93. मुझे अब अपनी पत्नी की बीमारी की चिंता नहीं रहती
2005 के वसंत में मैं और मेरी पत्नी हुईजुआन इतने भाग्यशाली थे कि हमने सर्वशक्तिमान परमेश्वर का अंत के दिनों का सुसमाचार स्वीकार किया, बाद में हम दोनों ने कलीसिया में अपने कर्तव्य निभाने शुरू कर दिए। जब भी हमें अपने कर्तव्यों में मुश्किलों और चुनौतियों का सामना करना पड़ा, हमने साथ मिलकर प्रार्थना की, खोज की और परमेश्वर के वचन पढ़े, हमने एक-दूसरे की मदद की और संगति की। परमेश्वर के वचनों के मार्गदर्शन में हमें कुछ सत्य समझ में आए। हमें पता ही नहीं चला, दस साल से ज्यादा बीत गए, और हम दोनों उम्र के साठवें साल में पहुँच गए। हमारा स्वास्थ्य बिगड़ गया था, खासकर मेरी पत्नी का। उसे उच्च रक्तचाप हो गया था और उसे बार-बार दवा लेनी पड़ती थी। कभी-कभी जब उसकी हालत बहुत गंभीर हो जाती थी तो उसे चक्कर आने लगते थे और वह हिल-डुल नहीं पाती थी। उसका हृदय और पेट भी बहुत खराब स्थिति में था। अपने दैनिक जीवन में हम एक-दूसरे की देखभाल करते थे, संगति करते थे और एक-दूसरे का साथ देते थे और मुझे शांति और संतुष्टि महसूस होती थी।
सितंबर 2023 में एक दिन मुझे उच्च अगुआओं का एक पत्र मिला जिसमें मुझे एक अलग क्षेत्र में सुसमाचार कार्य का प्रभारी होने के लिए कहा गया था। यह देखकर मुझे बहुत खुशी हुई और मुझे पता था कि यह परमेश्वर का अनुग्रह और मेरा उत्थान है। हालाँकि मैं कुछ सिद्धांतों को समझता था और सुसमाचार प्रचार का कुछ अनुभव भी था, फिर भी सत्य की संगति के विषय में मुझमें अभी भी बहुत कमी थी। अगर मैं अपना कर्तव्य निभाने कहीं और गया तो मुझे प्रशिक्षण के ज्यादा अवसर मिलेंगे, मैं अक्सर भाई-बहनों से संवाद कर पाऊँगा और मैं बहुत तेजी से प्रगति करूँगा। इसके अलावा सुसमाचार कार्य परमेश्वर के घर का केंद्रीय कार्य है, परमेश्वर का सबसे तात्कालिक इरादा यह है कि ज्यादा से ज्यादा लोग उसके सामने आएँ और उसके उद्धार को स्वीकार करें, इसलिए मुझे परमेश्वर के इरादे पर विचार करना था और सुसमाचार कार्य में सहयोग करना था। यह सोचकर मैंने अपना सिर घुमाकर अपनी पत्नी की ओर देखा और सोचा, “अगर मैं चला गया तो उसका क्या होगा? वह घर पर बिल्कुल अकेली रह जाएगी। उसे पहले से ही उच्च रक्तचाप है, सिस्टोलिक दबाव लगभग 160 से 180 एमएमएचजी और डायस्टोलिक दबाव लगभग 120 से 130 एमएमएचजी है। जब दौरा आता है तो उसे ऐसा लगता है जैसे बिस्तर पलट रहा है और कमरा ढह रहा है, वह बिस्तर पर लेटी रहती है, हिलने-डुलने से भी डरती है। अगर मैं उसकी देखभाल करने के लिए उसके पास न रहा तो क्या वह खुद को सँभाल पाएगी?” मैं इन चिंताओं में डूबे बिना न रह सका। मैंने अपनी पत्नी की आँखों में आँसू देखे और मैंने उससे पूछा, “क्या हुआ?” वह एक पल के लिए रुकी और फिर बोली, “अगर तुम चले गए तो मेरे पास अपनी बात कहने के लिए कोई नहीं होगा। मैं बूढ़ी हो रही हूँ और बीमार हूँ। तुम्हारे साथ होने का मतलब है कि मेरे पास कोई है जिस पर मैं निर्भर रह सकती हूँ और जो मेरी देखभाल कर सकता है।” जो मैं मन ही मन सोच रहा था, मेरी पत्नी ने उसे शब्दों में बयां कर दिया : “अगर मैं चला गया तो क्या वह उदास और परेशान हो जाएगी? और अगर उसकी हालत और बिगड़ गई और रक्तचाप अचानक बढ़ गया तो वह क्या करेगी? हमारा बेटा कलीसिया में अपने कर्तव्य निभा रहा है और हमारे साथ नहीं रह सकता, लेकिन उसके पास रहकर मैं तो उसकी देखभाल कर सकता हूँ। लोग अक्सर कहते हैं, ‘जवानी में साथी, बुढ़ापे में साझेदार,’ विचार कुछ ऐसा है कि जैसे-जैसे हम बूढ़े होते जाते हैं, हमें साथ रहना चाहिए, एक-दूसरे की देखभाल करनी चाहिए।” यह सोचकर मुझे समझ नहीं आ रहा था कि क्या करूँ। मैं बार-बार इस बात पर विचार कर रहा था, लेकिन मैं कोई फैसला नहीं कर पा रहा था। पास में रहने वाली बहनें उससे मिलने आती थीं, लेकिन मैं बस यही सोचकर चिंतित था, “अगर वह बीमार पड़ गई और कुछ गड़बड़ हो गई तो क्या होगा? क्या वह मेरे बिना काम चला पाएगी? उसकी देखभाल कौन करेगा? शायद मुझे अगुआओं को एक पत्र भेजना चाहिए, जिसमें हम अपनी असली मुश्किलें बताएँ और उनसे किसी और को ढूँढ़ने का अनुरोध करें।” लेकिन