67. अपने कर्तव्य में सही इरादे रखना अत्यंत महत्वपूर्ण है
सितंबर 2023 में, कलीसिया ने ली यांग और मुझे एक साथ मिलकर सिंचन कार्य का प्रबंधन सौंपा। क्योंकि हम दोनों ने यह कर्तव्य अभी-अभी करना शुरू किया था और काम से परिचित नहीं थे, इसलिए अगुआओं ने चेन लू को हमारी मदद करने के लिए कहा। चेन लू ने हमें काम के बारे में बताया। उसने कहा कि हमें हर कलीसिया में सिंचनकर्ताओं की स्थिति को समझना है, सिंचन कार्य की प्रगति का बार-बार जायजा लेना है, सिंचनकर्ताओं और नए लोगों की मुश्किलों और समस्याओं को हल करना है, अच्छी काबिलियत वाले नए लोगों को सींचने और विकसित करने पर ध्यान देना है और जो नए लोग नियमित रूप से सभाओं में शामिल नहीं हो रहे हैं, उनकी तुरंत सहायता और मदद करनी है। इतना ही नहीं, हमें सिंचन कार्य के नतीजों को बेहतर बनाने के लिए दर्शन से जुड़े सत्यों से खुद को लैस भी करना था। यह सुनने के बाद, मैंने सोचा, “इतने सारे कामों में माहिर होना है और उनका बारीकी से जायजा भी लेना है। इसमें निश्चित रूप से बहुत समय और मेहनत लगेगी।” मैंने अपने दिल में दबाव महसूस किया। लेकिन मैंने सोचा कि कलीसिया ने मेरे लिए इतना महत्वपूर्ण कर्तव्य करने की व्यवस्था की है। यह परमेश्वर का अनुग्रह और उत्कर्ष है और मैंने बहुत आभारी महसूस किया। मैं उसे निराश नहीं कर सकती थी। मुझे इस काम को करने में परमेश्वर पर निर्भर रहना था।
चूँकि मैं काम से परिचित नहीं थी और मुझे काम के हर पहलू को विस्तार से समझने की जरूरत थी, इसलिए कभी-कभी मैं बहुत देर तक जागती थी, लेकिन फिर भी मैंने अपना पूरा योगदान दिया। बाद में, मुझे एहसास हुआ कि इस कर्तव्य को अच्छी तरह से करने के लिए बहुत समय और मेहनत की जरूरत थी। जब नए लोगों को समस्याएँ या मुश्किलें होती थीं, तो उन्हें तुरंत हल करने की जरूरत होती थी। इसके अलावा, नियमित रूप से सभाओं में न आने वाले नए लोगों को तुरंत सहारा दिया जा रहा है या नहीं, नए लोगों की काबिलियत और समझ कैसी है और उन्हें विकसित करने का काम कैसा चल रहा है, इन जैसे सभी मामलों का विस्तार से जायजा लेने और उन्हें समझने की जरूरत थी। इन कामों को अच्छी तरह से पूरा करने के लिए, ली यांग और मैंने लगातार कई दिनों तक सुबह से लेकर रात तक काम किया। मेरा सिर भारी और सुन्न महसूस हो रहा था और मुझे हल्का सिरदर्द भी था, इसलिए मुझे दिल में थोड़ा प्रतिरोध महसूस हुआ। “यह कर्तव्य करना न केवल मानसिक रूप से, बल्कि शारीरिक रूप से भी थका देने वाला है। इस कर्तव्य को अच्छी तरह से करना वाकई आसान नहीं है! पहले मैं सिर्फ कलीसिया में लोगों को सींचती थी और काम की देखरेख के लिए जिम्मेदार नहीं थी। मुझे इतनी चिंता नहीं करनी पड़ती थी और मेरे पास अपना खाली समय भी होता था; वह अपेक्षाकृत आरामदायक था। लेकिन अब मैं इतनी सारी कलीसियाओं में सिंचन कार्य के लिए जिम्मेदार हूँ और यह पहले की तुलना में बहुत ज्यादा चिंताजनक और थकाऊ है।” मैं जितना ज्यादा इस बारे में सोचती, उतनी ही ज्यादा घुटन महसूस करती। मैं अब यह कर्तव्य नहीं करना चाहती थी और वापस जाकर सिंचनकर्ता बनना चाहती थी। मेरे मन में अपने कर्तव्य से जी चुराने का खयाल आने लगा। मैंने मन में हिसाब लगाया, “मैं बस कह दूँगी कि मेरी काबिलियत अच्छी नहीं है और मैं यह काम नहीं कर सकती। मैं यह कर्तव्य बहुत लंबे समय से नहीं कर रही हूँ और मैंने ज्यादा काम भी नहीं सँभाला है, इसलिए मेरा कर्तव्य बदले जाने के बाद काम सौंपना आसान होगा। अगर मैंने सारा काम सँभाल लिया, तो मेरे लिए कर्तव्य में बदलाव का प्रस्ताव रखना ज्यादा मुश्किल हो जाएगा।” इसलिए, मैंने पहले की तरह लगन से अपना कर्तव्य करना बंद कर दिया। मैं नए लोगों को सींचने की प्रगति का जायजा लेने में धीमी हो गई और जानबूझकर टालमटोल करने और चीजों को खींचने लगी ताकि अगुआओं को लगे कि मैं काम करने में अकुशल हूँ और इस कर्तव्य के लायक नहीं हूँ। इस तरह, जब मैं अपना इस्तीफा दूँगी तो वे मान जाएँगे। उस समय, चेन लू कई अन्य