करियर बना सके, तो क्या यह जीने का अधिक शानदार तरीका नहीं है? इस तरह व्यक्ति न केवल अपने पूर्वजों का सम्मान कर सकता है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए अपनी छाप छोड़ने का मौका भी पा सकता है—क्या यह अच्छी बात नहीं है? सांसारिक लोगों की दृष्टि में यह एक अच्छी बात है, और उनकी निगाह में यह उचित और सकारात्मक होनी चाहिए। लेकिन क्या शैतान, अपने दुर्भावनापूर्ण इरादों के साथ, लोगों को ऐसे मार्ग पर ले जाता है और बस इतना ही होता है? बिल्कुल नहीं। वास्तव में, मनुष्य की आकांक्षाएँ चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हों, उसकी इच्छाएँ चाहे कितनी भी यथार्थपरक क्यों न हों या वे कितनी भी उचित क्यों न हों, वह सब जो मनुष्य हासिल करना चाहता है और वह सब जो मनुष्य खोजता है, वह अटूट रूप से दो शब्दों से जुड़ा है। ये दो शब्द हर व्यक्ति के लिए उसके संपूर्ण जीवन में अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, और ये ऐसी चीजें हैं जिन्हें शैतान मनुष्य के भीतर बैठाना चाहता है। वे दो शब्द कौन-से हैं? वे हैं ‘प्रसिद्धि’ और ‘लाभ।’ शैतान एक बहुत ही सौम्य तरीका चुनता है, एक ऐसा तरीका जो मनुष्य की धारणाओं के बहुत ही अनुरूप है और जो बहुत आक्रामक नहीं है, ताकि वह लोगों से अनजाने में ही जीवित रहने के अपने साधन और नियम स्वीकार करवा ले, जीवन लक्ष्य और जीवन की दिशाएँ विकसित करवा ले और जीवन की आकांक्षाएँ रखवाने लगे। अपने जीवन की आकांक्षाओं के बारे में लोगों के वर्णन कितने ही आडंबरपूर्ण क्यों न लगते हों, ये आकांक्षाएँ हमेशा ‘प्रसिद्धि’ और ‘लाभ’ के इर्द-गिर्द घूमती हैं। कोई भी महान या प्रसिद्ध व्यक्ति—या वास्तव में कोई भी व्यक्ति—जीवन भर जिन सारी चीजों का पीछा करता है वे केवल इन दो शब्दों से जुड़ी होती हैं : ‘प्रसिद्धि’ और ‘लाभ।’ लोगों को लगता है कि एक बार उनके पास प्रसिद्धि और लाभ आ जाए तो उनके पास ऊँचे रुतबे और अपार धन-संपत्ति का आनंद लेने और जीवन का आनंद लेने के लिए पूँजी आ जाती है। उन्हें लगता है कि एक बार उनके पास प्रसिद्धि और लाभ आ जाए तो उनके पास वह पूँजी होती है जिसका इस्तेमाल वे सुख खोजने और देह के उच्छृंखल आनंद में लिप्त रहने के लिए कर सकते हैं। लोग जिस प्रसिद्धि और लाभ की कामना करते हैं उसकी खातिर वे खुशी से और अनजाने में, अपने शरीर, दिल और यहाँ तक कि अपनी संभावनाओं और नियतियों समेत वह सब जो उनके पास है, शैतान को सौंप देते हैं। वे ऐसा बिना किसी हिचकिचाहट के करते हैं, बिना एक पल के संदेह के करते हैं और उनके पास कभी जो कुछ था उसे वापस लेने की जागरूकता के बिना करते हैं। लोग जब इस प्रकार खुद को शैतान को सौंप देते हैं और उसके प्रति वफादार हो जाते हैं तो क्या वे खुद पर कोई नियंत्रण बनाए रख सकते हैं? कदापि नहीं। वे पूरी तरह से और शत-प्रतिशत शैतान से नियंत्रित होते हैं। वे पूरी तरह से और सर्वथा इस दलदल में धँस जाते हैं और अपने आप को मुक्त कराने में असमर्थ रहते हैं(वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI)। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद आखिरकार मुझे एहसास हुआ कि मुझे शैतान ने प्रसिद्धि और लाभ के अनुसरण के गलत रास्ते पर खींच लिया था। शैतान सच में कपटी और दुष्ट है : वह पहले कुछ ऐसा इस्तेमाल करता है जो वैध लगता है, लोगों को अध्ययन करने और ज्ञान सीखने के लिए प्रेरित करता है और फिर सीखने की प्रक्रिया में, हमारी जानकारी के बिना वह लोगों के दिलों में तरह-तरह के शैतानी विचार और कथन भर देता है, जैसे कि “ज्ञान तुम्हारा भाग्य बदल सकता है,” “अन्य अनुसरण छोटे हैं, किताबें उन सबसे श्रेष्ठ हैं,” “भीड़ से ऊपर उठो और अपने पूर्वजों का नाम करो,” और “जो लोग अपने दिमाग से परिश्रम करते हैं, वे दूसरों पर शासन करते हैं और जो अपने हाथों से परिश्रम करते हैं, वे दूसरों के द्वारा शासित होते हैं।” ये विचार हमें ज्ञान की आराधना करने और प्रसिद्धि और लाभ का अनुसरण करने के लिए प्रेरित करते हैं, यह सोचते हुए कि उच्च शिक्षा प्राप्त करने से एक अच्छी नौकरी मिलेगी, पूर्वजों का नाम रोशन होगा और हम मेहनत के जीवन से बच सकेंगे। इसलिए मैंने सोचा कि विश्वविद्यालय जाकर मैं अपना भाग्य बदल सकती हूँ और जिसे लोग अच्छा जीवन कहते हैं, उसे पा सकती हूँ। मैंने अंकों और परीक्षा की रैंक पर ध्यान देना शुरू कर दिया और जब मेरी कोशिशों से अच्छे अंक नहीं आते थे तो मैं अक्सर निराश और हताश महसूस करती थी। भले ही कई बार मुझे लगता था कि एक छात्रा का जीवन खाली और उबाऊ है, या मुझे रैंक के लिए दूसरों से मुकाबला करने में पीड़ा महसूस होती थी, मैं फिर भी इस लक्ष्य के लिए दुख उठाने और मेहनत करने को तैयार थी, यह जाने बिना कि कैसे इससे मुक्त हुआ जाए और प्रतिरोध किया जाए। मैंने अपनी सहपाठिन के बारे में सोचा। वह अक्सर एक अच्छे विश्वविद्यालय में दाखिला पाने की कोशिश में देर रात तक जागकर पढ़ाई करती थी, लेकिन अत्यधिक चिंता के कारण उसे एक अजीब बीमारी हो गई। अंत में उसे ठीक होने के लिए छुट्टी लेनी पड़ी। फिर वह दोबारा परीक्षा देने वाला छात्र था जिसने कूदकर अपनी जान दे दी। दूसरों को यह सिर्फ कुछ अंकों का छोटा-सा अंतर लगा, लेकिन उसने उस अंक को अपनी जान से ज्यादा महत्व दिया। आखिरकार उसने कूदने का फैसला किया। यह भी प्रसिद्धि और लाभ के अनुसरण के कारण हुआ था। इन तथ्यों से मैंने लोगों को प्रसिद्धि और लाभ के अनुसरण में फँसाने के शैतान के बुरे इरादों को देखा। शैतान न केवल हमें परमेश्वर से दूर ले जाता है, बल्कि अपनी मर्जी से हमें सताता है और हमारे साथ खिलवाड़ भी करता है, जब तक कि अंत में वह हमें निगल नहीं जाता। अगर परमेश्वर इसे उजागर नहीं करता, तो मैं कभी भी साफ तौर पर यह नहीं देख पाती कि प्रसिद्धि और लाभ वे चालें हैं जिन्हें शैतान लोगों को भ्रष्ट करने के लिए इस्तेमाल करता है और मैं प्रसिद्धि और लाभ के लिए हर तरह की अनावश्यक कठिनाइयाँ सहती रहती और इसके अलावा मैं परमेश्वर से भटक जाती और उसके उद्धार पर दरवाजा बंद कर देती। मैंने दूसरों की प्रशंसा पाने के लिए दस साल से ज्यादा समय तक कड़ी मेहनत से पढ़ाई की थी और मैंने परमेश्वर में विश्वास करने की उपेक्षा की थी और यहाँ तक कि भूल भी गई थी। अगर परमेश्वर का प्रेम न होता, अगर उसने भाई-बहनों द्वारा मेरी मदद और मुझे कलीसियाई जीवन में लाने की व्यवस्था न की होती, तो पता नहीं मैं कब तक उलझन में भटकती रहती।