फिर मैंने सोचा, “सुसमाचार कार्य का पर्यवेक्षण करना एक भारी जिम्मेदारी है और चूँकि यह कर्तव्य मुझे मिला है, इसलिए यह परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्था है। अगर मैं यह काम करने नहीं जाऊँगा तो यह अवज्ञा होगी, लेकिन अगर मैं जाऊँगा तो मेरी पत्नी का क्या होगा? मैं उसकी भी उपेक्षा नहीं कर सकता।” इसलिए मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, “हे परमेश्वर, मैं यह कर्तव्य करना चाहता हूँ, लेकिन मेरी पत्नी की बीमारी एक वास्तविक मुश्किल है। हे परमेश्वर, मुझे समझ नहीं आ रहा कि क्या करूँ। मेरा मार्गदर्शन करो।” उसी क्षण मुझे परमेश्वर के वचनों का एक अंश याद आया : “परमेश्वर के घर के हितों को प्राथमिकता देना … चाहे तुम कुछ भी कर रहे हो” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध कैसा है?)। मैं समझ गया कि मैं एक सृजित प्राणी हूँ और मुझे परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करना है और कलीसिया के कार्य को प्राथमिकता देनी है। सुसमाचार का प्रचार करना और अपने कर्तव्य निभाना एक ऐसी जिम्मेदारी है जिससे जी नहीं चुराया जा सकता और मुझे समर्पण करना है।
अगली सुबह मैंने अपनी पत्नी को बिस्तर पर लेटे हुए देखा। उसका रक्तचाप फिर से बढ़ गया था, उसे चक्कर आ रहा था, इसलिए वह उठ नहीं पा रही थी, उसका चेहरा पीला-सा और थका हुआ था। मेरा दिल फिर से बेचैन हो गया और मैंने सोचा, “उसकी बीमारी कभी भी प्रहार कर सकती है—अगर वह पानी लेने उठे और बेहोश हो जाए तो क्या होगा और फिर इससे उसे दूसरी बीमारियाँ या लकवा मार जाए तो? उसकी ऐसी हालत में मैं उसे छोड़कर जाने पर आराम से नहीं रह पाऊँगा! खासकर जैसे-जैसे वह उम्रदराज होगी, उसकी हालत बिगड़ने की आशंका और भी बढ़ जाएगी और उसे मेरी देखभाल की और भी ज्यादा जरूरत होगी। मैं अगुआओं को लिखकर पूछ सकता हूँ कि क्या मेरी पत्नी कर्तव्य करने मेरे साथ जा सकती है, वह मेजबानी का कर्तव्य निभा सकती है। इस तरह मुझे उसकी चिंता नहीं करनी पड़ेगी।” बाद में मैंने एक पत्र लिखा, लेकिन जब मैंने अपने लिखे पत्र को देखा तो मुझे बहुत बेचैनी हुई। मैंने खुद से पूछा, “मैं यह पत्र क्यों लिख रहा हूँ? क्या मैं सिर्फ शर्तें नहीं रख रहा हूँ? मैं एक विश्वासी हूँ, फिर भी जब मुझे कोई ऐसा कर्तव्य मिलता है जो मेरी इच्छाओं के अनुरूप नहीं होता तो मैं मना करने के बहाने बनाता हूँ। ऐसा करके मैं किस तरह समर्पण कर रहा हूँ? क्या मैं सिर्फ परमेश्वर से अपनी इच्छा के अनुसार काम करने के लिए नहीं कह रहा हूँ? क्या मेरे पास जरा भी विवेक है?” मैंने फिर देखा कि मेरी पत्नी कितनी बेचैनी में थी और मेरे मन में उथल-पुथल हो रही थी। एक तरफ सुसमाचार प्रचार करना मेरा कर्तव्य था और दूसरी तरफ मेरी पत्नी की बीमारी। मैं उसके बारे में चिंतित रहता था, लेकिन मैं अपने कर्तव्य को त्यागना भी नहीं चाहता था। उसी पल मेरी पत्नी को चक्कर आना कम हो गया और हम दोनों परमेश्वर से प्रार्थना करने के लिए घुटनों के बल बैठ गए। मैंने कहा, “परमेश्वर, मैं अपना कर्तव्य स्वीकारने को तैयार हूँ, लेकिन मेरा आध्यात्मिक कद इतना छोटा है कि अपनी पत्नी को अलग नहीं रख सकता। मेरा मार्गदर्शन करो।”
अपनी भक्ति के दौरान मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े और अभ्यास के कुछ मार्ग पा लिए। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “परमेश्वर का इरादा कभी भी लोगों को मजबूर करने, बाँधने या हेरा फेरी करने का नहीं रहा है। परमेश्वर कभी भी लोगों को बाधित नहीं करता है या उन पर दबाव नहीं डालता है और वह लोगों को मजबूर तो बिल्कुल नहीं करता है। परमेश्वर लोगों को भरपूर आजादी देता है—वह लोगों को वह मार्ग चुनने की अनुमति देता है जिस पर उन्हें चलना चाहिए। भले ही तुम परमेश्वर के घर में हो और भले ही तुम परमेश्वर द्वारा पूर्वनिर्धारित और चुने गए हो, फिर भी तुम आजाद हो। तुम परमेश्वर की विभिन्न अपेक्षाओं और व्यवस्थाओं को अस्वीकार करना चुन सकते हो या तुम उन्हें स्वीकारना चुन सकते हो; परमेश्वर तुम्हें मुक्त भाव से चुनने का अवसर देता है। लेकिन इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि तुम क्या चुनते हो या तुम किस तरह से कार्य करते हो या तुम जिस मामले का सामना करते हो उसे सँभालने के प्रति तुम्हारा दृष्टिकोण क्या है या उसे हल करने के लिए अंत में तुम किन साधनों और पद्धतियों का उपयोग करते हो, तुम्हें अपने क्रियाकलापों की जवाबदेही लेनी चाहिए। तुम्हारा अंतिम परिणाम तुम्हारे व्यक्तिगत फैसलों और परिभाषाओं पर आधारित नहीं है, बल्कि परमेश्वर तुम्हारा लेखा-जोखा रख रहा है। परमेश्वर द्वारा बहुत सारे सत्य व्यक्त कर दिए जाने और लोगों द्वारा बहुत सारे सत्य सुन लिए जाने के बाद परमेश्वर हर व्यक्ति के सही और गलत को सख्ती से मापेगा और परमेश्वर ने जो कहा है, वह जो अपेक्षा करता है और उसने लोगों के लिए जो सिद्धांत तैयार किए हैं उनके आधार पर वह हर व्यक्ति का अंतिम परिणाम निर्धारित करेगा। इस मामले में परमेश्वर की जाँच-पड़ताल और परमेश्वर के आयोजन और व्यवस्थाएँ परमेश्वर द्वारा लोगों के साथ हेरा फेरी करना या उसके द्वारा लोगों को बाँधना नहीं है—तुम आजाद हो। तुम्हें परमेश्वर से चौकस रहने की जरूरत नहीं है और न ही तुम्हें डरने या बेचैन होने की जरूरत है। तुम शुरू से आखिर तक एक आजाद व्यक्ति हो। परमेश्वर तुम्हें एक स्वतंत्र परिवेश, स्वतंत्र चयन करने की इच्छाशक्ति और मुक्त भाव से चुनने की स्वतंत्रता देता है, वह तुम्हें अपने लिए चुनने की अनुमति देता है और अंत में तुम जो भी परिणाम प्राप्त करते हो वह पूरी तरह से तुम्हारे द्वारा चुने गए मार्ग से निर्धारित होता है। यह न्यायसंगत है, है ना? (हाँ।) अगर अंत में तुम्हें बचा लिया जाता है और तुम ऐसे व्यक्ति हो जो परमेश्वर के प्रति समर्पण करता है और परमेश्वर के अनुरूप है और तुम ऐसे व्यक्ति हो जिसे परमेश्वर द्वारा स्वीकार किया जाता है, तो यह वही है जो तुम्हें अपने सही चयनों के कारण मिलता है; अगर अंत में तुम्हें नहीं बचाया जाता है और तुम परमेश्वर के अनुकूल होने में समर्थ नहीं हो और तुम परमेश्वर द्वारा प्राप्त नहीं किए जाते हो और तुम ऐसे व्यक्ति नहीं हो जिसे परमेश्वर द्वारा स्वीकार किया जाता है तो वह भी तुम्हारे अपने चयनों के कारण ही है। इसलिए परमेश्वर अपने कार्य में लोगों को चुनने की बहुत स्वतंत्रता देता है और वह लोगों को पूरी आजादी भी देता है” (वचन, खंड 7, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (2))। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद मुझे आखिरकार यह एहसास हुआ : “परमेश्वर ने मुझे स्वतंत्र रूप से चुनाव करने की इच्छाशक्ति दी है और जब मेरे सामने कोई कर्तव्य आता है तो परमेश्वर मेरे चुनाव और मेरे द्वारा चुने गए मार्ग को देख रहा है—मैं परमेश्वर के प्रति समर्पण कर एक सृजित प्राणी के रूप में अपना कर्तव्य निभाता हूँ या अपने कर्तव्य को त्यागकर अपनी पत्नी की देखभाल के लिए घर पर रहता हूँ। अगुआओं ने मुझे सुसमाचार कार्य का प्रभारी होने के लिए कहा है। इससे मुझे अपने कर्तव्य में प्रशिक्षण का अवसर मिलेगा और इसके पीछे परमेश्वर का इरादा है। आपदाएँ और भी गंभीर होती जा रही हैं, बहुत-से लोगों ने अभी भी परमेश्वर की वाणी नहीं सुनी है और अभी भी शैतान की यातना और नुकसान से पीड़ित हो रहे हैं। परमेश्वर उन्हें विपत्ति में गिरते हुए नहीं देखना चाहता और उसे आशा है कि अधिक लोग सुसमाचार का प्रचार करेंगे और अंत के दिनों के उसके कार्य की गवाही देंगे।” लेकिन भले ही मुझे पता था कि सुसमाचार कार्य में लोगों के सहयोग की सख्त जरूरत है, मुझे चिंता थी कि मेरी पत्नी बीमार पड़ सकती है, इसलिए मैं घर पर रहकर उसकी देखभाल करना चाहता था; अपने कर्तव्य को मना करना और उससे बचना चाहता था। मैं यह तक चाहता था कि वह मेरे साथ चले ताकि वह मेजबानी का कर्तव्य निभा सके, हालाँकि मुझे पता था कि वह अपनी हालत के कारण यह कर्तव्य नहीं निभा सकती। मेरे व्यवहार में सचमुच परमेश्वर के प्रति समर्पण का पूर्ण अभाव था। अगर मैं अपनी पत्नी की देखभाल करने के लिए अपना कर्तव्य नहीं निभा पाता तो न केवल मैं परमेश्वर द्वारा मुझमें लगाए गए दिल के खून का बदला चुकाने में असफल हो जाता, बल्कि मैं अपना कर्तव्य करने और सत्य प्राप्त करने का प्रशिक्षण लेने का अवसर भी खो देता और मेरे जीवन प्रवेश को नुकसान पहुँचता। मुझे कलीसिया के कार्य को प्राथमिकता देनी थी और अपने कर्तव्य को सक्रिय रूप से स्वीकार करना था, क्योंकि एक सृजित प्राणी को यही करना चाहिए।