कलीसियाओं के काम का भी जायजा ले रही थी, इसलिए ली यांग और मुझे उन जिम्मेदारियों को सँभालने के लिए स्थिति से जल्द परिचित होने की जरूरत थी जिन्हें चेन लू सँभाल रही थी। जब चेन लू ने हमें इन कलीसियाओं की स्थिति के बारे में बताया, तो मुझे डर था कि एक बार जब मैं स्थिति को समझ जाऊँगी और काम की जिम्मेदारी मुझे सौंप दी जाएगी, तो मेरे लिए इस्तीफा देना और भी मुश्किल हो जाएगा। इसलिए, मैंने व्यस्त होने का बहाना बनाकर काम से खुद को परिचित नहीं किया। कभी-कभी, मुझे आत्म-ग्लानि महसूस होती और मैं सोचती, “मुझे इन कामों को जल्द से जल्द सँभाल लेना चाहिए, लेकिन मैंने काम को सँभालने में इसलिए जल्दी नहीं की क्योंकि मैं खुद को कष्ट और थकावट से बचाना चाहती थी। यह तो कलीसिया के काम की रक्षा करना नहीं है! लेकिन अगर मैं इन कामों से परिचित हो गई तो मैं जा नहीं पाऊँगी और मेरी देह को कष्ट होगा। वैसे भी, अगर मैं इसे नहीं सँभालती, तो ली यांग सँभाल लेगा। इसके अलावा, चेन लू दूसरे कामों के साथ-साथ इसमें भी मदद कर रही है, इसलिए ऐसा भी नहीं है कि इन कामों को करने वाला कोई नहीं रहेगा।” जब मैंने ऐसा सोचा, तो मुझे आत्म-ग्लानि महसूस होनी बंद हो गई। बाद में, जब ली यांग और चेन लू काम पर चर्चा कर रहे होते, तो मैं उसमें शामिल नहीं होना चाहती थी। मैं एक बाहरी इंसान की तरह थी। भले ही मुझे पता था कि सिंचन कार्य में समस्याएँ आ गई हैं, मैंने उन्हें हल करने के तरीके खोजने की कोशिश नहीं की; मैं बस यही सोच रही थी कि जल्द से जल्द कैसे चली जाऊँ। चूँकि मैंने अभी तक उन कलीसियाओं की स्थिति को नहीं समझा था, इसलिए सारा काम ली यांग पर आ पड़ा। वह अकेले सब कुछ नहीं सँभाल पा रहा था और भारी दबाव के कारण वह दिन भर आहें भरता रहता था। जब मैंने ली यांग को बुरी दशा में देखा, तभी मुझे बहुत बुरा लगा। मैंने सोचा, “ली यांग की बुरी दशा का मुझसे लेना-देना है। अगर मैं बोझ उठा पाती और थोड़ी-सी जिम्मेदारी निभाती, तो वह अकेले इतना व्यस्त नहीं होता और काम के नतीजे भी बेहतर होते। अब सिंचन कार्य के नतीजे अच्छे नहीं हैं और ऐसे नए लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है जो नियमित रूप से सभाओं में शामिल नहीं हो रहे हैं। अच्छी काबिलियत वाले नए लोगों को समय पर सींचा और विकसित नहीं किया जा रहा है और उनके जीवन प्रवेश को नुकसान पहुँच रहा है। यह सब मेरी ही की हुई बुराई है!”
इसके बाद, मैंने आत्म-चिंतन करना शुरू किया : मैं इस कर्तव्य का इतना प्रतिरोध क्यों कर रही थी? मैंने परमेश्वर के उन वचनों के बारे में सोचा जो यह उजागर करते हैं कि कैसे लोग अपना कर्तव्य करते समय, हमेशा आसान काम चुनते हैं और कठिनाई से कतराते हैं और मैंने उन्हें पढ़ने के लिए खोजा। परमेश्वर कहता है : “कर्तव्य निभाते समय लोग हमेशा हल्का कार्य चुनते हैं, ऐसा कार्य जो थकाऊ न हो और जिसमें बाहर जाकर मौसम की मार सहना शामिल न हो। इसे आसान काम चुनना और कठिन कामों से भागना कहा जाता है, यह दैहिक सुखों का लालच करने की अभिव्यक्ति है। और क्या? (अगर कर्तव्य थोड़ा कठिन, थोड़ा थका देने वाला हो, अगर उसमें कीमत चुकानी पड़े, तो हमेशा शिकायत करना।) (भोजन और वस्त्रों की चिंता और दैहिक आनंदों में लिप्त रहना।) ये सभी दैहिक सुखों का लालच करने की अभिव्यक्तियाँ हैं। जब ऐसे लोग देखते हैं कि कोई कार्य बहुत श्रमसाध्य या जोखिम भरा है, तो वे उसे किसी और पर थोप देते हैं; खुद वे सिर्फ आसान काम करते हैं और यह कहते हुए बहाने बनाते हैं कि उनकी काबिलियत कम है, उनमें उस कार्य को करने की क्षमता नहीं है और वे उस कार्य का बोझ नहीं उठा सकते—जबकि वास्तव में, इसका कारण यह होता है कि वे दैहिक सुखों का लालच करते हैं। ... कलीसिया का काम या उनके कर्तव्य कितने भी व्यस्ततापूर्ण क्यों न हों, उनके जीवन की दिनचर्या और सामान्य स्थिति कभी बाधित नहीं होती। जब उनके दैहिक जीवन की छोटी से छोटी चीज की बात आती है, तो वे कभी लापरवाह नहीं होते, वे इन चीजों को सटीक तरीके