186  परमेश्वर का न्याय है प्यार

1

क्या गवाही देता है अंत में इंसान?

परमेश्वर धार्मिक है, गवाही देता है इंसान,

क्रोध है, ताड़ना है, न्याय है परमेश्वर।

इंसान गवाही देता है, धार्मिक है परमेश्वर।

इंसान को पूर्ण बनाने की ख़ातिर, न्याय का प्रयोग करता है परमेश्वर।

इंसान को प्रेम करता, बचाता आ रहा है परमेश्वर।

कितना कुछ निहित है मगर उसके प्यार में?

न्याय है, प्रताप है, बद्दुआ है, क्रोध है उसके प्यार में।

श्राप देता है तुम्हें परमेश्वर, ताकि उसे प्रेम कर सको तुम,

और जानो देह के सार-तत्वों को तुम।

ताड़ना देता है तुम्हें परमेश्वर, ताकि जागो तुम,

और अपनी नाकाबिलियत को जानो तुम।

इसलिये परमेश्वर का न्याय, प्रताप, श्राप

जो धार्मिकता दिखाता है वो तुम्हारे भीतर

ये सब करता है तुम्हें पूर्ण बनाने के लिये परमेश्वर।

यही प्रेम परमेश्वर का, पाया जाता है तुम्हारे भीतर।


2

हालाँकि परमेश्वर ने दिया था श्राप इंसान को अतीत में,

डाला नहीं था इंसान को उसने अथाह कुण्ड में,

न ही उतारा था मौत के घाट उसे, आस्था की थी शुद्ध उसकी।

परमेश्वर का मकसद था पूर्ण करना उसे।

देह का सार-तत्व शैतान है।

सचमुच सही था वो, जब ऐसा कहा परमेश्वर ने।

फिर भी कर्म जो परमेश्वर ने किये हैं,

नहीं किये जाते उस तरह जैसे कहा गया है परमेश्वर के वचनों में।

श्राप देता है तुम्हें परमेश्वर, ताकि उसे प्रेम कर सको तुम,

और जानो देह के सार-तत्वों को तुम।

ताड़ना देता है तुम्हें परमेश्वर, ताकि जागो तुम,

और अपनी नाकाबिलियत को जानो तुम।

इसलिये परमेश्वर का न्याय, प्रताप, श्राप

जो धार्मिकता दिखाता है वो तुम्हारे भीतर

ये सब करता है तुम्हें पूर्ण बनाने के लिये।

यही प्रेम परमेश्वर का, पाया जाता है तुम्हारे भीतर।

इसलिये परमेश्वर का न्याय, प्रताप, श्राप

जो धार्मिकता दिखाता है वो तुम्हारे भीतर

ये सब करता है तुम्हें पूर्ण बनाने के लिये।

यही प्रेम परमेश्वर का, पाया जाता है तुम्हारे भीतर।

यही प्रेम परमेश्वर का, पाया जाता है तुम्हारे भीतर।


—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, पीड़ादायक परीक्षणों के अनुभव से ही तुम परमेश्वर की मनोहरता को जान सकते हो से रूपांतरित

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