बाद में मैंने सोचा, “मैं अपनी पत्नी को अपने दिल से क्यों नहीं निकाल पाता? मैंने बस उसकी देखभाल करने के लिए अपने कर्तव्य से दूर रहने के बारे में भी सोचा है।” चिंतन करने पर मुझे एहसास हुआ कि ऐसा इसलिए था क्योंकि मैं दैहिक भावनाओं में जी रहा था। मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े : “मैं लोगों को अपनी भावनाएँ अभिव्यक्त करने का अवसर नहीं देता, क्योंकि मैं दैहिक भावनाओं से रहित हूँ, और चरम सीमा तक लोगों की भावनाओं से नफरत करने लगा हूँ। लोगों के बीच की भावनाओं के कारण ही मुझे एक तरफ कर दिया गया है, और इस तरह मैं उनकी नजरों में ‘तीसरा पक्ष’ बन गया हूँ; यह लोगों के बीच की भावनाओं के कारण ही है कि मैं भुला दिया गया हूँ; यह मनुष्य की भावनाओं के कारण ही है कि वह अपने ‘जमीर’ को चुनने के अवसर का लाभ उठाता है; यह मनुष्य की भावनाओं के कारण ही है कि वह हमेशा मेरी ताड़ना से विमुख रहता है; यह मनुष्य की भावनाओं के कारण ही है कि वह हमेशा मुझे अन्यायी और अनुचित कहता है और कहता है कि मैं चीजें सँभालने में मनुष्य की भावनाओं से बेपरवाह रहता हूँ। क्या पृथ्वी पर मेरे भी सगे-संबंधी हैं? किसने कभी मेरी तरह अपनी पूरी प्रबंधन योजना के लिए बिना खाने या सोने के बारे में सोचे दिन-रात काम किया है? मनुष्य की तुलना परमेश्वर से कैसे हो सकती है? मनुष्य परमेश्वर के साथ सुसंगत कैसे हो सकता है? परमेश्वर, जो कि सृजन करता है, उस मनुष्य की तरह कैसे हो सकता है, जिसे सृजित किया गया है? मैं कैसे पृथ्वी पर मनुष्य के साथ हमेशा रह सकता हूँ और उसके साथ मिलकर कार्य कर सकता हूँ? मेरे दिल के लिए चिंता कौन महसूस कर सकता है?” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन, अध्याय 28)। “कुछ लोग बेहद भावुक होते हैं। रोजाना वे जो कुछ भी कहते हैं, जैसा आचरण करते हैं और जिस भी तरह से मामलों से निपटते हैं, उसमें वे अपनी भावनाओं के अनुसार जीते हैं। वे इस या उस व्यक्ति के प्रति कुछ महसूस करते हैं और वे अपने दिन रिश्तों और भावनाओं के मामलों पर ध्यान देते हुए बिताते हैं। अपने सामने आने वाली सभी चीजों में वे भावनाओं के दायरे में रहते हैं। ... वे अत्यंत भावुक होते हैं। तुम कह सकते हो कि भावनाएं इस व्यक्ति का घातक दोष है। वह सभी मामलों में अपनी भावनाओं से विवश होता है, वह सत्य का अभ्यास करने या सिद्धांत के अनुसार कार्य करने में अक्षम होता है और वह अक्सर परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह करता है। भावनाएँ उसकी सबसे बड़ी कमजोरी, उसका घातक दोष होती हैं, और उसकी भावनाएँ उसे तबाह और बरबाद करने में पूरी तरह सक्षम होती हैं। जो लोग अत्यधिक भावुक होते हैं, वे सत्य को अभ्यास में लाने या परमेश्वर के प्रति समर्पित होने में असमर्थ होते हैं। ऐसी प्रबल भावनाओं के साथ वे बस देह के सामने झुक सकते हैं; वे मूर्ख और भ्रमित लोग हैं। इस तरह के लोगों की प्रकृति अत्यधिक भावुक होने की होती है। वे अपनी भावनाओं के अनुसार जीते हैं” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, मनुष्य की प्रकृति को कैसे जानें)। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद मुझे समझ आया कि परमेश्वर लोगों के बीच मौजूद भावनाओं से क्यों घृणा करता है। क्योंकि जब लोग भावनाओं के बीच जीते हैं तो वे अपने कर्तव्य के बारे में जरा-भी नहीं सोचते और परमेश्वर के साथ विश्वासघात करने में भी समर्थ होते हैं। अब परमेश्वर का सुसमाचार कार्य सभी राष्ट्रों में फैल रहा है, भाई-बहन सक्रिय रूप से सुसमाचार का प्रचार कर रहे हैं और परमेश्वर की गवाही दे रहे हैं। मुझे सुसमाचार प्रचार से संबंधित सत्यों और सिद्धांतों की कुछ समझ थी, और मुझे अपने सुसमाचार कार्य में कुछ नतीजे मिले थे, इसलिए मुझे अपना कर्तव्य निभाना था। लेकिन मैं परमेश्वर के इरादे पर विचार नहीं कर रहा