से व्यवस्थित करते हैं और इस मामले में बहुत सख्त और गंभीर होते हैं। लेकिन, जब परमेश्वर के घर के काम की बात आती है, मामला चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो और भले ही उसमें भाई-बहनों की सुरक्षा शामिल हो, वे उससे लापरवाही से निपटते हैं। यहाँ तक कि वे उन चीजों की भी परवाह नहीं करते हैं, जिनमें परमेश्वर का आदेश या वह कर्तव्य शामिल होता है, जिसे उन्हें करना चाहिए। वे बिल्कुल भी कोई जिम्मेदारी नहीं लेते हैं। यह देह के सुखों में लिप्त होना है, है न? क्या दैहिक सुखों में लिप्त लोग कोई कर्तव्य करने के लिए उपयुक्त होते हैं? जैसे ही कोई उनसे कर्तव्य करने या कीमत चुकाने और कष्ट सहने की बात करता है, तो वे इनकार में सिर हिलाते रहते हैं। उन्हें बहुत सारी कठिनाइयाँ होती हैं, वे शिकायतों से भरे होते हैं, और वे नकारात्मकता से भरे होते हैं। ऐसे लोग निकम्मे होते हैं, वे अपने कर्तव्य करने की योग्यता नहीं रखते और उन्हें हटा दिया जाना चाहिए” (वचन, खंड 5, अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ, अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ (2))। परमेश्वर के वचनों के इस अंश को पढ़कर, मैं आत्म-ग्लानि से भर गई। अपना कर्तव्य करते समय, मैंने हमेशा आसान काम चुना और जैसे ही काम मेहनत वाला हो जाता, मैं उसे दूसरों पर धकेलना चाहती थी, जबकि खुद आसान काम करती थी। मैंने यह कहकर बहाने भी बनाए कि मेरी काबिलियत खराब है, जबकि असल में मैं सिर्फ आराम में लिप्त रहना चाहती थी। परमेश्वर कहता है कि ऐसे लोगों में कोई समर्पण या परमेश्वर का भय नहीं होता और वे आराम में लिप्त रहने के लिए किसी भी समय अपना कर्तव्य छोड़ सकते हैं। वे कर्तव्य करने के लायक नहीं हैं और उन्हें हटा दिया जाना चाहिए। मैंने अपने कर्तव्यों में किए गए हर काम के बारे में सोचा : जब अगुआओं ने मेरे लिए एक पर्यवेक्षक बनने की व्यवस्था की, तो जैसे ही मुझे एहसास हुआ कि मैं बहुत सारी कलीसियाओं के लिए जिम्मेदार हूँ, काम का बोझ बहुत है, हर दिन व्यस्त रहती हूँ, कभी-कभी देर रात तक जागना पड़ता है और यह कर्तव्य मानसिक और शारीरिक रूप से बहुत थकाऊ है, तो मैंने सोचा कि हर दिन यह कर्तव्य करना बहुत ज्यादा मेहनत वाला और थकाऊ है और अपनी देह के आराम के लिए इस्तीफा देने के बारे में सोचा। मैं अच्छी तरह से जानती थी कि यह कर्तव्य अत्यंत महत्वपूर्ण है और मुझे जल्द से जल्द काम सँभाल लेना चाहिए, लेकिन मुझे डर था कि अगर मैंने बहुत ज्यादा काम सँभाल लिया, तो मैं जा नहीं पाऊँगी। इसलिए, मैंने जानबूझकर टालमटोल और लापरवाही की, अगुआओं को यह दिखाने की कोशिश की कि मेरी काबिलियत खराब है और मैं इस काम के लायक नहीं हूँ ताकि वे मेरे इस्तीफे को स्वीकार कर लें। जब चेन लू हमें काम से परिचित कराने में मदद कर रही थी, तो मैंने जानबूझकर बहुत व्यस्त होने का नाटक किया और भाग नहीं लिया। नतीजतन, सारा काम ली यांग पर आ पड़ा, जिससे वह बहुत दबाव में आ गया और उसकी दशा खराब हो गई। काम में समस्याएँ बढ़ती जा रही थीं और नए लोगों को सींचने के नतीजे भी अच्छे नहीं थे। कलीसिया के काम को यह सारा नुकसान मेरे आराम में लिप्त रहने और मुश्किल कामों से बचते हुए आसान काम चुनने के कारण हुआ था। पिछले दो पर्यवेक्षक पहले ही सिंचन कार्य में देरी कर चुके थे और उन्हें बर्खास्त कर दिया गया था और ऐसे नाजुक मौके पर, कलीसिया ने मेरे लिए यह कर्तव्य करने की व्यवस्था की थी, जो परमेश्वर द्वारा मेरा उत्कर्ष था। मुझे उसके इरादों के प्रति विचारशील होना चाहिए था और कलीसिया के काम की रक्षा करनी चाहिए थी। लेकिन, मुझमें जरा भी जमीर नहीं था। जैसे ही काम ज्यादा हुआ और मेरी देह को आराम नहीं मिल सका, तो मैंने प्रतिरोध महसूस किया और एक आसान कर्तव्य के बदले में अपना कर्तव्य छोड़ने के हर संभव प्रयास किए। मैंने काम में देरी होते देखी, लेकिन मैंने उसकी रक्षा नहीं की। मैं कितनी कपटी, दुष्ट और नीच थी! असल में, ऐसा नहीं था कि मैं काम नहीं कर सकती थी। बल्कि समस्या यह थी कि मेरी प्रकृति बहुत स्वार्थी थी और मैं वे काम भी नहीं करती थी जो मैं कर सकती थी; मैंने परमेश्वर के प्रति बिल्कुल भी वफादारी नहीं दिखाई और अहम मौके पर बेकार थी। मैं सचमुच किसी काम की नहीं थी, कर्तव्य करने के लायक नहीं थी! जब मैं यह समझ गई, तो मेरा दिल आत्म-ग्लानि और संताप से भर गया और मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की कि वह देह के खिलाफ विद्रोह और समर्पण करने में मेरी अगुआई करे और अब मैं अपना कर्तव्य चुनना बंद कर दूँ।