पिछले कुछ सालों में अपना कर्तव्य निभाकर और परमेश्वर के वचन पढ़कर, मैं ज्यादा से ज्यादा यह देखने लगी हूँ कि परमेश्वर में विश्वास करने का मार्ग ही जीवन का सही मार्ग है। परमेश्वर ने हम पर सत्य के सभी रहस्य प्रकट किए हैं, उदाहरण के लिए, मानवता आज जहाँ है वहाँ तक कैसे विकसित हुई है, लोग कहाँ से आते हैं और वे कहाँ जा रहे हैं, मानवता को शैतान ने कैसे भ्रष्ट किया है, इसका सत्य, भ्रष्ट स्वभावों का कैसे समाधान किया जाए और एक सच्ची मानवीय छवि को कैसे जिया जाए, परमेश्वर को कैसे जाना और उसकी आराधना की जाए, एक योग्य सृजित प्राणी कैसे बना जाए, वगैरह-वगैरह। परमेश्वर द्वारा व्यक्त किए गए सत्यों में मैंने जीवन की दिशा देखी है और मैंने अपने जीवन का मूल्य पाया है। मैं सच में आभारी हूँ कि परमेश्वर का उद्धार मुझ पर आया है, जिसने मुझे उसके सामने लौटने दिया है। परमेश्वर का धन्यवाद!

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गुओज़ी, संयुक्त राज्य अमेरिकामेरा जन्म एक ईसाई परिवार में हुआ था, और जब मैं एक वर्ष की थी, तो मेरी माँ ने लौटे हुए प्रभु यीशु—सर्वशक्तिमान...

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16. परमेश्वर के वचन मेरी शक्ति है

लेखिका जिंगनियाँ, कनाडामैंने बचपन से ही प्रभु में मेरे परिवार के विश्वास का अनुसरण किया है, अक्सर बाइबल को पढ़ा है और सेवाओं में हिस्सा लिया...

परमेश्वर का प्रकटन और कार्य परमेश्वर को जानने के बारे में अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन मसीह-विरोधियों को उजागर करना अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ सत्य के अनुसरण के बारे में सत्य के अनुसरण के बारे में न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन सत्य वास्तविकताएं जिनमें परमेश्वर के विश्वासियों को जरूर प्रवेश करना चाहिए मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 1) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 2) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 3) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 4) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 5) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 6) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 7) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 8) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 9) मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

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