था, बल्कि अपनी पत्नी के स्वास्थ्य की चिंता कर रहा था। मुझे चिंता थी कि वह घर पर अकेली रह जाएगी और अगर वह बीमार पड़ गई तो उसकी देखभाल करने वाला कोई नहीं होगा। मैं अपनी भावनाओं से नियंत्रित था और सुसमाचार कार्य के बारे में बिल्कुल भी विचार नहीं कर रहा था। घर पर अपनी पत्नी का ख्याल रखने के लिए मैं चाहता था कि अगुआओं को लिखकर यह कह दूँ कि मैं अब अपना कर्तव्य करने के लिए बाहर नहीं जाऊँगा या फिर पूछूँ कि क्या मेरी पत्नी मेरे साथ मेजबानी का कर्तव्य करने के लिए आ सकती है ताकि मैं उसकी देखभाल कर सकूँ। वैसे सोचूँ तो मेरी पत्नी की तबीयत इतनी खराब थी कि उसका मेजबानी का कर्तव्य करना पूरी तरह से सिद्धांतों के खिलाफ था, लेकिन अपनी वैवाहिक भावनाओं के कारण मैंने उन सिद्धांतों पर विचार नहीं किया जिनके अनुसार परमेश्वर के घर में लोगों का उपयोग किया जाता है। मैंने बस यही सोचा कि अगर हम साथ रह सकें और अगर मैं उसकी देखभाल कर सकूँ तो यही काफी होगा। मुझे एहसास हुआ कि मेरी पत्नी के लिए मेरी भावनाएँ बहुत प्रबल थीं। मेरे दिल में अपनी पत्नी के लिए मेरी भावनाएँ परमेश्वर के घर और मेरे कर्तव्य के हितों से कहीं ज्यादा थीं। फिर मेरे दिल में परमेश्वर का कोई स्थान कैसे होगा? मैं अपनी भावनाओं के अनुसार जीता था और मैं हर तरह से उनसे बाधित था। मैं अपने कर्तव्य नहीं कर पा रहा था, सत्य का अभ्यास करने और परमेश्वर के प्रति समर्पण करने की तो बात ही दूर है। ऐसा व्यवहार परमेश्वर को अत्यधिक घृणित लगता है। मैंने तुरंत परमेश्वर से प्रार्थना की, “परमेश्वर, अपनी भावनाओं के कारण मैं सचमुच तुम्हारे प्रति समर्पण नहीं कर पा रहा हूँ और मैं अपने कर्तव्य से भी बचना चाहता हूँ। मुझमें जमीर है ही नहीं! हे परमेश्वर, मैं पश्चात्ताप करना चाहता हूँ, मैं चाहता हूँ कि तुम मुझे अपनी भावनाओं की बाधाओं से मुक्त होने और अपने कर्तव्यों को अच्छे से पूरा करने में मेरा मार्गदर्शन करो।”
बाद में मैंने परमेश्वर के और वचन पढ़े और मेरा हृदय उज्ज्वल हो गया। परमेश्वर कहता है : “परमेश्वर ने तुम्हारे लिए शादी की व्यवस्था की और तुम्हें एक जीवनसाथी दिया है। शादी के बाद भी परमेश्वर के समक्ष तुम्हारी पहचान और दर्जा नहीं बदलता है। चाहे तुम पुरुष हो या महिला, तुम दोनों के बीच एक चीज समान है और वह यह है कि तुम दोनों सृष्टिकर्ता के सामने सृजित प्राणी हो। शादी के ढाँचे में, तुम लोग एक-दूसरे के प्रति सहनशील रहते हो, एक-दूसरे को सँजोते हो और एक-दूसरे की रक्षा करते हो, तुम एक-दूसरे की मदद और सहयोग करते हो, और यही तुम्हारे लिए जिम्मेदारियाँ निभाना है। लेकिन, परमेश्वर के सामने, जो जिम्मेदारियाँ तुम्हें निभानी चाहिए और जो मिशन तुम्हें पूरा करना चाहिए उसकी जगह अपने साथी के प्रति निभाई जाने वाली जिम्मेदारियाँ नहीं ले सकती हैं। इसलिए, जब भी अपने साथी के प्रति निभाई जाने वाली जिम्मेदारियों और परमेश्वर के समक्ष एक सृजित प्राणी के कर्तव्य को करने के बीच टकराव की स्थिति हो, तो तुम्हें अपने साथी के प्रति अपनी जिम्मेदारियाँ निभाने के बजाय एक सृजित प्राणी का कर्तव्य करना चाहिए। तुम्हें यही दिशा और यही लक्ष्य चुनना चाहिए और बेशक, यही मिशन पूरा करना चाहिए। हालाँकि, कुछ लोग गलती से वैवाहिक सुख की तलाश, या अपने साथी के प्रति अपनी जिम्मेदारियाँ निभाने, अपने साथी का ध्यान रखने, उसकी देखभाल करने, उसे संजोने और उसकी रक्षा करने को अपने जीवन का मिशन बना लेते हैं; वे अपने साथी को अपनी पूरी दुनिया, अपना जीवन बना लेते हैं—यह गलत है। ... इसलिए, शादी के ढाँचे में जब दोनों में से कोई भी साथी वैवाहिक सुख की तलाश में सब कुछ दाँव पर लगाता है या कोई भी त्याग करता है, तो परमेश्वर उसे याद नहीं रखता। चाहे तुम कितने ही अच्छे से या कितने ही सटीक तरीके से अपने साथी के प्रति अपनी जिम्मेदारियाँ और दायित्व निभाओ या अपने साथी के अनुसार कितना भी सही करो—दूसरे शब्दों में, चाहे तुम कितने ही अच्छे से या कितने ही सटीक तरीके से अपना वैवाहिक सुख बनाए रखते हो, या चाहे यह कितना ही बेहतरीन हो—इसका मतलब यह नहीं है कि तुमने एक सृजित प्राणी का मकसद पूरा कर लिया