बाद में, मैंने परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा और अपनी समस्या के बारे में कुछ समझ हासिल की। परमेश्वर कहता है : “तो फिर, भ्रष्ट मानवजाति का जीवन को लेकर क्या दृष्टिकोण है? इसे इस तरह कहा जा सकता है : ‘हर व्यक्ति अपनी सोचे बाकियों को शैतान ले जाए।’ सभी लोग अपने लिए जीते हैं; सरल तरीके से कहें तो वे देह के लिए जी रहे हैं और वे केवल अपने मुँह में भोजन डालने के लिए जीते हैं। उनका यह अस्तित्व पशुओं के अस्तित्व से किस तरह भिन्न है? इस तरह जीने का कोई मूल्य नहीं है, उसका कोई अर्थ होने की तो बात ही छोड़ दो। जीवन पर व्यक्ति का दृष्टिकोण इस बारे में होता है कि दुनिया में जीने के लिए वह किस पर भरोसा करता है, वह किस उद्देश्य के लिए जीता है और किस तरह जीता है—और ये सभी मानव-प्रकृति के भीतर अनिवार्य चीजें हैं। लोगों की प्रकृति का गहन-विश्लेषण करके तुम देखोगे कि सभी लोग परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं। वे सभी दानव हैं और वास्तव में कोई भी अच्छा व्यक्ति नहीं है। केवल लोगों की प्रकृति का गहन-विश्लेषण करके ही तुम वास्तव में उनकी भ्रष्टता और सार को जान सकते हो और समझ सकते हो कि लोग वास्तव में क्या हैं, उनमें वास्तव में क्या कमी है, उन्हें किस चीज से लैस होना चाहिए, और उन्हें मानव के समान कैसे जीना चाहिए। व्यक्ति की प्रकृति का वास्तव में गहन-विश्लेषण कर पाना आसान नहीं है, और वह परमेश्वर के वचनों का अनुभव किए बिना या वास्तविक अनुभव प्राप्त किए बिना नहीं किया जा सकता” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, स्वभावगत परिवर्तन के बारे में क्या जानना चाहिए)। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद, मैं समझ गई कि “हर व्यक्ति अपनी सोचे बाकियों को शैतान ले जाए,” “चार दिन की जिंदगी है, मौज कर लो,” और “मदिरा का स्वाद लेने और संगीत का आनंद उठाने में, जीवन वास्तव में कितना समय देता है?” जैसे शैतानी नियम मुझमें जड़ जमा चुके थे और मेरी प्रकृति बन गए थे। ऐसी सोच और विचारों से नियंत्रित होकर, मैंने अपने हर काम में स्वार्थ को ही अपना सिद्धांत बना लिया था और केवल इस बात पर विचार करती थी कि मेरी देह को आराम मिल पाएगा या नहीं। मेरा मानना था कि अगर मेरी देह को कष्ट नहीं होता, तो यह एक आशीष है। मैं ऐसा कुछ भी करती जो मेरी देह के लिए फायदेमंद होता और ऐसा कुछ भी नहीं करती जो उसके लिए फायदेमंद नहीं होता; मैं कभी भी अपने साथ बुरा बर्ताव नहीं करती थी। जब सिंचन कार्य की जिम्मेदारी के लिए मेरी देह को कष्ट सहने की जरूरत थी, तो मुझे थकावट और चिंता पसंद नहीं थी और मैं एक हल्का कर्तव्य करना चाहती थी। मैं अच्छी तरह से जानती थी कि सिंचन कार्य पर असर पड़ा है और मुझे जल्द से जल्द काम से परिचित होकर कर्तव्य सँभाल लेना चाहिए था, लेकिन मुझे चिंता थी कि अगर मैंने कर्तव्य सँभाल लिया तो इस्तीफा देना मुश्किल हो जाएगा और इसलिए मैं सिंचन कार्य में देरी होते देखती रही, ठीक एक ऐसे बाहरी इंसान की तरह जिसे कोई परवाह न हो। कलीसिया ने मेरे लिए यह कर्तव्य करने की व्यवस्था की थी, यह परमेश्वर द्वारा मेरा उत्कर्ष था, लेकिन मैं लगातार इससे जी चुराने के बारे में सोचती रही। इसके कारण सिंचन कार्य में खराब नतीजे आए और नए लोगों के जीवन की प्रगति में देरी हुई। यह बुराई और परमेश्वर का प्रतिरोध करना था और यह उसे घृणास्पद लगता है!
