185  परमेश्वर ने मुझे बहुत प्रेम दिया है

1

हे परमेश्वर! तेरा न्याय कितना वास्तविक है, धार्मिकता और पवित्रता से परिपूर्ण है।

मानवजाति की भ्रष्टता के सत्य के बारे में तेरे प्रकाशनों ने मुझे पूरी तरह उजागर कर दिया है।

मैं सोचता हूँ कि कैसे मैंने वर्षों तक खुद को खपाया और तेरी आशीष पाने के लिए स्वयं को व्यस्त रखा।

मैंने पौलुस का अनुकरण किया, परिश्रम से कार्य किया, ताकि मैं भीड़ से अलग दिखूँ।

तेरे न्याय के वचनों मे मुझे दिखाया कि मैं कितना स्वार्थी और घृणायोग्य था।

मैं शर्मिंदा होकर ज़मीन पर गिर गया हूँ, तेरे चेहरे को देखने के बहुत अयोग्य हूँ।

कितनी बार मैंने मुड़कर उस पथ को देखा है जिस पर मैं चला हूँ।

इस दिन तक आने में तुम्हारे वचनों के न्याय ने मुझे राह दिखाई है।

मैं समझता हूँ कि मुझे बचाने के लिए तुझे क्या कीमत चुकानी पड़ती है, यह सब तेरा प्रेम है।


2

हे परमेश्वर! तेरे न्याय का अनुभव करके, मैंने तेरे सच्चे प्रेम का स्वाद लिया है।

यह तेरा न्याया है जो मुझे खुद को जानने और दिल से पछतावा करने देता है।

मैं इतना भ्रष्ट हूँ कि मुझे सच में ज़रूरत है कि तू मेरा न्याय करे और मुझे शुद्ध करे।

तेरे न्याय के बिना, मैं केवल अंधकार में भटक सकता हूँ।

तेरे वचन ही हैं जो मुझे जीवन के प्रकाश के मार्ग पर लाये हैं।

मुझे महसूस होता है कि तुझे प्रेम करना और तेरे लिए जीना सबसे सार्थक कार्य है।

कितनी बार मैंने मुड़कर उस पथ को देखा है जिस पर मैं चला हूँ।

तेरा न्याय और ताड़ना, तेरा आशीष और प्रेम हैं।

मैं सत्य को समझूँगा और तेरे प्रति अधिक शुद्ध प्रेम को हासिल करूँगा। मुझे कितना भी कष्ट हो मैं इसके लिए तैयार हूँ।

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