है, और न ही इससे साबित होता है कि तुम ऐसे सृजित प्राणी हो जो मानक स्तर का है। हो सकता है कि तुम एक आदर्श पत्नी या एक आदर्श पति हो, लेकिन यह बस शादी के ढाँचे तक ही सीमित है। तुम कैसे इंसान हो, सृष्टिकर्ता इसे इस आधार पर मापता है कि तुम उसके समक्ष एक सृजित प्राणी का कर्तव्य कैसे करते हो, तुम किस मार्ग पर चलते हो, जीवन के प्रति तुम्हारा नजरिया क्या है, जीवन में तुम किस चीज का अनुसरण करते हो और एक सृजित प्राणी होने का मिशन कितनी अच्छी तरह से पूरा करते हो। इन चीजों से ही परमेश्वर एक सृजित प्राणी के रूप में तुम्हारे द्वारा अपनाए गए मार्ग और तुम्हारी भविष्य की मंजिल को मापता है। वह इन चीजों को इस आधार पर नहीं मापता है कि तुम पत्नी या पति के रूप में अपनी जिम्मेदारियों और दायित्वों को कितनी अच्छी तरह से पूरा करते हो; न ही इस आधार पर कि अपने साथी के प्रति तुम्हारा प्यार उसे खुश रखता है या नहीं” (वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (11))। परमेश्वर के वचन स्पष्ट रूप से उन जिम्मेदारियों की संगति करते हैं जो पति-पत्नी को एक-दूसरे के प्रति निभानी चाहिए। जब अपने कर्तव्यों में देरी से बचा जा सकता है तो पति-पत्नी को एक-दूसरे का ध्यान रखना, देखभाल करना, एक-दूसरे की मदद करनी और उन्हें सहारा देना चाहिए। पहले जब मैं अपने कर्तव्यों में देरी नहीं करता था, जब मेरी पत्नी की तबीयत खराब होती थी तो मैं उसके साथ रहता था और उसकी देखभाल करता था, इस तरह मैं एक पति के रूप में अपनी जिम्मेदारियों और दायित्वों को अच्छे से पूरा कर रहा था। लेकिन इसका मतलब यह नहीं था कि मैं एक सृजित प्राणी के कर्तव्य और जिम्मेदारियाँ निभा रहा था। जब कलीसिया मुझसे अपना कार्य करने की अपेक्षा करती है तो मैं कलीसिया के कार्य को प्राथमिकता देने और एक सृजित प्राणी की जिम्मेदारियों को अच्छे से पूरा करने को नैतिक रूप से बाध्य हूँ। कहने का मतलब है कि जब मेरी पत्नी की देखभाल मेरे कर्तव्यों के साथ टकराती है तो मुझे अपने कर्तव्य करना चुनना चाहिए। यह सही चुनाव है और यही कर्तव्य और जिम्मेदारी है जिसे मुझे पूरा करना चाहिए। इस समय सुसमाचार कार्य में लोगों के सहयोग की तत्काल आवश्यकता है, सुसमाचार का प्रचार करना और परमेश्वर की गवाही देना मेरी जिम्मेदारी और मिशन है। मुझे अपने कर्तव्यों का पालन करने का चुनाव बेझिझक करना होगा। लेकिन मैं “पति-पत्नी को एक-दूसरे से गहरा प्रेम करना चाहिए” और “जवानी में साथी, बुढ़ापे में साझेदार” जैसे शैतानी विचारों में डूबा हुआ था, मैंने पति-पत्नी के बीच भावनात्मक बंधन को हर चीज से ऊपर रखा, मेरा सोचना था कि जैसे-जैसे हम बूढ़े होते जाते हैं, हमें साथ ही रहना चाहिए, एक-दूसरे का साथी होना चाहिए, एक-दूसरे की देखभाल करनी चाहिए, मदद करनी चाहिए और एक-दूसरे का साथ देना चाहिए और हमें हमेशा साथ रहना चाहिए। खासकर जब मेरी पत्नी की तबीयत खराब थी तो मैंने सोचा कि उसकी देखभाल करके, मैं एक पति के रूप में अपनी जिम्मेदारी निभा रहा हूँ, मेरे साथ रहने से ही उसे सुकून मिलेगा और हम बुढ़ापे में खुशी का अनुभव कर पाएँगे। मेरा मन अपनी पत्नी की बीमारी और भविष्य के जीवन के विचारों से भरा हुआ था, मैंने कलीसिया के सुसमाचार कार्य के बारे में बिल्कुल भी नहीं सोचा, न ही मैंने यह सोचा कि सुसमाचार प्रचार और परमेश्वर की गवाही देने के मिशन को कैसे पूरा किया जाए। मैं अपने कर्तव्य को मना भी करना चाहता था। मैं पति-पत्नी के बीच जिम्मेदारियों को पूरा करने को सत्य का अभ्यास मानता था, मैंने अपनी पत्नी की देखभाल करना और उसका साथ देना ही अपने जीवन का एकमात्र उद्देश्य समझा। भले ही परमेश्वर के वचनों ने मुझे उसके इरादे को समझने के लिए प्रबुद्ध किया था, फिर भी मैंने पत्नी की देखभाल करने के लिए घर पर उसके साथ रहना ही चुना। अपने दिल में मैंने अपनी पत्नी को ही सबसे ऊपर रखा, यहाँ तक कि परमेश्वर से भी ऊपर। मैं सचमुच विद्रोही था! मैं चीजों को “जवानी में साथी, बुढ़ापे में साझेदार” के शैतानी दृष्टिकोण से देखता था। मैंने घर पर रहकर अपनी पत्नी की देखभाल करने के लिए अपने कर्तव्यों से मुँह मोड़ना पसंद