बाद में मैंने परमेश्वर के कुछ वचन पढ़े और मुझे एहसास हुआ कि हमेशा दैहिक सुखों में लिप्त रहने के गंभीर नतीजे होंगे। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “जिसमें तुम आज लिप्त हो वही चीज तुम्हारे भविष्य को बरबाद कर रही है, जबकि आज तुम जो पीड़ा सहते हो वही चीज तुम्हारी सुरक्षा कर रही है। तुम्हें इन चीजों का स्पष्ट रूप से पता होना चाहिए ताकि तुम उन प्रलोभनों का शिकार होने से बच सको जिनसे बाहर निकलना तुम्हें कठिन लगेगा और ताकि तुम घने कोहरे में गलती से घुसने और फिर कभी सूर्य को न खोज पाने से बच सको। जब घना कोहरा छँटेगा, तुम अपने आपको महान दिन के न्याय के मध्य पाओगे” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, सुसमाचार को फैलाने का कार्य मनुष्य को बचाने का कार्य भी है)। “मनुष्य की देह साँप के समान है : इसका सार मनुष्य के जीवन को हानि पहुँचाना है। जब तुम्हारी देह पूरी तरह से मनमानी करने लगती है तो तुम अपने जीवन से हाथ धो बैठते हो। देह शैतान की है। इसके भीतर हमेशा असंयमित इच्छाएँ होती हैं; यह हमेशा अपने लिए सोचती है, हमेशा आराम की इच्छा रखती है और सुख में लिप्त रहना चाहती है, चिंता या तात्कालिकता की भावना के बिना होती है और निष्क्रियता में लिप्त रहती है। अगर तुम इसे एक निश्चित बिंदु तक संतुष्ट करते हो तो यह अंततः तुम्हें निगल जाएगी। कहने का अर्थ है कि यदि तुम इसे इस बार संतुष्ट करोगे तो अगली बार यह फिर खुद को संतुष्ट करने की माँग करेगी। इसकी हमेशा असंयमित इच्छाएँ और नई माँगें रहती हैं और यह तुम्हारे द्वारा देह को खुश करने के प्रयासों का लाभ उठाती है ताकि तुम इसे और अधिक संजोने और इसके आराम में रहने के लिए जुट जाओ—और यदि तुम इस पर कभी जीत नहीं हासिल करोगे, तो तुम अंततः स्वयं को बरबाद कर लोगे। तुम परमेश्वर के सामने जीवन हासिल कर सकते हो या नहीं और तुम्हारा अंतिम परिणाम क्या होगा, यह इस बात पर निर्भर करता है कि तुम देह के खिलाफ विद्रोह करने का अभ्यास कैसे करते हो। परमेश्वर ने तुम्हें बचाया है और तुम्हें चुना और पूर्वनिर्धारित किया है, फिर भी यदि आज तुम उसे संतुष्ट करने के अनिच्छुक हो, सत्य को अभ्यास में लाने के अनिच्छुक हो और एक सच्चे परमेश्वर-प्रेमी हृदय के साथ अपनी देह के खिलाफ विद्रोह करने के अनिच्छुक हो तो तुम अंततः खुद को नष्ट कर दोगे और इस प्रकार अत्यंत पीड़ा सहोगे। यदि तुम सदा देह में लिप्त रहते हो, तो शैतान धीरे-धीरे तुम्हें निगल जाएगा और तुम्हें जीवन या आत्मा के स्पर्श से रहित छोड़ देगा, जब तक वह दिन नहीं आता है जब तुम भीतर से पूरी तरह अंधकारमय हो जाते हो। जब तुम अंधकार में जिओगे तो तुम्हें शैतान के द्वारा बंदी बना लिया जाएगा, तुम्हारे हृदय में परमेश्वर का कोई स्थान नहीं रहेगा और उस समय तुम परमेश्वर के अस्तित्व को नकार दोगे और उसे छोड़ दोगे” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, केवल परमेश्वर से प्रेम करना ही वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करना है)। परमेश्वर के वचनों से, मैंने देखा कि अगर तुम लगातार देह को संजोकर रखते हो और शारीरिक सुख-सुविधाओं में लिप्त रहते हो, तो तुम धीरे-धीरे शैतान द्वारा निगल लिए जाओगे। अंत में, ऐसे सभी लोगों की निंदा की जाएगी और उन्हें परमेश्वर द्वारा हटा दिया जाएगा। मुझे एहसास हुआ कि मैं गंभीर खतरे में थी। मैंने उस समय के बारे में सोचा जब मैंने पहली बार यह कर्तव्य करना शुरू किया था। मुझमें अभी भी परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशीलता दिखाने की कुछ इच्छा थी और जब मैं नकारात्मक होती और लापरवाही करती, तो मुझे थोड़ी आत्म-ग्लानि महसूस होती थी। बाद में, जब मैं देह में फँस गई, तो मैं केवल यही सोचती थी कि देह के कष्ट और थकावट से कैसे बचा जाए और दूसरे कर्तव्य में बदलने के लिए जल्द से जल्द इस्तीफा देना चाहती थी। मैंने जानबूझकर धीरे-धीरे काम किया और अक्षम होने का नाटक किया, इस डर से कि अगर मैंने अपना काम