किया। मैं कितना स्वार्थी था! चाहे मैं अपनी पत्नी की कितनी भी अच्छी तरह देखभाल करूँ, यह सिर्फ एक जीवनसाथी की जिम्मेदारी और दायित्व पूरा करना है, सत्य का अभ्यास नहीं है। जबकि एक सृजित प्राणी के रूप में अपने कर्तव्यों का पालन करना, सुसमाचार कार्य में अपनी जिम्मेदारियाँ निभाना और अपने मिशन को पूरा करना ही मेरे जीवन को मूल्य और अर्थ देता है और यही वे लक्ष्य हैं जिनका मुझे अनुसरण करना चाहिए। परमेश्वर ने मुझे उस पर विश्वास करने और उद्धार पाने का अवसर दिया, अपने कर्तव्यों में प्रशिक्षण पाने और सत्य प्राप्त करने का अवसर दिया, फिर भी मैं परमेश्वर के प्रेम का प्रतिदान देने के लिए अपने कर्तव्य ठीक नहीं निभा पाया। मैं शैतानी विचारों से भी चिपका रहा और परमेश्वर के प्रति मेरी कोई वफादारी या समर्पण नहीं था। मुझमें वाकई अंतरात्मा और मानवता की कमी थी। इससे न केवल परमेश्वर मुझसे घृणा करता, बल्कि यह आखिरकार मुझे बर्बादी की ओर ले जाता।
बाद में, मुझे यह एहसास हुआ कि अपनी पत्नी की चिंता छोड़ न पाने की मेरी असमर्थता, और यह सोचना कि सिर्फ उसके साथ रहकर ही मैं उसकी अच्छी देखभाल कर सकता हूँ, यह सब परमेश्वर की संप्रभुता में मेरे विश्वास की कमी को दर्शाता है। मुझे परमेश्वर के वचन याद आए : “मनुष्य का भाग्य परमेश्वर के हाथों से नियंत्रित होता है। तुम स्वयं को नियंत्रित करने में असमर्थ हो : भले ही मनुष्य अपने लिए भाग-दौड़ करता रहे और व्यस्त रहे, फिर भी वह स्वयं को नियंत्रित करने में अक्षम रहता है। यदि तुम अपने भविष्य की संभावनाओं को जान सकते, यदि तुम अपने भाग्य को नियंत्रित कर सकते, तो क्या तुम्हें तब भी एक सृजित प्राणी कहा जाता?” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, मनुष्य के सामान्य जीवन को बहाल करना और उसे एक अद्भुत मंजिल पर ले जाना)। “कौन वास्तव में पूरी तरह से मेरे लिए खुद को खपा पाता है और मेरी खातिर अपना सब कुछ अर्पित कर पाता है? तुम सभी अनमने हो; अपने विचारों को लेकर तुम दुविधाग्रस्त रहते हो, परिवार के बारे में, बाहरी दुनिया के बारे में, भोजन और कपड़ों के बारे में सोचते रहते हो। इस तथ्य के बावजूद कि तुम यहाँ मेरे सामने हो, मेरे लिए चीजें कर रहे हो, अपने दिल में तुम अभी भी घर पर मौजूद अपनी पत्नी, बच्चों और माता-पिता के बारे में सोच रहे हो। क्या वे तुम्हारी संपत्ति हैं? तुम उन्हें मेरे हाथों में क्यों नहीं सौंप देते? क्या तुम मुझ पर भरोसा नहीं करते? या ऐसा है कि तुम डरते हो कि मैं तुम्हारे लिए अनुचित व्यवस्थाएँ करूँगा? तुम्हारी अपनी देह का परिवार और अपने प्रियजन क्यों हमेशा तुम्हारे मन में रहते हैं? क्या तुम्हारे दिल में मैं कोई निश्चित स्थान रखता हूँ?” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, आरंभ में मसीह के कथन, अध्याय 59)। परमेश्वर के वचनों ने मुझे एहसास दिलाया कि मेरा भाग्य परमेश्वर के हाथों में है, मेरी पत्नी का भाग्य भी परमेश्वर के हाथों में है और मैं उसके भाग्य को नियंत्रित नहीं कर सकता। उसकी शारीरिक स्थिति, वह बीमार पड़ेगी या नहीं, या उसकी बीमारी बिगड़ेगी या नहीं, ये सब परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन हैं, ऐसा नहीं है कि उसके साथ रहकर उसकी देखभाल करने से वह बीमारी से मुक्त हो जाएगी। इस बिंदु पर मैं हर दिन उसके साथ रहकर उसकी देखभाल कर रहा था, लेकिन क्या ऐसा नहीं था कि उसे अभी भी उच्च रक्तचाप था और उसे इतने चक्कर आ रहे थे कि वह चल भी नहीं पा रही थी? मुझे एहसास हुआ कि मैं परमेश्वर की संप्रभुता को सही मायने में नहीं समझता था, न ही मैं वाकई विश्वास या समर्पण करता था, जब मेरी पत्नी की बीमारी का मामला आया तो मैं हमेशा उसे खुद नियंत्रित करने और परमेश्वर की संप्रभुता से मुक्त होने की कोशिश करना चाहता था। मैं सचमुच कितना विवेकहीन था! आम तौर पर मैं बस नारे लगाता था, कहता था कि परमेश्वर सब पर संप्रभु है, लेकिन परमेश्वर के लिए मेरे हृदय में कोई स्थान नहीं था, मैं परमेश्वर की संप्रभुता या अधिकार को सही मायने में नहीं समझता था और जब परमेश्वर ने सच में मेरी परीक्षा ली तो मैंने कोई गवाही नहीं