अच्छी तरह से किया तो मैं अपना कर्तव्य नहीं छोड़ पाऊँगी। आखिरकार, इसके कारण सिंचन कार्य में कई समस्याएँ पैदा हुईं और नए लोगों के जीवन प्रवेश को गंभीर रूप से नुकसान पहुँचा। भले ही मेरी देह संतुष्ट थी, लेकिन उस महत्वपूर्ण मोड़ पर जब कलीसिया के काम के लिए लोगों की तत्काल जरूरत थी, मैंने परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशीलता नहीं दिखाई और वे कर्तव्य नहीं किए जो मुझे करने चाहिए थे। इसके बजाय, मैंने सिर्फ भाग जाने के बारे में सोचा और अपने पीछे अपराध छोड़ दिए। अपने कर्तव्य के साथ इस तरह का व्यवहार करके, मैंने परमेश्वर के साथ विश्वासघात किया! मैंने परमेश्वर के वचनों के बारे में सोचा : “यह पूरी तरह से स्वाभाविक और उचित है कि मनुष्य परमेश्वर द्वारा सौंपे जाने वाले आदेशों को पूरा करे। यह मनुष्य का सर्वोच्च दायित्व है और उतना ही महत्वपूर्ण है जितना उसका जीवन है। यदि तुम परमेश्वर के आदेशों के साथ हल्के में पेश आते हो, तो यह परमेश्वर के साथ अत्यन्त भयंकर विश्वासघात है। ऐसा करने में तुम यहूदा से भी अधिक शोचनीय हो और तुम्हें शाप दिया जाना चाहिए” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, मनुष्य की प्रकृति को कैसे जानें)। मुझे एहसास हुआ कि अपने कर्तव्य के प्रति लापरवाह और बेपरवाह तरीके से व्यवहार करने से कलीसिया के काम को नुकसान होता है। यह परमेश्वर के साथ एक गंभीर विश्वासघात है और यही वह चीज है जिससे परमेश्वर सबसे ज्यादा नफरत करता है। अंत में, तुम्हारी निश्चित रूप से निंदा की जाएगी और तुम्हें हटा दिया जाएगा। मेरे दिल में डर पैदा हो गया और आखिरकार मैंने साफ-साफ देख लिया कि देह के आराम के पीछे भागना विपत्ति लाता है, आशीष नहीं और देह के प्रति विचारशीलता दिखाना सचमुच मेरी जान ले सकता है। अगर मैं पश्चात्ताप नहीं करती और शारीरिक सुख-सुविधाओं के पीछे भागती रहती, तो शैतान की तरह, मैं भी परमेश्वर द्वारा नष्ट कर दी जाती! मैं अब और शैतानी जहरों के सहारे नहीं जी सकती थी और मुझे अपना कर्तव्य अच्छी तरह से करने के लिए देह के खिलाफ विद्रोह करना था और परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार अभ्यास करना था।
परमेश्वर ने नूह को जो आदेश दिया था उसके प्रति नूह का रवैया याद आया, तो मैंने पढ़ने के लिए परमेश्वर के वचन खोजे। परमेश्वर कहता है : “जहाज बनाने की पूरी प्रक्रिया कठिनाइयों से भरी थी। फिलहाल, आओ इस बात को एक तरफ रखते हैं कि नूह ने साल-दर-साल तेज हवाओं, चिलचिलाती धूप, भीषण बारिश, भयंकर सर्दी-गर्मी और चार बदलते मौसमों से कैसे पार पाया। आओ, पहले यह बात करते हैं कि जहाज बनाना कितना विराट उपक्रम था, विभिन्न सामग्रियों की उसकी तैयारी क्या थी और जहाज के निर्माण के दौरान उसे किन बेशुमार कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। ... तमाम तरह की परेशानियों, कठिन स्थितियों और चुनौतियों का सामना करते हुए, नूह कभी पीछे नहीं हटा। यहाँ तक कि जब उसके कुछ अधिक कठिन इंजीनियरिंग कार्य बार-बार विफल हुए और चीजें क्षतिग्रस्त हुईं, तो भले ही नूह ने अपने दिल में परेशान और चिंतित महसूस किया, फिर भी जब वह परमेश्वर के वचनों के बारे में सोचता, जब वह परमेश्वर के आदेश के हर एक शब्द के बारे में और यह सोचता कि कैसे परमेश्वर ने उसे ऊँचा उठाया है, तो अक्सर बेहद प्रेरित महसूस करता : ‘मैं हार नहीं मान सकता, परमेश्वर ने मुझे जो आज्ञा दी है और जो कार्य मुझे सौंपा है, मैं उसे छोड़ नहीं सकता; यह परमेश्वर का आदेश है और चूँकि मैंने इसे स्वीकार किया है, मैंने परमेश्वर के वचन और उसकी वाणी सुनी है, चूँकि मैंने इसे परमेश्वर से स्वीकार किया है, तो मुझे पूरी तरह से समर्पण करना चाहिए और यही वह है जिसे मनुष्य को हासिल करना चाहिए।’ इसलिए चाहे उसे कैसी भी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, किसी भी तरह के उपहास या बदनामी का सामना करना पड़ा, उसका शरीर कितना भी कमजोर हुआ, कितना भी थका, लेकिन उसने परमेश्वर द्वारा सौंपा गया काम नहीं छोड़ा, उसने परमेश्वर की कही हर बात और आज्ञा को लगातार दिलो-दिमाग में रखा। चाहे उसके परिवेश जैसे भी बदले, चाहे उसने कैसी भी भयंकर कठिनाइयों का सामना किया, उसे भरोसा था कि इनमें से कुछ भी हमेशा नहीं रहेगा, कि केवल परमेश्वर के वचन ही कभी भी समाप्त नहीं होंगे और केवल वही जो परमेश्वर ने करने की आज्ञा दी है, निश्चित रूप से पूरा होगा। नूह को परमेश्वर में सच्ची आस्था थी और उसमें वह समर्पण था जो उसमें होना चाहिए था, उसने वह जहाज बनाना जारी रखा जिसके निर्माण के लिए परमेश्वर ने उसे आदेश दिया था। दिन गुजरते गए, साल गुजरते गए और नूह बूढ़ा हो गया, लेकिन उसका विश्वास कम नहीं हुआ, परमेश्वर का आदेश पूरा करने के उसके रवैये और दृढ़-संकल्प में कोई बदलाव नहीं आया। यद्यपि ऐसा भी समय आया जब उसका शरीर थकने लगा और उसने शक्तिहीन महसूस किया, वह बीमार पड़ गया, दिल से वह कमजोर हो गया, लेकिन परमेश्वर के आदेश को पूरा करने और उसके वचनों के प्रति समर्पण करने का उसका संकल्प और दृढ़ता कम नहीं हुई। जिन वर्षों में नूह ने जहाज बनाया, उनमें वह परमेश्वर द्वारा कहे गए वचनों को सुनने और उनके प्रति समर्पण करने का अभ्यास कर रहा था, वह उस महत्वपूर्ण सत्य का अभ्यास भी कर रहा था जो परमेश्वर का आदेश पूरा करने के लिए एक सृजित प्राणी और साधारण व्यक्ति को अवश्य करना चाहिए” (वचन, खंड 4, मसीह-विरोधियों को उजागर करना, अनुपूरक तीन : कैसे नूह और अब्राहम ने परमेश्वर के वचनों का पालन किया और उसके प्रति समर्पण किया (भाग दो))। इस अंश को पढ़ने के बाद, मैं बेहद शर्मिंदा हुई। जब परमेश्वर ने नूह को जहाज बनाने के लिए कहा, तो नूह जानता था कि यह कितना मुश्किल होगा और यह भी जानता था कि जहाज बनाने के लिए बहुत मेहनत करनी होगी और बड़ी कीमत चुकानी होगी। लेकिन चाहे कितनी भी बड़ी मुश्किलें क्यों न हों, नूह ने फिर भी बिना किसी व्यक्तिगत पसंद के परमेश्वर का आदेश स्वीकार किया। उसने अपने हितों पर विचार नहीं किया और सरल हृदय से परमेश्वर के प्रति समर्पण किया, उसके आदेश को स्वीकार किया और परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार जहाज बनाने के लिए अपनी पूरी कोशिश की। एक सौ बीस साल तक लगे रहने के बाद, उसने आखिरकार जहाज पूरा कर लिया। नूह ने बिना किसी समझौते के परमेश्वर के आदेश को स्वीकार किया, वह वफादार और समर्पित था। उसकी मानवता बहुत अच्छी थी! नूह की तुलना में, मुझमें मानवता की बहुत कमी थी। अगर मैं अब इन छोटी-मोटी मुश्किलों को भी नहीं सह सकती हूँ और एक आसान कर्तव्य चुनना चाहती हूँ, तो मैं सचमुच इंसान कहलाने के भी लायक नहीं हूँ।
बाद में मैंने परमेश्वर के और वचन पढ़े और परमेश्वर के इरादे के बारे में कुछ समझ हासिल की। परमेश्वर कहता है : “परमेश्वर के वचनों को खाना और पीना, प्रार्थना करना और प्रशिक्षण लेना, परमेश्वर के बोझ को स्वीकार करना और उस आदेश को स्वीकार करना जो उसने तुम्हें सौंपा है—यह सब इसलिए है ताकि तुम्हारे पास आगे बढ़ने का एक मार्ग हो। परमेश्वर के आदेश के प्रति तुम्हारा बोझ जितना अधिक होगा, तुम्हारे लिए उसके द्वारा पूर्ण बनाया जाना उतना ही आसान होगा। कुछ लोग तो परमेश्वर की सेवा में दूसरों के साथ सहयोग करने के इच्छुक ही नहीं होते, जबकि वे बुलाए जाते हैं; ये आलसी लोग हैं जो केवल आराम की लालसा रखते हैं। तुमसे जितना अधिक दूसरों के साथ सेवा में सहयोग करने का आग्रह किया जाएगा, तुम उतने ही अधिक अनुभव प्राप्त करोगे। अधिक बोझ और अधिक अनुभव होने के कारण, तुम्हारे पास पूर्ण बनाए जाने के अधिक अवसर होंगे। इसलिए, यदि तुम सच्चे मन से परमेश्वर की सेवा कर सको, तो तुम परमेश्वर के बोझ के प्रति विचारशील रहोगे; और इस तरह तुम्हारे पास परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने के अधिक अवसर होंगे। ऐसे ही मनुष्यों के एक समूह को इस समय पूर्ण बनाया जा रहा है” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, पूर्णता प्राप्त करने के लिए परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशील रहो)। परमेश्वर ने अनुग्रह करते हुए मुझे अपना कर्तव्य निभाने के लिए प्रशिक्षित होने का अवसर दिया ताकि मैं सत्य पा सकूँ और पूर्ण बनाई जा सकूँ। मुझे इसे संजोकर रखना था! भले ही सिंचन कार्य को सँभालना व्यस्तता से भरा और थकाऊ है, लेकिन सत्य पाने और परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने के बहुत सारे अवसर हैं। भले ही मेरे पिछले कर्तव्य ज्यादा आरामदायक और सुकून भरे थे, मेरे सामने कम समस्याएँ आती थीं, जिसका मतलब था कि सत्य खोजने के अवसर भी कम थे और मेरे जीवन में प्रगति धीमी थी। अब जाकर मैंने अनुभव किया कि परमेश्वर क्यों चाहता है कि लोग अपनी देह के खिलाफ विद्रोह करें और ज्यादा बोझ उठाएँ; इसमें परमेश्वर का कितना ज्यादा प्रेम समाया हुआ है। जब मैंने अपनी मानसिकता बदली, तो भले ही मेरा कर्तव्य थोड़ा ज्यादा व्यस्त था, मुझे कष्ट महसूस नहीं हुआ और मैं पूरे दिल से समर्पण करने और इस कर्तव्य को स्वीकार करने के लिए तैयार थी। मैंने सक्रिय रूप से पहल करके काम से खुद को परिचित कराना शुरू कर दिया और जो कुछ भी मुझे नहीं आता था, उसके बारे में मैंने खुद जाकर चेन लू से पूछा। अब और देरी करने की मेरी हिम्मत नहीं हुई, मुझे डर था कि अगर चेन लू दूसरे कर्तव्य करने चली गई और उससे पहले मैं यह नहीं समझ पाई कि कलीसियाओं में क्या चल रहा है, तो काम में देरी हो जाएगी। बाद में, ली यांग और मैंने मिलकर समय पर काम का जायजा लिया और सिंचन कार्य के नतीजे पहले से बेहतर हो गए। नए लोग सक्रिय रूप से सभाओं में शामिल हो रहे थे और कर्तव्य निभाने और सुसमाचार का प्रचार करने के लिए भी तैयार थे।
कुछ समय बाद, हम काम से परिचित हो गए थे और अगुआओं ने मुझसे और ली यांग से अपने काम का बँटवारा करने के लिए कहा, जिसमें हममें से प्रत्येक कुछ कलीसियाओं के लिए जिम्मेदार होगा। ऐसा करने से, हम काम का और ज्यादा बारीकी से जायजा ले पाते। काम का बँटवारा करने के बाद, मैंने देखा कि जिन कलीसियाओं के सिंचन कार्य के लिए मैं जिम्मेदार थी उनके नतीजे अच्छे नहीं थे। बहुत-से नए लोग नियमित रूप से सभाओं में शामिल नहीं हो रहे थे और सिंचनकर्ताओं की कमी थी। जिन कलीसियाओं की जिम्मेदारी ली यांग पर थी, वे बेहतर थीं और उनमें बहुत-से सिंचनकर्ता थे, इसलिए उसका कर्तव्य थोड़ा ज्यादा आसान था। जब मैंने काम के बँटवारे के बाद कलीसियाओं की दशा देखी, तो मैं इन कलीसियाओं को नहीं सँभालना चाहती थी, मुझे लगा कि जैसे ही मैं यह करूँगी, मैं पहले से भी ज्यादा व्यस्त और थकी हुई हो जाऊँगी। लेकिन, जब मैंने सोचा कि ली यांग उन कलीसियाओं से ज्यादा परिचित था और इस तरह से कामों का बँटवारा करने से काम का जायजा लेने में सुविधा होगी, तो मैंने समर्पण कर दिया। बाद में, सुसमाचार सुनने के बाद और भी नए लोग आने लगे, जिन्हें तुरंत सींचे जाने की जरूरत थी, लेकिन जिन कलीसियाओं के सिंचन कार्य के लिए मैं जिम्मेदार थी, उनमें सिंचनकर्ताओं की कमी थी। मुझे अपने काम पर सामान्य से कहीं ज्यादा समय और ऊर्जा खर्च करनी पड़ी और जब मैंने देखा कि ली यांग उतना व्यस्त नहीं है, तो मुझे उसके साथ काम का बँटवारा करने पर पछतावा हुआ। इस समय मुझे एहसास हुआ कि मैं फिर से देह के प्रति विचारशीलता दिखाना चाहती थी। मैंने सोचा कि कैसे मैं अपनी देह को संजोने और कलीसिया के काम में बाधा डालने के कारण पहले ही एक अपराध कर चुकी थी। मैं अतीत की तरह फिर से परमेश्वर का दिल नहीं दुखा सकती थी। चाहे कर्तव्य कितना भी मुश्किल या थकाऊ था, मुझे इसमें लगे रहना था। जब मेरे इरादे सही हो गए, तो मुझमें काम करने की आस्था आ गई। इसके बाद सिंचन कार्य के नतीजों में कुछ सुधार हुआ। मैंने सचमुच अनुभव किया कि अगर तुम अपना कर्तव्य करने में सही इरादा रखते हो और देह के प्रति विचारशीलता दिखाए बिना लगन से सहयोग करते हो, तो तुम्हें परमेश्वर की अगुआई और आशीष मिलेंगे, तुम्हारे दिल को सुकून और शांति महसूस होगी। परमेश्वर का धन्यवाद!