दी। मैं अपनी पत्नी को परमेश्वर को सौंपने की हिम्मत नहीं कर पा रहा था। किस तरह से मुझे परमेश्वर में सच्ची आस्था थी? परमेश्वर सब पर नियंत्रण रखता है और सब पर संप्रभु है और मेरी पत्नी को कितने कष्ट सहने होंगे, उसे क्या अनुभव होंगे, उसे कितनी असफलताओं का सामना करना पड़ेगा, क्या उसकी बीमारी बिगड़ेगी या उसे लकवा मार जाएगा, ये सब परमेश्वर के हाथ में है। अगर परमेश्वर ने पूर्वनियत किया है कि उसकी बीमारी बिगड़ेगी या उसे लकवा मार जाएगा तो अगर मैं उसके साथ रह भी जाऊँ तो भी मैं शक्तिहीन रहूँगा। अगर उसे लकवा मारना पूर्वनियत है तो उसे मारेगा। अगर परमेश्वर ने यह पूर्वनियत नहीं किया है कि उसकी बीमारी और बिगड़ेगी या उसे लकवा मार जाएगा तो अगर मैं उसकी देखभाल करने के लिए वहाँ न भी रहूँ तो भी उसकी हालत और नहीं बिगड़ेगी। मैंने एक अस्पताल के निदेशक के बारे में सोचा, जिसे मैं पहले जानता था। उसकी पत्नी एक दिन बिल्कुल ठीक थी, लेकिन अगले ही दिन उसकी तबीयत खराब हो गई और उसे अस्पताल में भर्ती कराया गया, जाँच के बाद पता चला कि उसे एडवांस कैंसर है। यह निदेशक एक चिकित्सा विशेषज्ञ था, और भले ही वह अपनी पत्नी के साथ रहा, फिर भी वह शक्तिहीन था और आखिरकार इलाज नाकाम होने पर उसकी पत्नी की मौत हो गई। मेरे साथ काम करने वाला एक भाई भी था। वह 70 साल का था। उसकी पत्नी का देहांत हो चुका था और उसके बच्चे कहीं और काम करते थे। जब कभी वह बीमार पड़ता तो उसके साथ कोई नहीं होता था, लेकिन वह सबक सीखने के लिए परमेश्वर पर निर्भर रहता था, अपने कर्तव्य सामान्य रूप से करता था और उसका स्वास्थ्य अच्छा रहता था। इससे मैंने देखा कि लोग न तो अपने भाग्य को नियंत्रित कर सकते हैं, न ही दूसरों के भाग्य को। हर किसी का भाग्य परमेश्वर के हाथ में है। मैंने फिर सोचा कि मेरी पत्नी ने भी परमेश्वर पर विश्वास किया है, जिसका मतलब था कि जब उसकी हालत खराब होती थी या वह बीमार होती थी तो वह परमेश्वर से प्रार्थना कर सकती थी और सत्य की खोज कर सकती थी, केवल परमेश्वर के वचनों के मार्गदर्शन और प्रबोधन से ही उसके हृदय को शांति और स्थिरता मिल सकती थी, चाहे मैं उसकी कितनी भी अच्छी देखभाल क्यों न करूँ, जब वह बीमार होती थी तो मैं उसकी मदद करने में असमर्थ होता था। मुझे उसे परमेश्वर के हाथों में सौंपना था। परमेश्वर के वचनों के मार्गदर्शन में मैंने अपनी पत्नी की बीमारी के बारे में चिंता और व्याकुलता छोड़ दी, मेरा हृदय हल्का और मुक्त हो गया। इसलिए मैंने अगुआओं को पत्र लिखकर जाने और अपना कर्तव्य करने की इच्छा व्यक्त की।
बाद में मेरी पत्नी की सेहत में थोड़ा सुधार हुआ, उसे एहसास हुआ कि उसके दिल में परमेश्वर के लिए कोई जगह नहीं थी और वह परमेश्वर की संप्रभुता में विश्वास नहीं करती थी। वह नहीं चाहती थी कि मैं जाऊँ क्योंकि मुझे सहारे के रूप में पाकर ही वह सुरक्षित महसूस करती थी। उसने भी आत्मचिंतन किया और वह परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पित होने को तैयार हो गई। चाहे मैं अपना कर्तव्य निभाने के लिए जहाँ भी जाऊँ, वह मेरा साथ देगी और कहा कि मैं उसकी चिंता ना करूँ। उसने कहा कि वह परमेश्वर से प्रार्थना करेगी, उसके वचनों का अनुभव करने के लिए उस पर भरोसा करेगी और अपने जीवन प्रवेश पर ध्यान केंद्रित करेगी। बाद में मैं सुसमाचार कार्य का प्रभार लेने चला गया, कुछ ही समय बाद मैंने सुना कि मेरी पत्नी की बीमारी में काफी सुधार हुआ है और वह अपना कर्तव्य जितना हो सके उतने अच्छे तरीके से निभा रही है।
इस अनुभव के माध्यम से मुझे एहसास हुआ कि मैं अपनी भावनाओं को बहुत ज्यादा महत्व दे रहा था, अपनी भावनाओं के कारण ही मैं अपने कर्तव्य से इनकार कर रहा था, बल्कि परमेश्वर के साथ विश्वासघात कर रहा था, जिससे पता चलता है कि परमेश्वर के प्रति मेरी कोई वफादारी या समर्पण नहीं था। मैं यह भी समझ गया था कि अपनी पत्नी की बीमारी को कैसे देखना है, मैं परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करने और अपने कर्तव्य को प्राथमिकता देने के लिए तैयार हो गया था। मेरे प्रति परमेश्वर के प्रेम और उद्धार के लिए उसका धन्यवाद!